अडैप्टर
शनिवार, सुबह 9:52। वाया डेल’इंडिपेंडेंत्सा के पोर्टिको।
जो आदमी ख़ुद को सांद्रो मोज़र कहता था, वो पीले सूट के पीछे तीन सौ मीटर चला और फिर उसे एक ऐसी इमारत के अंदर खो बैठा जो इमारत थी ही नहीं।
बोलोन्या के साथ यही दिक़्क़त थी। आने से पहले उसने पोर्टिको के बारे में पढ़ा था। उसने पढ़ा था कि वो बासठ किलोमीटर लंबे हैं, कि आठ सौ साल से वो विद्वानों और व्यापारियों को बारिश से बचाते आए हैं, कि संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था उनकी हिफ़ाज़त करती है। उसने तस्वीरों में उनकी तारीफ़ की थी। उसे आज सुबह तक समझ नहीं आया था कि वो एक जाल हैं।
पोर्टिको छत वाली एक सड़क था। छत ईंट की थी। दीवारें ईंट की थीं। खंभे, हर चार मीटर पर, ईंट के थे। और ईंट, पुरानी ईंट, इस शहर की लाल ईंट, उसके ट्रैकर को अंधा कर देती थी।
उसने अब ट्रैकर को देखा। वो ताश के पत्ते जितनी बड़ी, चपटी, काली चीज़ थी। किसी भी और ग्रह पर जहाँ उसने काम किया था, वो उसे कोर को एक छोटे चमकते बिंदु के रूप में दिखाता, दूरी और दिशा के साथ और घंटी जैसी एक धीमी आवाज़ के साथ। यहाँ, वाया डेल’इंडिपेंडेंत्सा की मेहराबों के नीचे, वो उसे सलेटी झिलमिलाहट दिखा रहा था, धीरे-धीरे हिलती हुई, किसी पुराने टीवी की बर्फ़ जैसी।
पीला सूट बाएँ गया था। या दाएँ। वो एक मेहराब के नीचे से बग़ल वाले पोर्टिको में मुड़ा था, और वो पोर्टिको दूसरे में बदल गया था, और वो एक छोटे चौक पर खुला था जिसमें एक चर्च था, और फिर और मेहराबें, और मेहराबें।
सांद्रो तेज़ चला, दौड़ा नहीं। दौड़ने से नज़र पड़ती है। वो बाएँ गया, फिर दाएँ, फिर बाएँ। वो एक दवा की दुकान, एक बैंक, सिर्फ़ टोपियाँ बेचने वाली एक दुकान, और सिर्फ़ बटन बेचने वाली एक दुकान के पास से गुज़रा।
वो एक छोटे चौक में निकला जिसमें एक चर्च था।
वही चौक था। वही चर्च था। चर्च के सामने एक जैसी नारंगी टोपियों में बीस टूरिस्टों का एक ग्रुप खड़ा था, सुबह दस बजे जेलातो खाता हुआ, और उनके सामने एक गाइड उन्हें उँगली से गिन रही थी।
“अठारह, उन्नीस, बीस,” गाइड बोली। उसने सांद्रो को देखा। “इक्कीस?”
