स्टेप तीन
2026 · गुड़गाँव · रात 1:14
प्लान में सैंतालीस स्टेप थे, और पुरम को हर एक से प्यार था।
उसने उन्हें हाथ से एक हरी नोटबुक में लिखा था, फिर टाइप किया था, फिर प्रिंट किया था, फिर दोबारा हाथ से लिखा था, क्योंकि टाइपिंग में ग़लतियाँ होती हैं। स्टेप एक था लॉन्ड्री वैन। स्टेप दो था सर्विस लिफ़्ट। स्टेप तीन था इकतीसवीं मंज़िल का गार्ड, जो हर रात 1:20 पर अपने फ़ोन के साथ ग्यारह मिनट के लिए बाथरूम जाता था।
1:14 हो चुके थे। पुरम चार स्क्रीनों और ठंडी चाय के एक कप के साथ लॉन्ड्री वैन के पीछे बैठा था। एक स्क्रीन पर स्वर्णा डायनैमिक्स टावर गुड़गाँव के नारंगी धुएँ वाले आसमान में उठ रहा था, सारा काँच और पैसा। दूसरी स्क्रीन पर काली जैकेट में एक आकृति इकतीसवीं मंज़िल के गलियारे में चल रही थी।
चल रही थी। इंतज़ार नहीं कर रही थी।
“कांची,” पुरम ने हेडसेट में कहा। “कहाँ हो?”
“गलियारे में।” उसकी आवाज़ धीमी और ख़ुश थी। यही ख़ुशी उसे परेशान करती थी।
“कौन-से गलियारे में?”
“जिसमें गार्ड है।”
पुरम ने चाय रख दी। “स्टेप तीन है: तुम सीढ़ियों में इंतज़ार करोगी जब तक वो बाथरूम न जाए। तुमने स्टेप तीन पढ़ा है। हमने साथ में स्टेप तीन पढ़ा था। तुमने कहा था, मैं शब्दशः बोल रहा हूँ, ‘ठीक है पुरम, स्टेप तीन, समझ गई।’”
“वो बाथरूम नहीं जाने वाला।”
“वो 1:20 पर जाता है। हर रात। मैंने नौ रातें उसे देखा है।”
“वो ऊबा हुआ लग रहा है, उनींदा नहीं। ऊबे हुए आदमी बाथरूम नहीं जाते। ऊबे हुए आदमी कुछ करने को ढूँढ़ते हैं।” स्क्रीन पर आकृति मोड़ पर रुकी। “तो मैं उसे कुछ करने को दे रही हूँ।”
“कांची। नहीं।”
वो मोड़ मुड़ गई।
पुरम ने गार्ड को खड़े होते देखा। उसने कांची को गार्ड की तरफ़ मुस्कुराते देखा, कुछ कहते देखा, और गलियारे में पीछे की तरफ़ इशारा करते देखा। उसने गार्ड को माथे पर बल डालकर उधर देखते देखा जिधर वो इशारा कर रही थी। फिर गार्ड तेज़ी से गलियारे में दूसरी तरफ़ चला गया, एक हाथ रेडियो पर, और कांची उल्टी तरफ़ चली, धीरे-धीरे, वॉल्ट के दरवाज़े की ओर।
“तुमने उससे क्या कहा?”
“मैंने कहा कि मैं सफ़ाई वाली कंपनी से हूँ और सीईओ के दरवाज़े के नीचे से पानी आ रहा है।”
“नहीं आ रहा।”
“आएगा। ऊपर आते हुए मैंने उसका सिंक खोल दिया था।”
पुरम ने आँखें बंद कीं। “ये प्लान में नहीं है।”
“प्लान बस एक सुझाव है।”
“प्लान,” पुरम ने कहा, “सैंतालीस स्टेप है।”
“अब चौवालीस। तीन छोड़ दिए।” उसकी आवाज़ धीमी हो गई। “दरवाज़ा।”
वॉल्ट का दरवाज़ा स्टील और काँच का था, कीपैड, कार्ड रीडर और एक छोटी काली आँख के साथ जो तुम्हारा चेहरा देखती थी। पुरम ने उस आँख पर एक महीना लगाया था। उसने टाइप किया, और दरवाज़े को एक पसंद का चेहरा मिल गया, और क्लिक हुआ।
“अंदर,” कांची ने कहा।
उसने उसकी जैकेट वाले कैमरे पर स्विच किया। कमरा ठंडा और सफ़ेद और बहुत साफ़ था। काँच के केस क़तारों में खड़े थे, हर एक के साथ एक लाइट और एक कार्ड। एक जेड का घोड़ा। एक ऐसी भाषा की किताब का पन्ना जो अब कोई नहीं बोलता। एक सोने का सिक्का जिस पर किसी राजा का चेहरा घिसकर सपाट हो गया था।
“ये सब देखो,” कांची ने धीरे से कहा। “ये सब उसने चुराया है।”
“उसने ये सब ख़रीदा है।”
“उन लोगों से जिन्होंने चुराया। वो और बुरा है। काग़ज़ात के साथ चोरी।” वो केसों के पास से गुज़री। “लॉट 9 कहाँ है?”
