Chapter 5

एपिसोड 5 — घंटाघर

जिस साल उसके बाबूजी गुज़रे, शहर ने एक घड़ी बनाने का फ़ैसला किया।

उन्होंने उसे वहाँ बनाया जहाँ छह सड़कें मिलती थीं, एक ऊँची मीनार जिसका एक मुँह हर सड़क की तरफ़ था, ताकि तुम किसी भी तरफ़ जा रहे हो, वक़्त तुम्हें ढूँढ़ ले। पहला पत्थर रखने एक बड़ी मेमसाहब आईं। ये एक स्थानीय आदमी की याद में था, अब गुज़र चुका, और उस पर उसका नाम होगा, और लोग सौ साल तक कहेंगे घंटाघर पर मिलना, बिना एक बार भी उसके बारे में सोचे।

अंतिम संस्कार के अगले हफ़्ते मोहन ने बाबूजी की दराज़ टटोली और कपड़े में लिपटी लाल बही पाई। उसने पहला पन्ना खोला, नुस्ख़ा, बाबूजी की धीमी, ईमानदार लिखावट में, हर वज़न, हर क़दम, ऐसे लिखा कि कोई अजनबी भी ठीक बना ले। और नीचे की पंक्ति: पानी भोर से पहले भरना, शहर के जागकर उसे गंदा करने से पहले।

वो उसे अभी हाथ में लिए ही था कि शीला अंदर आई।

“ये क्या है?”

“इनकी बही। नुस्ख़ा। पूरा। सच्चा तरीक़ा।”

उसने कंधे के ऊपर से थोड़ा पढ़ा। “तो फिर से वैसे बनाओ,” उसने कहा। “जंग ख़त्म हो गई। बाज़ार में अब घी है।”

“घी है। और दो गली आगे रत्तन का पोता है, काँच की अलमारी से चटक नरम मिठाइयाँ मेरे आधे दाम पर बेचता हुआ। और शनिवार को कोहिनूर की भीड़ है, जिसे आख़िरी शो से निकलते हुए हाथ में कुछ सस्ता चाहिए।” उसने बही बंद कर दी। “अगर सच्चे तरीक़े से बनाऊँ तो तीन गुना दाम लेना पड़ेगा। और देहरा में कोई नहीं देगा। लोगों ने दूसरी चीज़ के पैसे देना सीख लिया है। शहर अब सच का ख़र्च नहीं उठा सकता, शीला। ये मेरी करनी नहीं है। मैं बस वो इकलौता आदमी बनने से चूक गया जो मना कर देता। इसकी कोई जेल नहीं होती।”

“तो फिर बही को ऐसे क्यों पकड़े हो जैसे गरम हो?”

उसने इसका जवाब नहीं दिया। उसने बही को वापस कपड़े में लपेटा और दराज़ की एकदम तली में रख दिया, बहीखातों और सुतली और फ़ालतू बाटों के नीचे, जहाँ हर बार छुट्टे निकालने के लिए हाथ डालते हुए उससे सामना न हो। उसने उसे जलाया नहीं। आदमी अपने बाप की लिखावट नहीं जलाता। उसने बस उसे दबा दिया, दुकान के रोज़ के काम के नीचे।

फिर वो बाहर सड़क पर गया और बोर्ड को देखा। शुद्ध घी ही। रंग उतर रहा था, और तिरछा आख़िरी अक्षर सबसे ज़्यादा उतरा था।

शीला आकर उसके बग़ल में खड़ी हो गई।

“इस पर रंग फेर दो,” उसने कहा। उसे हैरानी हुई। “अगर इसे निभाओगे नहीं तो उतार दो। फिर कम से कम ये बस एक दुकान होगी, ऐसी दुकान नहीं जो ग्राहक के अंदर क़दम रखने से पहले ही झूठ बोलती हो।”

“इससे ग्राहक आते हैं।”

“इसीलिए तो ये झूठ है, ग़लती नहीं।”

“बाबूजी ने लिखा था।”

“बाबूजी ने इसलिए लिखा था क्योंकि ये सच था,” शीला बोली। “तुम इसे इसलिए रखे हो क्योंकि ये काम का है। दोनों एक वजह नहीं हैं, और तुम ये जानते हो, नहीं तो अब तक रंग फेर चुके होते, बजाय सड़क पर खड़े होकर बीवी से बहस करने के।”

