Chapter 8

वाया पिएल्ला की खिड़की

शनिवार, सुबह 11:04। वाया पिएल्ला।

लेओ पंजों के बल गलियारे में गया और बुआ रीना के दरवाज़े की छोटी-सी काँच वाली झिरी पर आँख लगाई।

सीढ़ी के पायदान पर अब तक का सबसे लंबा आदमी खड़ा था जो उसने कभी देखा था। उसने रेन जैकेट, शॉर्ट्स और बहुत साफ़ हाइकिंग सैंडल पहनी थीं। उसकी पीठ पर एक बड़ा बैकपैक था और एक हाथ में काली छतरी, बंद, और वो किसी मूर्ति के सब्र से इंतज़ार कर रहा था।

लेओ गलियारे से वापस आया।

“होटल वाला है,” वो फुसफुसाया। “वो लंबा। नाश्ते वाला।”

“कोई मेहमान?”

“उसके पास छतरी है।”

“सबके पास छतरी है। बारिश हुई थी।” मार्को पसीने के नीचे पीला पड़ गया था। “शायद कोई कलेक्टर है। शायद ख़रीदना चाहता है।”

“सुप्रभात,” दरवाज़े के पार से आवाज़ ने कहा, जैसे उसने उन्हें सुन लिया हो। “व्यवधान के लिए क्षमा चाहता हूँ। मैं उस वस्तु के लिए आया हूँ जो आप होटल बेला विस्ता से ले आए। वो मेरे नियोक्ताओं की है। यदि आप उसे अभी मुझे सौंप दें तो मैं अत्यंत आभारी रहूँगा।”

मार्को ने लेओ को देखा, फिर पीली मेज़ पर रखे गोले को, और फिर, एक धीमे, उम्मीद भरे चेहरे से, वापस दरवाज़े को।

“और फिर?” उसने पुकारा। ज़ोर से नहीं। सँभलकर।

थोड़ी देर चुप्पी रही।

“और फिर मुझे आप दोनों की हत्या करनी होगी,” आवाज़ ने कहा। “मुझे खेद है। ये अनुबंध का हिस्सा है। हर वो व्यक्ति जिसने वस्तु देखी है।” फिर चुप्पी। “मैं इसे भोजन के बाद करना पसंद करता। किंतु मेरा भोजन साढ़े बारह बजे है, और मुझे नहीं लगता कि मैं वहाँ रहूँगा।”

लेओ ने गोला उठा लिया।

उसने ये बिना तय किए किया। वो उसकी छाती से लगकर भारी और गर्म था, जैसे कोई सोता बच्चा उठाया हो या कोई बहुत बड़ी डबलरोटी। उसने उसे अपने साइकिल वाले बैकपैक में ठूँस दिया, जो रसोई के दरवाज़े के पीछे टँगा था, और रोशनी के ऊपर ज़िप बंद कर दी।

“पीछे की सीढ़ियाँ,” वो फुसफुसाया।

“पीछे की सीढ़ियाँ हैं?”

“पीछे की सीढ़ियाँ हमेशा होती हैं।”

उनके पीछे, सामने वाले दरवाज़े पर, एक छोटी-सी आवाज़ हुई। न लात थी, न धड़ाम। एक हल्की, साफ़ क्लिक, जैसे पेन बंद होता है। बुआ रीना का ताला, जिसने चालीस साल चोरों को बाहर रखा था, अपने आप घूम गया। पीतल की ज़ंजीर अपने खाँचे से उठी और हवा में लटक गई, चम्मचों की तरह।

वो तब तक दौड़ चुके थे।

पीछे की सीढ़ियाँ पत्थर के एक तंग रास्ते में उतरती थीं, और रास्ता, एक हरे दरवाज़े से होकर, वाया पिएल्ला पर निकलता था।

वो पुराने घरों की एक छोटी, शांत गली थी, बोलोन्या के रंगों में रँगी: ज़ंग, गेरुआ, और एक गुलाबी जो फीका पड़कर किसी सीपी के अंदर के रंग जैसा हो गया था। यहाँ कोई पोर्टिको नहीं था। आसमान खुला था, तूफ़ान के बाद हल्का नीला। गली के बीच में कुछ टूरिस्ट एक लाइन में खड़े थे, दीवार पर किसी चीज़ के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए।

लेओ और मार्को हरे दरवाज़े से निकले और बाएँ मुड़े।

लंबा आदमी पहले से गली के छोर पर खड़ा था।

लेओ को नहीं पता था कि वो वहाँ कैसे पहुँचा। वो पीछे की सीढ़ियों से नहीं उतरा था। हरे दरवाज़े से नहीं निकला था। वो बस वहाँ था, कोने पर, पीठ पीछे धूप, हाथ में छतरी।

वो दाएँ मुड़े।

“चलो,” मार्को बोला। “चलो, चलो, चलो।”

वो चले। लाइन में खड़े टूरिस्टों ने मुड़कर उन्हें देखा। वो छह थे, दो बच्चों वाला एक परिवार और वॉकिंग शूज़ पहने दो बूढ़े। लाइन उस छोटी-सी खिड़की के लिए थी। लेओ उसके पास से हज़ार बार गुज़रा था बिना उसे देखे। लकड़ी का एक छोटा-सा पल्ला, भूरा पुता हुआ, ईंट की एक सादी दीवार में आदमी की छाती की ऊँचाई पर जड़ा हुआ। बोलोन्या आने वाला हर टूरिस्ट उसे खोलने आता था, क्योंकि उसे खोलो तो दीवार के पीछे घरों के बीच बहती नहर दिखती थी, वेनिस की किसी गली की तरह। लोग फ़ोटो लेते थे। लोग ओह कहते थे। बस इसीलिए थी वो।

