कबीर ने क्या सँभाला
रिपोर्ट कार्ड शुक्रवार को घर गए, सील बंद लिफ़ाफ़ों में, सामने बच्चे का नाम और अंदर माँ-बाप की फ़िक्र पहले से भरी हुई।
कबीर, आम तौर पर, फ़िक्र नहीं करता था। फ़िक्र एक ऐसी दराज़ में रहती थी जिसे खोलना उसने कभी नहीं सीखा था। पर इस हफ़्ते उसने बहुत-सी ऐसी दराज़ें खोली थीं जिनके होने का उसे पता ही नहीं था, और अब, सामने गिल, कबीर लिखा लिफ़ाफ़ा पकड़े, उसने पाया कि वो उसे ऐसे पकड़े है जैसे कोई ऐसी चीज़ पकड़ी जाती है जो फट सकती हो।
“क्या ये ख़राब है?” उसने आरव से पूछा।
“जब तक तुम्हारी मम्मी न खोलें, पता नहीं चलता। लिफ़ाफ़े का पूरा मतलब यही है।” आरव ने, जिसके रिपोर्ट कार्ड ऐसे मौक़े होते थे जिन्हें भाटिया परिवार फ़्रेम कराता था, ये प्यार से कहा। “तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है? तुम्हें कभी फ़र्क़ नहीं पड़ता।”
“अब पड़ता है,” कबीर बोला, और समझाया नहीं, क्योंकि समझाना एक स्टोर में रहता था, और एक पार्किंग में, और एक नीले कोट में, और उसने वादा किया था कि उसमें से कम से कम कुछ अंदर रखेगा।
दिन का आख़िर था, कोट-और-बूट वाली भगदड़, जब कबीर ने नोटबुक देखी।
वो मिस ढिल्लों की थी। निजी वाली, छोटी, सलेटी, जिसमें वो लिखती थीं और जिसमें से कभी ज़ोर से नहीं पढ़ती थीं, और वो उनकी डेस्क पर खुली पड़ी थी, और मिस ढिल्लों अपनी डेस्क पर नहीं थीं। वो खिड़की के पास कमरे की तरफ़ पीठ किए खड़ी थीं, अपनी साँस वाली एक्सरसाइज़ करती हुईं, चार अंदर, चार रोको, वैसे जैसे वो तब करती थीं जब दिन ऐसा रहा हो जिसे इसकी ज़रूरत हो, और कबीर उस साँस को जानता था, क्योंकि उसने एक बार एक सब्स्टिट्यूट को उसे उधार लेते देखा था।
उसने खुली नोटबुक को देखा। कोई भी उसे पढ़ सकता था। उसके और दरवाज़े के बीच बीस बच्चे और उनके बूट थे, और कोई भी रुककर उस टीचर की निजी सलेटी किताब पढ़ सकता था जो खिड़की के पास खड़ी, देख नहीं रही थी।
तो कबीर ने, जो सबको सब कुछ बता देता था, जिसने ज़िंदगी में कभी किसी राज़ की रक्षा नहीं की थी क्योंकि उसे कभी समझ ही नहीं आया था कि राज़ होते हैं, नोटबुक धीरे से बंद की और अपने बैग में रख ली, उसे सुरक्षित रखने के लिए, उसे लौटाने के लिए, क्योंकि उसने इस हफ़्ते, मुश्किल से, एक पार्किंग में, सीखा था कि किसी इंसान की छिपी चीज़ें असली होती हैं, और टूट सकती हैं, और टूटना पलटता नहीं।
उसका इरादा उसे सोमवार को लौटाने का था। उसे ख़ुद पर गर्व था। उसने एक निजी चीज़ की रखवाली की थी। ये उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ों वाला काम था, और ये, ज़ाहिर है, एक तबाही थी, क्योंकि अब छोटी सलेटी नोटबुक एक सात साल के बच्चे के बैग में एक सील बंद लिफ़ाफ़े के बग़ल में, बर्फ़ के बीच से घर जा रही थी।
घर पर सुमन लिफ़ाफ़े का वैसे इंतज़ार कर रही थी जैसे अब वो सारे लिफ़ाफ़ों का करती थी, यानी बुरी तरह।
सुमन होने के लिए ये मुश्किल हफ़्ता रहा था। वो एक स्टोर में खड़ी रही थी और उसके अपने बच्चे ने उसे मूस जॉ की उस इकलौती औरत के सामने बिखेर दिया था जिसकी अच्छी राय की तरफ़ वो दो साल से गिन-गिनकर क़दम बढ़ा रही थी, और वो सँभली नहीं थी, क्योंकि सँभलना होता ही नहीं, बस अगली चीज़ होती है, और अगली चीज़ थी रिपोर्ट कार्ड। रिपोर्ट कार्ड एक पन्ना था जिस पर कोई अजनबी लिखता था कि गिल परिवार उस इकलौते काम में कैसा कर रहा है जिस पर सुमन को अब भी गर्व करने की इजाज़त थी। वो एक हफ़्ते से इससे डर रही थी।
“बैग,” उसने कहा, जब कबीर अंदर आया। “दिखाओ।”
कबीर ने उसे बैग दे दिया। वो उनका चेहरा देख रहा था, जो नई बात थी। उसने सात साल लोगों के चेहरे न देखने में बिताए थे, इस सिद्धांत पर कि चेहरे झूठ बोलते हैं और सिर्फ़ शब्द सच होते हैं, और इस हफ़्ते ने उसे सिखाया था कि चेहरे वो जगह हैं जहाँ सच्ची बातें तब जाती हैं जब शब्दों ने उन्हें अंदर रखने का वादा किया हो।
सुमन ने बैग खोला और लिफ़ाफ़ा निकाला, और उसके नीचे, छोटी सलेटी नोटबुक।
“ये क्या है।”
“वो मेरी नहीं है,” कबीर जल्दी से बोला। “मत खोलिए। वो मिस ढिल्लों की है। उनकी निजी वाली। मैं उसे सुरक्षित रख रहा था। आपको उसे नहीं पढ़ना चाहिए। किसी को नहीं। उसके निजी होने का पूरा मतलब यही है।”
पर सुमन उसे खोल चुकी थी, वैसे जैसे कोई चीज़ हाथों से खुल जाती है इससे पहले कि तमीज़ हाथों तक पहुँचे, और उसकी नज़र एक पन्ने पर पड़ चुकी थी, और पन्ना अपना काम शुरू कर चुका था।