मोहन देर तक बोर्ड को देखता रहा।

“रहने दो,” उसने आख़िर में कहा। “उनकी ख़ातिर।”

पर ये आधी बात थी, और शीला बाक़ी आधी जानती थी, और उसने उससे कहलवाया नहीं, कि शुद्ध के पैसे मिलते थे चाहे वो सच हो या न हो, और उसने एक बार, मन ही मन, एक टिन नाली की तरफ़ फेंका था, और सीख लिया था कि वो उस तरह का आदमी नहीं है जो फेंक सके।

उसकी बहन चंपा उस जाड़े में अपने ससुराल वाले शहर से आई, चालीस पार, बालों में सफ़ेदी आती हुई। पहली शाम उसने दिन की थाल से एक टुकड़ा उसे दिया, गर्व से, चाहता था कि वो देखे कि दुकान बच गई, जंग से, मौत से, बुरे सालों से।

उसने धीरे-धीरे खाया। उसके चेहरे ने वही किया जो चारपाई पर उनके बाबूजी के चेहरे ने किया था।

“ये वैसा नहीं है,” उसने कहा।

उसके पास वाक्य तैयार था। सालों से उसे तेल लगाकर रखा था। “ज़माना है, दीदी। हर चीज़ थोड़ी-सी —”

“मत।” ग़ुस्से में नहीं। उसने काउंटर पर उसके हाथ पर अपना हाथ रखा, जैसे बचपन में रखती थी जब वो कोई छोटी ग़लती करता था। “मैंने बचपन में ये मिठाई दस हज़ार बार तौली है। मैं इसे अपने हाथों में जानती हूँ। तुझे मुझे कहानी सुनाने की ज़रूरत नहीं।”

“तो फिर आप क्या चाहती हैं कि मैं कहूँ?”

“कुछ नहीं। मैं तुझसे कुछ कहना चाहती हूँ।” उसने उसका हाथ थपथपाया। “मुझे पता है। बस। एक और ज़िंदा इंसान को पता है, ताकि तू ये अकेले न ढोए। जब बाबूजी ने आख़िर में इसे चखा था, तो उनके पास अँधेरे के सिवा कहने को कोई नहीं था। मैं तेरे लिए वो नहीं चाहती थी।” उसने हाथ छोड़ दिया। “इसीलिए मैं इतनी दूर आई हूँ। मिठाई के लिए नहीं।”

मोहन ने काउंटर को देखा, अब तक तीन जोड़ी हाथों से घिसकर चिकना हुआ, और अपनी बहन की तरफ़ नहीं देख सका।

“आप अपने बच्चों को बताएँगी?” उसने पूछा। “सच्चा तरीक़ा। ताकि ये खो न जाए।”

चंपा चुप रही। “मेरे बच्चे लड़कियाँ हैं, और वो दूसरे घरों में, दूसरे नामों में ब्याही जाती हैं। बही तेरी है, रख या खो। मैं तो बस वो हूँ जिसे स्वाद याद है।” वो उदासी से मुस्कुराई। “और याद किया हुआ स्वाद उसी मुँह के साथ मर जाता है जो उसे याद रखता है। तेरे पास कुछ साल और हैं ये तय करने के लिए कि दुकान एक बही के साथ मरेगी या एक झूठ के साथ जिएगी। ये तेरा फ़ैसला है, भाई, मेरा नहीं। मैं किसी क़ीमत पर इसे नहीं ढोऊँगी।”

वो महीने के आख़िर में अपने ससुराल लौट गई, आख़िरी ज़िंदा इंसान जिसने बचपन में सच्चे तरीक़े की मिठाई खाई थी और मुँह में फ़र्क़ का नाम ले सकती थी। जब वो गई, तो जानकारी उसके साथ चली गई, और बस चुप्पी रह गई, दराज़ की तली में, एक लाल कपड़े वाली बही में जिसे कोई नहीं खोलता था।

शहर के बीच उन्होंने घड़ी पूरी कर ली, और एक मंत्री आए, और बड़ी-बड़ी सुइयाँ चला दीं। उस दिन से वक़्त एक साथ छहों सड़कों पर नीचे देखता और हर किसी को ढूँढ़ लेता।

उसने दराज़ में कभी एक बार भी नहीं झाँका।

बारह दशक। एक मिठाई की दुकान। पानी इतनी धीरे-धीरे बिगड़ता है कि कोई नहीं बता सकता कि किस साल बिगड़ा।

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