एपिसोड 20: किसी और का घर
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
खुशी ने उसे तब पकड़ा जब कुर्सियाँ समेटी जा रही थीं।
“तूने एक भी फ़ोटो नहीं खींची।”
गोपिना ने अपने हाथों में कैमरा देखा। “मैं नोट्स ले रही थी।”
“बिना कॉपी के?”
खुशी गलियारे की दीवार से टिकी खड़ी थी, बाँहें बाँधे, और उसके चेहरे पर वो नज़र थी जो कह रही थी कि वो इसका ज़रूरत से ज़्यादा मज़ा ले रही है।
“फ़ोटो उनसे ले लूँगी।” गोपिना ने ज़िले के अख़बार वाले की तरफ़ इशारा किया, जो पहले ही सामान बाँध रहा था।
“ज़रूर लेगी।”
“लूँगी।”
“मुझे यक़ीन है।” खुशी दीवार से हटी और उसके बराबर चलने लगी। “मैंने प्लांट ऑफ़िस में किसी से बात की है। उस रिकॉर्ड के बारे में।”
गोपिना रुक गई।
“एचआर ने कहा वो फ़ाइल देखेंगे। बस इतना। कहा वो देखेंगे। कोई वादा नहीं, कोई तारीख़ नहीं। लेकिन फ़ाइल उनके पास है, मतलब कुछ तो मिल सकता है।”
“ये अच्छा है।”
“कम से कम अब कोई देख तो रहा है।”
“खुशी।”
“बड़ी बात मत बना। मैंने एक इंसान से एक सवाल पूछा। बस इतना था।”
“शुक्रिया।”
“लेबर ऑफ़िस में बोल चुकी है। एक बार काफ़ी है।” वो रुकी। “अगली बार फिर आना। साल में दो बार करते हैं।”
वो साइड गेट के पास थीं अब। पीछे आँगन ख़ाली हो रहा था। मनि उनके रास्ते से गुज़री, गिलास इकट्ठे कर रही थी, ट्रे पर उस तेज़ी से सजा रही थी जो हज़ार बार करने से आती है।
“खुशी, तेरी माँ बीस मिनट पहले गई है।”
“पता है, मनि।”
“ड्राइवर गाड़ी में इंजन चालू करके बैठा है।”
“बच जाएगा।”
“तू पैदल चलती है तो उसे घबराहट होती है।”
“सबको घबराहट होती है जब मैं पैदल चलती हूँ। उनकी समस्या है।”
मनि ने सिर हिलाया। फिर उसने गोपिना को देखा और चेहरा बदल गया। नाटक नहीं। कुछ और धीमा। उसने ट्रे नीचे रखी।
“चाय-पानी हो गया? काफ़ी मिला?”
“हाँ। शुक्रिया। सब कुछ के लिए।”
“फिर आना,” मनि ने कहा। “जब भी कुछ हो। कुर्सियाँ भरने को हमेशा चाहिए।” उसने ट्रे उठाई। उसने गोपिना को एक बार और देखा, वैसे ही जैसे आते वक़्त देखा था।
फिर वो चली गई, अपने गिलासों और अपनी मालाओं और अपने घर में वापस जो गोपिना का घर नहीं था।
· · ·
गोपिना साइड गेट से बाहर निकली, लोडिंग बे के पार, गार्ड ने बाहर जाते हुए फिर से कार्ड चेक किया।
वो सड़क की तरफ़ मुड़ी। धूप ऊपर थी और कंपाउंड की दीवार कोई छाँव नहीं दे रही थी।
अहान मोदी। पानी की बोतल सलाखों के बीच से बढ़ाई हुई एक रोती हुई औरत के लिए। दूसरी गाड़ी, खिड़की में चेहरा, वो सिर हिलाना जो वो घर ले गई थी और जगह नहीं बिठा पाई थी।
वो दो इंच, पेज चार के लिए गई थी। एक भी फ़ोटो नहीं खींची। उसके पास अब एक नाम था, और अख़बार में उसे रखने की कोई जगह नहीं।
वो लंबे रास्ते से घर गई, सिविल लाइन्स रोड की उस मिठाई की दुकान के पास से जहाँ काफ़िला गुज़रा था। उस कोने के पास से जहाँ वो पंजों पर खड़ी हुई थी कैमरा लेकर। सड़क ख़ाली थी, सीधी-सादी, और उसमें वो कुछ नहीं बचा था जो उसने वहाँ से देखा था।
उसने कैमरा शेल्फ़ पर रख दिया।
रसोई से सुषमा की आवाज़: “इतनी जल्दी? वहाँ खाना खाया?”
“नहीं।”
“अच्छा किया। मामा जी ने तीन लोगों का खाना खाया है। कहते हैं अखाड़े से भूख लगती है। हर चीज़ से भूख लगती है उस आदमी को।” रुकी। “क्या था?”
“स्टाफ़ सर्टिफ़िकेट। लंबी सर्विस।”
“परिवार में से कोई था?”
“कोमिला मोदी ने बात की। बेटे ने सर्टिफ़िकेट बाँटे।”
सुषमा रसोई के दरवाज़े में आ गई, तौलिए से हाथ पोंछती हुई।
“बेटा। तूने देखा? क़रीब से?”
“मंच पर था।”
“कैसा था?”
“सर्टिफ़िकेट बाँट रहा था, मामी। सर्टिफ़िकेट बाँटने वाले आदमी जैसा था।”
“तू बेकार है। रशिका होती तो पूरी रिपोर्ट लेकर आती। क़द, कपड़े, कैसे बोला, घर का खाना खाने वाला लगता है या होटल का।” सुषमा ने तौलिया कंधे पर डाला। “शहर के सबसे बड़े घर भेजती हूँ और तू कुछ लेकर नहीं आती।”
“तूने नहीं भेजा। अख़बार ने भेजा।”
“नतीजा एक ही है। कोई दिलचस्प?”
गोपिना चारपाई के किनारे बैठ गई और दीवार देखने लगी।
“नहीं,” उसने कहा। “बस वही।”