एपिसोड 30: प्लास्टिक की कुर्सी
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
हरा दरवाज़ा खुला था।
सोनू बाहर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा था, पीठ दीवार से लगी। जितना सोचा था उससे पतला। न जवान, न बूढ़ा। एक आदमी जो काफ़ी देर से ठीक से सोया नहीं लगता था और अब ख़्याल रखना बंद कर चुका था। हाथ घुटनों पर फैले हुए, उँगलियाँ खुली, जैसे कोई बैठता है जब उसने कुछ करने का फ़ैसला कर लिया हो और शुरू होने का इंतज़ार कर रहा हो।
गोपिना दरवाज़े पर पहुँची तो उसने ऊपर देखा। उसके पार, एक बार, गली में नल की तरफ़ देखा। डर नहीं। डर का बचा-खुचा, चेक करने की आदत।
“तू बिमला की लड़की है,” उसने कहा।
“मैं गोपिना हूँ। गली के उस सिरे से।”
“पता है कौन है तू।” उसने फिर गली की तरफ़ देखा। “बैठ। अंदर नहीं। यहीं ठीक है।”
वो सीढ़ी पर बैठ गई। वो कुर्सी पर रहा। दोनों के बीच एक दरवाज़े की चौड़ाई।
“बिमला ने कहा कि तैयार हो।”
“तैयार।” उसने शब्द ऐसे कहा जैसे चख रहा हो। “तैयार पता नहीं। बोला था बिमला से कि जो हुआ बता दूँगा तुझे। वो अलग बात है।”
उसने दोनों हाथों से चेहरा रगड़ा। जब नीचे लाए तो आँखें लाल थीं पर सूखी।
“उस हफ़्ते बड़ा ऑर्डर था। सरकारी। रोहतक में किसी बिल्डिंग के लिए टाइलें। फ़्लोर पर कमी थी, दो आदमी शादी के लिए घर गए थे। प्रकाश ने कहा कि शिफ़्ट बढ़ाकर निकाल लेंगे।”
“दस के बाद।”
“दस के बाद। ग्यारह, बारह। दो रातें हम एक बजे तक चले। कोई लॉग नहीं हुआ। प्रकाश लॉग कर नहीं सकता था क्योंकि ओवरटाइम अप्रूव नहीं था। अगर कंपनी को पता चलता कि वो बिना साइन-ऑफ़ के दस के बाद फ़्लोर चला रहा था, तो उसकी नौकरी जाती।”
“तो रिकॉर्ड में नहीं था।”
“दस के बाद कुछ भी रिकॉर्ड में नहीं था। काग़ज़ पर हम वहाँ थे ही नहीं। कोई भी नहीं।”
वो रुका। अंदर से बच्चे की आवाज़, कुछ माँग रहा था। उसने सिर घुमाया। “अभी नहीं,” कहा। आवाज़ बंद हो गई।
“पैलेट,” गोपिना ने कहा।
“पैलेट।” उसने गली के सामने की दीवार को देखा। “तीसरी रात। एक बजा होगा, शायद ज़्यादा। थके हुए थे। सब थके हुए थे। स्टैकिंग ग़लत थी। एक तरीक़ा होता है ना, भारी वाले नीचे, साइडें सहारा दो। पर जल्दी थी। दीपक बेल्ट से क्रेट उतार रहा था और मैं डॉली पर लोड कर रहा था और शुरू से ही सब ग़लत था। झुका हुआ दिख रहा था।”
“किसी ने कुछ कहा?”
“मैंने कहा। मैंने प्रकाश को बोला कि स्टैक टेढ़ा है। उसने देखा और बोला ऑर्डर पूरा करो, सुबह की शिफ़्ट में ठीक कर लेंगे।” सोनू के हाथ फिर घुटनों पर सपाट हो गए। “बीस मिनट बाद गिरा। तीन पैलेट। ऊपर वाला दीपक की पीठ पर आया। वो गिरा और दूसरा उसके ऊपर आ गया।”
उसने ऐसे कहा जैसे बस स्टैंड का रास्ता बताता है। सपाट। दोहराते-दोहराते रट गया।
“और प्रकाश।”
सोनू लगभग मुस्कुराया। किसी मज़ाक पर नहीं।
“प्रकाश हम सबसे ज़्यादा डरा हुआ था। उसे शिफ़्ट नहीं चलानी चाहिए थी। हमें वहाँ नहीं होना चाहिए था। अगर कंपनी जाँच करती तो पूरे हफ़्ते का बिना लॉग वाला ओवरटाइम निकलता, बिना साइन की शिफ़्टें, सब कुछ। हर रात पर उसका नाम।”
“तो उसने दीपक को रजिस्टर से हटा दिया।”
“हमारे सामने नहीं किया। ठीक से पता नहीं कब किया। पर दो दिन बाद बिमला ऑफ़िस गई और उन्होंने कहा कि दीपक ने कभी यहाँ काम ही नहीं किया। शिफ़्ट लॉग नहीं थी, तो दीपक उस पर नहीं था, तो दीपक कभी था ही नहीं।” उसने फिर चेहरा रगड़ा। “प्रकाश बुरा आदमी नहीं है। छोटा आदमी है बुरी जगह फँसा हुआ। घबरा गया। बस इतनी सी बात है।”
“बस इतनी सी बात है।”
“किसी ने नहीं कहा उसे। ऊपर से कोई नहीं आया और बोला कि लड़के को मिटा दो। ख़ुद किया, क्योंकि लगा कि सब कुछ चला जाएगा।”
गली के सिरे से एक मोटरसाइकिल गुज़री। सोनू ने उसे जाने तक देखा।
“वो अभी भी वहाँ काम करता है?” गोपिना ने पूछा।
“वही फ़्लोर। वही शिफ़्ट।” उसने अपने हाथ देखे। “वो मेरी तरफ़ नहीं देखता। मैं उसकी तरफ़ नहीं देखता। बेल्ट पर लोड करते हैं और घर चले आते हैं।”
गोपिना ने मुँह खोला कुछ और पूछने के लिए। रुक गई। कुछ और पूछने को बचा नहीं था। तस्वीर पूरी हो गई थी। एक हादसा, एक डरा हुआ आदमी, एक नाम रजिस्टर से मिटाया गया उस इंसान ने जो ख़ुद को डाँट से बचा रहा था। ऊपर से कोई हुक्म नहीं। कोई साज़िश नहीं। कोई बोर्डरूम नहीं। एक लड़का जो मर गया क्योंकि रात के एक बजे एक स्टैक ग़लत था और सब इतने थके हुए थे कि किसी ने ठीक नहीं किया।
“शुक्रिया,” उसने कहा।
सोनू खड़ा हुआ। प्लास्टिक की कुर्सी कंक्रीट पर घिसटी।
“बिमला का लड़का मेरा दोस्त था,” उसने कहा। “पूरी गली के लिए आइसक्रीम लाता था, बताया उसने?”
“बताया।”
“लकड़ी की चम्मच वाली। छोटे कप।” उसने कुर्सी उठाई और दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा। “बोलना उससे कि मैंने ये बताया।”
वो अंदर गया। हरा दरवाज़ा बंद हो गया।