Chapter 25

एपिसोड 25: DJ ट्रक

बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026

DJ ट्रक बीस मिनट से एक ही गाना बजा रहा था।

वो मंदिर की दीवार से नाक लगाकर खड़ा था, फ़्लैटबेड पर छह ऊँचे स्पीकर, बेस से वो गेंदे की मालाएँ हिल रही थीं जो किसी ने मंदिर के गेट से पहले गन्ने के जूस की दुकान तक बाँधी थीं। पीछे तीन और ट्रक, एक के पीछे एक, हर अगला पिछले से ज़्यादा तेज़। ड्राइवर अपने बोनट पर बैठे मूँगफली खा रहे थे, अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे।

मंदिर वाली सड़क बंद थी। दोनों तरफ़ Bolero लगी थीं, बम्पर से बम्पर, कुछ के दरवाज़ों पर सुनहरे अक्षरों में ख़ानदान के नाम। उनके बीच सब कुछ: गन्ने के जूस की दुकानें जिनके कोल्हू पिस रहे थे, एक आदमी साइकिल पर गुब्बारे बेचता हुआ, चमकीली साड़ियों में औरतें चार-पाँच के झुंड में चलती हुईं, बच्चे उन जगहों से भागते हुए जहाँ से बड़े नहीं गुज़र सकते। पानी की टंकी के पास बुड्ढी के बाल की मशीन से जली हुई चीनी का गुबार उठ रहा था जो धूल और डीज़ल और बसंत की आख़िरी गर्मी में घुल रहा था।

गोपिना जूस की दुकान के पास खड़ी थी, कॉपी खुली, पेन का ढक्कन दाँतों में।

मोहित ने भेजा था। तीन फ़ोटो, दो कोट, एक पैरा। रंगीन टुकड़ा। फ़ोटो हो गई थीं। कोट अभी नहीं मिले थे।

“गोपिना!”

मामा जी भीड़ में से ऐसे निकले जैसे कोई आदमी अपनी शादी में लेट हो। सफ़ेद बनियान, सफ़ेद शॉर्ट्स, गले में तौलिया, और कुश्ती के जूते जिन पर उन्होंने सुबह इतना तेल लगाया था कि पूरे घर में अखाड़े की महक आ रही थी।

“पिट देखा?” उन्होंने गोपिना की बाँह पकड़ ली। “इस बार ठीक से बनाया है। झज्जर से बालू मँगवाई है। बाबा रामजी ने ख़ुद इंतज़ाम किया।”

“मामा जी, मैं काम पर हूँ।”

“काम पर है, कह रही है। लिख ले ये। बाबा रामजी का अखाड़ा, सीनियर प्रदर्शनी बाउट, साढ़े चार बजे। लिख।”

“वो वाला आर्टिकल नहीं है ये।”

“मेले का आर्टिकल है ना? बाउट मेले में है। दो और दो।” उन्होंने तौलिया ठीक किया। “छह हफ़्ते से ट्रेनिंग कर रहा हूँ।”

“बताया तो था। रोज़ सुबह।”

“क्योंकि पहली बार कोई सुनता नहीं।” उन्होंने भीड़ पर ऐसे नज़र डाली जैसे कोई जनरल अपना मैदान देखता है। “छह हफ़्ते। मेरे घुटनों ने कभी इतना अच्छा काम नहीं किया।”

जवाब से पहले ही भाग गए। भीड़ उनके पीछे बंद हो गई।

· · ·

अखाड़ा मेले के मैदान के बीच में बनाया गया था, बालू का चौड़ा गोला, बाँस की बल्लियों और लाल कपड़े से घेरा। एक तरफ़ ऊँचे चबूतरे पर अनाउंसर बैठा था, उसका माइक, एक कॉपी, और कुर्सी के नीचे एक बोतल जिसे वो छिपाकर रखता था।

भीड़ रस्सियों के चारों तरफ़ तीन कतारें गहरी थी। गोपिना को दो आदमियों के बीच जगह मिली जो पकड़ की तकनीक पर बहस कर रहे थे, और वो बाँस से कॉपी सटाकर खड़ी हो गई।

अनाउंसर माइक में झुका। उसकी आवाज़ स्पीकरों से ऐसे आई जैसे कोई लोहे के ड्रम के अंदर चिल्ला रहा हो।

“देवियो और सज्जनो। सीनियर प्रदर्शनी बाउट। ताक़त, हिम्मत, और —” उसने कॉपी देखी। “— दंगल की प्राचीन परंपरा का शानदार प्रदर्शन।”

गोपिना के पीछे किसी ने कहा, “पीकर आया है।”

“हर बार पीकर आता है।”

“पिछले साल रमेश को उसकी बीवी के नाम से बुला दिया था।”

मामा जी बालू के किनारे खड़े कंधे घुमा रहे थे। सामने एक आदमी जो उनसे पंद्रह साल छोटा और तीस किलो भारी था, वही कर रहा था, लेकिन उस आसानी से जो उसको आती है जिसने ये पहले किया हो और दोबारा करने की उम्मीद रखता हो।

अनाउंसर ने कहा, “बाबा रामजी के अखाड़े की तरफ़ से — सुरेश वर्मा।”

छोटी सी तालियाँ। ज़्यादातर ख़ुद मामा जी की तरफ़ से।

घंटी बजी। असली घंटी, पीतल की, बाँस की बल्ली से तार से बँधी।

मामा जी आगे बढ़े। सामने वाला आगे बढ़ा। एक चक्कर लगाया। मामा जी ने हाथ बढ़ाया। दूसरे ने कुछ तेज़ और नीचे किया जो गोपिना को पूरा समझ नहीं आया, और फिर मामा जी बालू में पीठ के बल पड़े थे, टाँगें हवा में, आसमान देख रहे थे जैसे उन्हें पता ही नहीं कि यहाँ कैसे पहुँचे।

नौ सेकंड। उसने गिने थे।

भीड़ ने तालियाँ बजाईं। इसलिए नहीं कि जीत गए। इसलिए कि उतरे। अनाउंसर ने अखाड़े की भावना के बारे में कुछ चिल्लाया। मामा जी उठे, बनियान से बालू झाड़ी, और दोनों हाथ सिर के ऊपर ऐसे उठाए जैसे कोई आदमी हाथ उठाता है जब जंग जीत ली हो, नौ सेकंड में चित होने पर नहीं।

“देखा?” उन्होंने रस्सी के पास गोपिना को ढूँढ लिया। बालों में बालू, कानों में बालू, चौड़ी मुस्कान। “इंदर से ज़्यादा टिका मैं। इंदर छह में गिर गया।”

“बहुत तेज़ थे आप,” गोपिना ने कहा।

“लिख ले,” उन्होंने कहा। “लिख ले।” और पानी की टंकी की तरफ़ चल दिए, तौलिया सिर पर ओढ़े हुए जैसे किसी चैम्पियन का झंडा हो।

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