“पीछे की दीवार। केस बारह। उसका अपना अलार्म है, तो मत —”
“पुरम।”
“क्या?”
“केस बारह है ही नहीं।”
वो स्क्रीन की तरफ़ झुका। पीछे की दीवार पर केस एक से ग्यारह थे, फिर एक ख़ाली जगह, फिर एक सादी धातु की शेल्फ़। वैसी शेल्फ़ जो किसी गैराज में मिलती है। शेल्फ़ पर, आसपास कुछ नहीं, न काँच, न लाइट, न कार्ड, एक गोल, चपटी चीज़ रखी थी, किसी छोटी प्लेट जितनी।
“ये ठीक नहीं है,” पुरम ने कहा।
“पर हमारी चीज़ यही है।” कांची उसके पास गई। “कांसा। पुराना। बहुत पुराना। इस पर हरापन देखो।” उसका कैमरा पास गया। डायल उम्र से हरा-भूरा था, पर उसके किनारे पर छोटे-छोटे खाँचों की एक अँगूठी थी, और वो खाँचे साफ़ और चमकीले थे, जैसे कोई उन्हें रोज़ पॉलिश करता हो। “ऐसी चीज़ कोई शेल्फ़ पर नहीं रखता।”
“किसी ने रखी है।”
“तो ये जाल है।”
“शायद।”
“बढ़िया,” कांची ने कहा, और उसे उठा लिया।
पुरम की साँस रुक गई। कुछ नहीं हुआ। कोई अलार्म नहीं। कोई लाइट नहीं। सफ़ेद कमरा सफ़ेद और ख़ामोश रहा। स्क्रीन पर कांची ने दस्ताने वाले हाथों में डायल को पलटा।
“ये गरम है,” उसने कहा।
“लैंप के नीचे रखा था।”
“यहाँ कोई लैंप नहीं है।”
पुरम ने देखा। कोई लैंप नहीं था।
“बैग में डालो,” उसने कहा। “और घर आओ। सीढ़ियों से। स्टेप इकतीस।”
“स्टेप बत्तीस क्या है?”
“स्टेप बत्तीस है: किसी से बात मत करना।”
“बोरिंग,” कांची ने कहा, और उसे उसकी मुस्कान सुनाई दी।
वो 1:31 पर सर्विस दरवाज़े से निकली, पीठ पर बैग और बाल खुलते हुए, और वैन में आकर उसकी स्क्रीनों के बीच फ़र्श पर ऐसे बैठ गई जैसे अभी-अभी दुकान से लौटी हो।
“हाय,” उसने कहा।
“तुमने एक आदमी का सिंक खोल दिया।”
“अच्छा सिंक है। मार्बल का।” उसने दाँतों से दस्ताने खींचे। “चलाओ।”
पुरम ने चलाई। लॉन्ड्री वैन गार्ड के केबिन, बैरियर और गमलों वाले खजूर के पेड़ों के पास से निकलकर ख़ाली सड़क पर आ गई, और कोई पीछे नहीं आया। पहले मिनट में उसने ग्यारह बार शीशा देखा। कुछ नहीं।
“कोई पीछे नहीं है,” कांची ने कहा।
“यही तो परेशानी है।”
“तुम्हें हर चीज़ से परेशानी है।”
“हर चीज़ से तुम्हें परेशानी होनी चाहिए। हम अभी-अभी एक अरबपति के वॉल्ट से एक ऐसी चीज़ लेकर निकले हैं जिसे उसने ताले में नहीं रखा।” वो हाइवे पर मुड़ा। शहर की बत्तियाँ धुएँ में पीली गुज़र रही थीं। “कमरे की सबसे क़ीमती चीज़ गैराज वाली शेल्फ़ पर कौन रखता है?”
“वो जो चाहता हो कि उसे ले जाया जाए।”
कांची एक पल चुप रही। फिर उसने बैग खोला, डायल निकाला और घुटनों पर रख लिया। गुज़रती बत्तियों में उसके किनारे के चमकीले खाँचे एक के बाद एक चमके, छोटी-छोटी खिड़कियों की लड़ी की तरह।
“या,” उसने कहा, “वो जो चाहता हो कि हम ले जाएँ।”
पुरम ने नज़र सड़क पर रखी। “रात के दो बजे ऐसी बातें मत करो।”
“एक बजकर छत्तीस मिनट हुए हैं।”
उसने डैशबोर्ड की घड़ी देखी। 1:36।
उसने अपना फ़ोन देखा। 1:36।
दस सेकंड बाद भी डैशबोर्ड की घड़ी 1:36 थी। फ़ोन भी। कांची की सस्ती प्लास्टिक घड़ी भी, जो उसने छह साल से हर जॉब पर पहनी थी, जिसके बारे में वो कहती थी कि लकी है।
पुरम कुछ नहीं बोला। वो गाड़ी चलाता रहा, और मिनट को देखता रहा, और मिनट नहीं बदला। कांची के घुटनों पर डायल अँधेरे में गरम और स्थिर पड़ा रहा, और वैन बहुत, बहुत ख़ामोश थी।