उनके पीछे लंबे आदमी ने चलना शुरू कर दिया था। वो दौड़ा नहीं। वो लंबे, बराबर क़दमों से चला, और उसने अपनी छतरी खोल ली।

वो छतरी नहीं थी।

वो खुली छतरी की तरह ही, एक हल्की खटक के साथ। पर उसकी तीलियाँ धातु की नहीं थीं। वो पतली और सफ़ेद थीं और चमक रही थीं, और उनमें से ऐसी आवाज़ आ रही थी जैसे किसी गिलास के किनारे पर उँगली घुमाई जा रही हो। आदमी ने उसे नीचे किया और उनकी तरफ़ ऐसे ताना जैसे टॉर्च तानी जाती है।

पहली मंज़िल की एक खिड़की की सिल पर रखा फूल का एक गमला, जो लेओ और लंबे आदमी के बीच था, काँच में बदल गया। साफ़ काँच, गमला और मिट्टी और फूल, सब। वो वहीं सिल पर रखा रहा, चमकता हुआ, एकदम पूरा, किसी म्यूज़ियम की चीज़ की तरह।

दो बच्चों वाला परिवार उसे घूरता रह गया।

“क्षमा कीजिए,” लंबे आदमी ने उनसे कहा, तमीज़ से, चलते-चलते।

गली एक दीवार पर ख़त्म होती थी। ज़ाहिर है। ये बोलोन्या था। इस शहर में हर भागने का रास्ता किसी आठ सौ साल पुरानी चीज़ पर ख़त्म होता था।

“लेओ,” मार्को बोला। “लेओ, हम क्या करें?”

लेओ छोटी खिड़की को देख रहा था।

परिवार के पिता ने उसे खोल रखा था। वो नहर की फ़ोटो लेने के लिए फ़ोन ऊपर उठाए था। लेओ उसके पास गया, बोला “सॉरी”, उसके हाथ से फ़ोन लिया और उसे वापस थमा दिया, और फिर पल्ले को जितना खुल सकता था उतना धकेल दिया।

खुली जगह क़रीब-क़रीब रसोई की किसी अलमारी जितनी थी। उसके उस पार, तीन मीटर नीचे, हरी नहर घरों की पीठ के बीच से फिसलती जा रही थी, लोहे की छोटी बालकनियों के नीचे, कपड़े सुखाने की रस्सियों के नीचे।

“लेओ,” मार्को बोला। “नहीं।”

“गहरी नहीं है।”

“तुम्हें कैसे पता?”

“मैं यहीं बड़ा हुआ हूँ। हम इसमें साइकिलें फेंकते थे।”

“लेओ, तुम इकतालीस साल के हो!”

लंबा आदमी दस मीटर दूर था। छतरी भिनभिना रही थी। वॉकिंग शूज़ वाले दोनों बूढ़े दीवार से चिपक गए थे।

लेओ ने बैकपैक के पट्टों में बाँहें डालीं, उसे घुमाकर छाती पर कर लिया, और छोटी खिड़की में चढ़ गया। वो खिड़की देखने के लिए बनी थी, उसमें से निकलने के लिए नहीं। वो फिर भी उसमें से निकला, पहले कंधे, फिर बाक़ी सब, दोनों कोहनियों की खाल छिलवाते हुए, और एक लंबे सेकंड तक वहीं लटका रहा, आधा बोलोन्या में और आधा वेनिस में।

अपने पीछे उसने मार्को को सुना। मार्को दूसरी तरफ़ दौड़ रहा था, वापस गली के ऊपर, परिवार के पास से, लंबे आदमी के पास से, उसकी सरसों वाली जैकेट पीछे उड़ती हुई। और वो कंधे के ऊपर से वो एक लाइन चिल्ला रहा था जो उसे किसी भी फ़िल्म की किसी भी लाइन से ज़्यादा प्यारी थी।

“बंदूक़ छोड़ो! कन्नोली उठाओ!”

लेओ गिर पड़ा।

पानी ठंडा था। वो उसकी कमर तक आया, फिर छाती तक, क्योंकि वो ग़लत ढंग से गिरा था, और फिर उसके पैरों को तली के पत्थर मिले और वो खड़ा हो गया, हाँफता हुआ, बाल आँखों पर और बैकपैक छाती से लगा। गोला कैनवस के आर-पार भिनभिना रहा था। उसने उसे दोनों हाथों से सिर के ऊपर उठा लिया, पानी से बाहर।

उसके ऊपर, छोटी खिड़की के चौखटे में, एक बहुत लंबा आदमी नीचे देख रहा था।

उसने लेओ को देखा। उसने पानी को देखा। उसने एक लंबे पल तक अपने पैरों को देखा, उनकी बहुत साफ़ सैंडलों में।

फिर धारा ने लेओ को पकड़ लिया, धीरे से, और उसे घुमाया, और बहा ले गई, ईंट की एक नीची मेहराब के नीचे और घरों के नीचे की छाया में।

वहाँ अँधेरा था, और हरा, और पत्थर की गंध थी। ऊपर इमारतों के बीच की दरारों से रोशनी सलाख़ों की तरह नीचे आ रही थी। लेओ तैरता रहा, और चलता रहा, और तैरता रहा, एक चमकते गोले को सिर के ऊपर ऐसे उठाए जैसे वेटर ट्रे उठाता है। वो एक बालकनी के नीचे से गुज़रा। बालकनी पर ड्रेसिंग गाउन में एक औरत रस्सी पर चादर टाँग रही थी।

उसने ऊपर से उसे देखा, और उस चीज़ को जो वो उठाए था, और पानी पर पड़ती उसकी रोशनी को।

“फिर से नहीं,” उसने कहा, और अपनी चादर पर लौट गई।

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