एपिसोड 4 — पहला झूठ
जंग ने पहले चीनी ली, और फिर घी।
ये दुनिया के दूसरे छोर की जंग थी, पर इसका हाथ दून तक पहुँचा और अलमारियाँ ख़ाली कर गया। चीनी कार्ड पर मिलती थी, छोटी, सलेटी मात्रा में। घी फ़ौज के पास गया, लोग कहते थे, छावनियों में, मोर्चे पर, और जो बचता था वो पहले से चार गुना दाम का था, अगर मिलता भी।
सतनाम तिरसठ का था और ज़्यादातर घर पर रहता था, उसकी आँखें दूधिया हो चुकी थीं। वो पीछे पुराने कुएँ के पास एक चारपाई पर बैठा रहता और आवाज़ों से दुकान को सुनता। मोहन तैंतीस का था, उसकी एक बीवी थी, शीला, और पूरी दुकान अकेले उसके कंधों पर।
और दुकान मर रही थी।
“बेचने को कुछ नहीं है,” एक रात शीला ने कहा, दिन भर के सिक्के दो बार गिनते हुए, क्योंकि पहली बार में उसे यक़ीन नहीं हुआ था। “राशन कार्ड से बतीसा नहीं बनता।”
“जानता हूँ।”
“दूधवाले को पैसे चाहिए। मकान-मालिक को पैसे चाहिए। तुम्हारे बाबूजी को दवा चाहिए।” उसने छोटी-सी ढेरी उसकी तरफ़ सरकाई। “बस इतना है। पूरा दिन इतना। ये अकेले दूधवाले तक नहीं पहुँचता, बाक़ी की तो बात छोड़ो।”
मोहन कुछ नहीं बोला।
“वो टिन है,” शीला ने धीरे से कहा। उसे अलमारी के बारे में सालों से पता था। बीवी को हर अलमारी पता होती है। “छह साल से तुम रोज़ उसके पास से गुज़रते हो, ख़ुद से कहते हुए कि तुम अच्छे आदमी हो क्योंकि उसे छूते नहीं। अच्छे आदमी।” वो बेरहम नहीं थी, बस थकी हुई थी। “और इस बीच तुम्हारे बाबूजी बिना दवा के हैं ताकि एक बंद टिन अँधेरे में बैठकर तुम्हारे ज़मीर का साथ दे सके। अच्छा बेटा कौन है, जो बाप को खिलाए या जो साफ़ अलमारी रखे?”
वो देर तक टिका रहा। जितना बाद में वो मानता, उससे ज़्यादा देर।
फिर एक सलेटी सुबह, जब चीनी का कार्ड ख़त्म हो चुका था और घी का मर्तबान पीतल तक खुरच लिया गया था, वो ऊँची अलमारी तक चढ़ा और टिन उतारा। ढक्कन अकड़ा हुआ था। एक छोटी-सी आवाज़ के साथ खुला। अंदर की चर्बी अब भी सफ़ेद थी, अब भी चिकनी, अब भी किसी चीज़ की महक के बिना।
सेल्समैन सही था। इसने इंतज़ार किया था।
उसने उससे बतीसा बनाया। उसके हाथ बाक़ी हर क़दम जानते थे, तो बाक़ी हर क़दम सच्चा था, बेसन पुराने सिक्के के रंग तक भूना, इलायची, सब्र, कोई जल्दी नहीं। बस चर्बी झूठ थी, और वो ऐसा झूठ था जिसे कोई ज़बान नहीं पकड़ सकती थी। मिठाई फीकी और चलने लायक़ निकली। उसने पुराने दाम पर बेची। उस शाम, साल भर में पहली बार, दूधवाले और मकान-मालिक दोनों को देने लायक़ पैसे थे।
वो एक टुकड़ा घर बाप के लिए ले गया, जैसे हमेशा ले जाता था।
सतनाम ने उसे अपनी अंधी उँगलियों में लिया, पलटा, परतें टटोलीं। मुँह में रखा और धीरे-धीरे चबाया, जैसे बहुत बूढ़े लोग चबाते हैं।
“ये वैसा नहीं है,” उसने कहा।
मोहन के पास वाक्य तैयार था। उसने उसे पहले से बना रखा था, जैसे बाढ़ से पहले दीवार बनाते हैं।