“नहीं,” सांद्रो ने कहा। “धन्यवाद।”
“पक्का? हम आगे मीनारों पर जा रहे हैं।”
“मैं निश्चित हूँ।”
वो मुड़ा। वो फिर मेहराबों के नीचे गया। इस बार उसने दूसरा मोड़ लिया, बेहतर वाला, सोचा-समझा। वो चार मिनट चला। वो एक छोटे चौक में निकला जिसमें एक चर्च था।
“अठारह, उन्नीस, बीस,” गाइड बोली। “अरे। फिर से नमस्ते।”
सांद्रो ने ट्रैकर देखा। झिलमिलाहट अब भी थी। उसके नीचे एक छोटे-से अंक का रंग बदल गया था जिस पर उसका ध्यान नहीं था। अब वो लाल था। उस पर लिखा था 11%।
सांद्रो जहाँ से आया था, वहाँ न पोर्टिको थे, न ईंट, न बारिश। वहाँ खाना भी नहीं था, उस मतलब में जिसमें ये शहर इस शब्द को लेता था। वहाँ एक सलेटी लेई थी जो दीवार से निकलती थी, और उसमें वो सब होता था जो शरीर को चाहिए, और उसका कोई स्वाद नहीं होता था, और उसे खड़े-खड़े कोई चालीस सेकंड में खा लिया जाता था। उसने उसे ज़िंदगी के हर दिन खाया था।
फिर, ग्यारह साल पहले, एक शांत ग्रह पर एक लंबे और उबाऊ काम के दौरान, उसे इस ग्रह का एक पुराना प्रसारण मिला था। खाना पकाने का एक प्रोग्राम। बोलोन्या की एक छोटी रसोई में नीला एप्रन पहने एक औरत, कैमरे को दिखाती हुई कि पास्ता का आटा अपनी बाँह जितने लंबे बेलन से कैसे बेलते हैं, जब तक वो इतना पतला न हो जाए कि उसके आर-पार अख़बार पढ़ा जा सके।
उसने उसे चार सौ बार देखा था।
उसने शब्द सीखे थे। ताल्याटेल्ले। तोर्तेल्लीनी। रागू। मोर्ताडेला। उसने सीखा था कि रागू क़ानून में लिखा है, कि तोर्तेल्लीनी की एक बिरादरी है, कि पास्ता की चौड़ाई एक ख़ास मीनार की ऊँचाई के एक ख़ास हिस्से जितनी होनी चाहिए। उसने सीखा था कि इस शहर के लोग धीरे खाते हैं, मेज़ों पर, साथ बैठकर, दो-तीन घंटे, पूरे वक़्त बातें करते हुए। वो हिस्सा उसे समझ नहीं आया था। वो उसे बहुत शिद्दत से समझना चाहता था।
जब ये काम आया, इस दुनिया में एक छूटा हुआ कोर, उसे वापस लाना, और पूरी आकाशगंगा में जगह मिली तो बोलोन्या, तो उसने इसे अपनी आम फ़ीस के आधे पर ले लिया था।
ट्रैकर पर लिखा था 10%।
उसे पावर चाहिए थी। उसका पावर बैंक बैकपैक में था, और ख़ाली था। उसका आख़िरी हिस्सा उसने तूफ़ान में ख़र्च कर दिया था, अँधेरे में इस शहर को ढूँढ़ते हुए। अब उसे एक दीवार चाहिए थी।
उसे एक गली के कोने पर एक बार मिला। उसमें ज़िंक का एक काउंटर था, तीन छोटी मेज़ें, और एक बूढ़ा आदमी जो कपड़े से एक कप पोंछ रहा था। दरवाज़े के बग़ल की दीवार पर, 1998 के एक कैलेंडर के नीचे, एक सॉकेट था।
वो बहुत छोटा सॉकेट था। उसमें दो छोटे गोल छेद थे, पास-पास, क्रीम रंग के प्लास्टिक में जो उम्र से पीला पड़ गया था। सांद्रो ने अपना चार्जर निकाला। उसके चार्जर में एक बड़ा गोल प्लग था, दो मोटी पिनों और साइड पर दो धातु की क्लिपों वाला, उत्तरी यूरोप के आधुनिक सॉकेटों के लिए बना, जहाँ का उसके काग़ज़ों के हिसाब से वो लगभग था।
वो नहीं घुसा। घुसने के आसपास भी नहीं था।
“क्षमा कीजिए,” सांद्रो ने कहा। “क्या आपके पास अडैप्टर है?”
