इसकी क़ीमत क्या है
कबीर ने अपनी मम्मी के साथ जो सबसे मेहरबान काम किया, वो उसने जान-बूझकर किया, ये मानते हुए कि वो एक तोहफ़ा है।
क्योंकि कबीर का मददगार होना ख़त्म नहीं हुआ था, और सबसे मददगार बात, सबसे मेहरबान बात, वो बात जो वो बचाकर रख रहा था क्योंकि वो उसकी मम्मी के बारे में सबसे अच्छी बात थी और मिसेज़ भाटिया को साफ़ तौर पर ये पता नहीं थी, अब भी उसके अंदर थी, और वो बाहर आ गई।
“मेरी मम्मी को अभी वो नीला कोट चाहिए था,” उसने मिसेज़ भाटिया से गर्मजोशी से कहा, एक कोट वाले से दूसरे कोट वाले तक। “वो वाला, उधर। उन्होंने उसे पहनकर देखा जब उन्हें लगा कोई नहीं देख रहा, और फिर वापस रख दिया। वो ऐसा करती हैं। उन्हें कोई चीज़ चाहिए होती है, और वो उसे वापस रख देती हैं, और उदास भी नहीं दिखतीं। मैंने जितने लोग देखे हैं उनमें वो इसमें सबसे अच्छी हैं। आपको कभी उन्हें ये करते देखना चाहिए। कमाल की बात है।”
एक छोटी-सी चुप्पी छा गई, उस तरह की जिसका फ़र्श बहुत नीचे होता है।
“ओह,” मिसेज़ भाटिया बोलीं। और उनके चेहरे ने ख़ुद को उस सँभले हुए, दयालु, भयानक भाव में ढाल लिया जो लोग तब पहनते हैं जब उन्हें कोई ऐसी चीज़ थमा दी गई हो जिसे वो पकड़ना नहीं चाहते थे। “ओह, सुमन।”
“ये बातें बनाता है,” सुमन बोली। अच्छा वाला सुर जा चुका था। उसके नीचे जो था वो सधी हुई आवाज़ भी नहीं थी। वो बस एक आवाज़ थी। “सात साल का है। बच्चे बातें बनाते हैं।”
“बिल्कुल,” मिसेज़ भाटिया ने नरमी से कहा, जो वो सबसे बुरी बात थी जो वो कह सकती थीं, क्योंकि उसका मतलब था कि उन्हें पता था वो नहीं बनाता।
“हमें आपको जाने देना चाहिए,” सुमन बोली। “पहाड़। आरव को मेरा प्यार देना।”
और वो कार्ट धकेलकर काउंटर तक ले गई, दूर वाले नहीं, पापा वाले नहीं, और फ़्लायर और उस ठीक-ठीक, सँभले हुए अंक से पैसे दिए, और बाहर निकलते हुए जब वो फिर नीले कोट के पास से गुज़रे तो उसे नहीं देखा, और ठंडी पार्किंग में कंधे सीधे किए चलती रही, और तारा को बेल्ट से बाँधा, और गाड़ी में बैठी, और उसे स्टार्ट नहीं किया।
कबीर पीछे चुप्पी में बैठा रहा।
“आप चुप क्यों हैं,” उसने पूछा।
कुछ नहीं।
“ये नियम है? कि अब हम चुप रहेंगे?”
कुछ नहीं।
“अगर नियम है तो मुझे जानना है किसने बनाया। ताकि मैं उनसे पूछ सकूँ क्यों।”
उसकी मम्मी, जिनके पास हर मौक़े के लिए हमेशा एक आवाज़ तैयार रहती थी, इसके लिए कोई आवाज़ नहीं रखती थीं। वो स्टीयरिंग पर हाथ रखे बैठी रहीं और गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई, और उस न-होने ने पूरी ठंडी गाड़ी भर दी, और कबीर को धीरे-धीरे, अपने बिल्कुल किनारे पर, समझ आने लगा कि उसने कुछ किया है, हालाँकि वो अभी देख नहीं पा रहा था कि क्या, क्योंकि वो एक ऐसी चीज़ से बना था जिस पर वो यक़ीन नहीं करता था।
उसने वो चाल आज़माई जो सब पर काम करती थी। वो मिस ढिल्लों पर काम आई थी और सब्स्टिट्यूट पर और प्रिंसिपल पर। वो हमेशा काम करती थी।
“उदास होने का इंचार्ज कौन है,” उसने कहा। “आप, या उदासी?”
आमतौर पर तब कोई बड़ा उसकी तरफ़ देखता, और अपने अंदर का छेद ढूँढ़ लेता, और कोई सच्ची चीज़ बाहर चढ़ आती, और उसके बाद सब बेहतर होता।
उसकी मम्मी की आँखें विंडशील्ड पर टिकी रहीं। कोई छेद नहीं था। या छेद था, और उसकी कोई तली नहीं थी जो उसे दिखती, और ज़िंदगी में पहली बार एक सच्चा सवाल किसी इंसान के अंदर गया और वापस नहीं आया।
उन्होंने गाड़ी स्टार्ट की। वो उस तरह की चुप्पी में घर तक गए जो टाइम-टेबल नहीं होती और जिससे बहस नहीं की जा सकती।
घर पर वो रसोई में गईं और काउंटर के पास खड़ी हो गईं और बत्ती नहीं जलाई।
कबीर दरवाज़े में खड़ा रहा। उसके पास सौ सच्ची बातें थीं और उनमें से एक भी इसकी चाबी नहीं थी। उसने नहीं कहा कि आज सुबह मोज़ा ग़लत था। उसने नहीं कहा कि कैलेंडर एक एहसास है। उसने क्यों नहीं पूछा। आख़िरकार उसका सामना एक ऐसी चीज़ से हुआ था जिसे वो देख नहीं सकता था और जिसका नाम लेकर उसके पार नहीं जा सकता था, और वो अँधेरे में काउंटर के पास खड़ी थी, उसकी मम्मी बनी हुई।
तो उसने रसोई पार की, और उनका हाथ पकड़ा, वो वाला जो काउंटर का किनारा नहीं पकड़े था, और उसे थामे रखा, और कुछ भी नहीं कहा।
ये काफ़ी नहीं था। उसे पता था कि ये काफ़ी नहीं था। उसने फिर भी थामे रखा।