बूढ़ा कप पोंछता रहा।
“इस सॉकेट के लिए,” सांद्रो ने कहा। “मेरे प्लग के लिए। प्लास्टिक का एक छोटा अडैप्टर। मैं उसका मूल्य चुकाऊँगा।”
“है एक।”
“धन्यवाद। क्या मैं…”
“वो ग्राहकों के लिए है।”
“मैं ग्राहक बन जाऊँगा।” सांद्रो ने ख़ाली काउंटर को देखा। “मुझे एक कॉफ़ी चाहिए।”
“कॉफ़ी ग्राहक नहीं होती। कॉफ़ी एक आदमी होता है जो मेरे बार में खड़ा है।” बूढ़े ने कप रख दिया। कपड़ा रख दिया। उसने अपने पीछे दीवार पर एक छोटे-से ब्लैकबोर्ड की तरफ़ इशारा किया। उस पर चॉक से लिखा था: लंच। पहला कोर्स, दूसरा कोर्स, साइड, मीठा। 15 यूरो। “ग्राहक लंच करता है।”
“दस बजे हैं।”
“लंच साढ़े बारह बजे है। अभी ऑर्डर करो, अभी पैसे दो, बैठो, मैं तुम्हें अडैप्टर देता हूँ, और साढ़े बारह बजे लंच देता हूँ।”
सांद्रो ने ब्लैकबोर्ड देखा। शब्दों के नीचे, छोटे अक्षरों में, किसी ने आज की डिशें लिखी थीं। रागू वाली ताल्याटेल्ले। टमाटर में मीटबॉल। मटर। राइस केक।
वो ताल्याटेल्ले उसने चार सौ बार देखी थी, नीले एप्रन में, एक शांत ग्रह पर।
उसने ट्रैकर देखा। 9%।
“मैं लंच करूँगा,” उसने कहा।
उसने पंद्रह यूरो दिए। बूढ़े ने एक दराज़ खोली और सफ़ेद प्लास्टिक का एक छोटा, मैला-कुचैला अडैप्टर निकाला, उसे दो उँगलियों के बीच ऐसे उठाया जैसे किसी शहर की चाबी हो, और सांद्रो के हाथ में रख दिया।
वो फ़िट हो गया। ट्रैकर ने एक छोटी, शुक्रगुज़ार आवाज़ की।
सांद्रो सॉकेट के सबसे पास वाली मेज़ पर बैठ गया, घुटने मेज़ के नीचे से टकराते हुए क्योंकि मेज़ छोटे लोगों के लिए बनी थी। बग़ल वाली मेज़ पर काले स्वेटर में एक बूढ़ी औरत बैठी थी, कॉफ़ी और प्लेट में पीले केक का एक टुकड़ा लिए। उसने कुछ देर उसे देखा।
“तुम बहुत लंबे हो,” उसने कहा।
“हाँ।”
“तुम बहुत दुबले हो।”
“हाँ।”
उसने काँटे की धार से अपना केक आधा काटा और प्लेट को मेज़ों के बीच की जगह से उसकी तरफ़ सरका दिया।
“राइस केक,” उसने कहा। “मेरी रेसिपी। ये चुरा लेता है।” उसने काउंटर के पीछे वाले बूढ़े की तरफ़ सिर से इशारा किया। “खाओ।”
सांद्रो ने केक को देखा। वो हल्का सुनहरा और ठोस था, और उसमें से नींबू और बादाम की ख़ुशबू आ रही थी और किनारों पर कुछ गहरी, मीठी चीज़ की। उसने इसके बारे में पढ़ा था।
ट्रैकर पर लिखा था 14%। और उसकी स्क्रीन की सलेटी झिलमिलाहट साफ़ हो रही थी। बर्फ़ में से एक छोटा चमकता बिंदु बन रहा था, यहाँ से उत्तर-पश्चिम में, एक पतली नीली लकीर के बग़ल में।
“मैं नहीं खा सकता,” सांद्रो ने कहा। “धन्यवाद। मुझे अत्यंत खेद है। मैं नहीं खा सकता।”
“क्यों नहीं?”
“मैं काम पर हूँ।”
बूढ़ी औरत ने ऐसा मुँह बनाया जो उसे बहुत समय तक याद रहेगा।
चमकता बिंदु ठहर गया। ट्रैकर ने दूरी पढ़ी, और सड़क, और इमारत। वाया पिएल्ला। बिंदु के बग़ल में नीली लकीर पानी थी। एक नहर, घरों के बीच खुली बहती हुई, एक ऐसी खिड़की के नीचे जो आसमान की तरफ़ खुली थी।
उसने ट्रैकर का प्लग निकाला। उसे जेब में रखा। उसने अडैप्टर मेज़ पर छोड़ दिया, जहाँ उसकी जगह थी, और उसके ऊपर पचास यूरो का एक नोट रख दिया।
“तुम्हारा लंच,” बूढ़ा बोला। “साढ़े बारह बजे।”
“मुझे ज्ञात है,” सांद्रो ने कहा, और ये बरसों में कही गई उसकी सबसे उदास बात थी, और वो मेहराबों में निकल गया।
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