“जंग की वजह से है, बाबूजी। अब हर चीज़ थोड़ी कम है। चीनी सलेटी है, दूध में पानी है, आटे में किरकिरी है। हर कोई जितना सोचता है उससे कम खा रहा है। जंग ख़त्म होगी तो सब ठीक हो जाएगा।”
कितना अच्छा वाक्य था। उसका हर शब्द सच था।
सतनाम एक पल चुप रहा। फिर: “जब मैं लड़का था, मेरे बाबूजी कहते थे कि झूठ आँखें बंद करके ज़्यादा अच्छे से सुनाई देता है। मैं समझा नहीं था।” उसने आधा खाया टुकड़ा चारपाई पर अपने पास रख दिया। “अब मेरी आँखें बंद हैं, और मुझे सुनाई दे रहा है। चर्बी नहीं, बेटा। चर्बी को मैं माफ़ कर देता, जंग सच है, आदमी को अपना घर पालना पड़ता है। वाक्य। वो बहुत चिकना है। ईमानदार आदमी को ये समझाने के लिए इतने सारे सच्चे शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती कि कोई चीज़ ठीक क्यों है।”
मोहन बिलकुल स्थिर खड़ा रहा।
“बैठ,” बाप ने कहा, और चारपाई थपथपाई। “बाक़ी मेरे साथ खा। हम इस बारे में फिर कभी बात नहीं करेंगे, तू और मैं। पर बैठ।”
मोहन बैठ गया। उसने खाया नहीं। दोनों ने फिर कभी इस बारे में बात नहीं की, और वो चुप्पी, चर्बी नहीं, पहला झूठ थी। चर्बी सस्ती थी। चुप्पी परिवार की ख़रीदी अब तक की सबसे महँगी चीज़ निकलने वाली थी।
उसी साल अजनबी भी आए।
दूर खींची गई लकीर अब हिंदुस्तान के बीच से भी खिंच चुकी थी, और उत्तर में पूरे-पूरे शहर ख़ाली होकर पूरब की तरफ़ उमड़ पड़े। उस बाढ़ का कुछ हिस्सा देहरा तक पहुँचा, गठरियाँ और बच्चे लिए लोग, और वो ख़ास चुप्पी लिए जो क़ब्रें पीछे छोड़ आने वालों में होती है। उनमें से एक ने सड़क पार, कोहिनूर की दीवार से सटकर ठिया जमाया, पेशावर का एक लंबा-चौड़ा सिख, प्रीतम सिंह, जो एक ऐसी रोटी तलता था जो देहरा ने कभी नहीं देखी थी। मैदे की चपटी गोल रोटियाँ, परतों में चर्बी, गरम तेल में तब तक डाली जातीं जब तक करारी और परतदार होकर ऊपर न आ जाएँ, मसालेदार छोले और एक चम्मच हलवे के साथ।
“कतलम्मा,” उसने पहली शाम सड़क के उस पार से मोहन की तरफ़ एक बढ़ाते हुए कहा। “पेशावर का। तुमने नहीं खाया होगा।”
मोहन ने खाया। वो परतदार था, और वो परतों के बीच की चर्बी पर ही जीता या मरता था, बिलकुल बतीसा की तरह। “अच्छा है,” उसने कहा। “चर्बी कौन-सी है?”
प्रीतम सिंह छोटी-सी हँसी हँसा, उस आदमी की हँसी जिसने ये उम्मीद छोड़ दी हो कि सच उसकी मदद करेगा। “जो वक़्त छोड़ दे,” उसने कहा। “आज ये सफ़ेद टिन वाली चर्बी। पेशावर में शुद्ध घी था, और मेरे बाप के बाप बनाते थे, और पूरी गली हमारा नाम जानती थी।” उसने सड़क पार मोहन की दुकान को देखा, दरवाज़े के ऊपर धुँधलाते बोर्ड को। “शुद्ध घी ही,” उसने धीरे-धीरे ज़ोर से पढ़ा। “अब भी वादा निभाते हो?”
मोहन ने बोर्ड को देखा, फिर उस आदमी को जिसने एक मुल्क खो दिया था।
“बोर्ड निभाता हूँ,” उसने कहा।
प्रीतम सिंह ने सिर हिलाया, जैसे ये ऐसा जवाब हो जिसे वो पूरी तरह समझता हो, और आगे कुछ नहीं पूछा। उसके बाद वो दोनों शाम की चाय सीढ़ी पर साथ पीते, हलवाई और शरणार्थी, और ज़्यादा बात नहीं करते, और ज़रूरत भी नहीं थी। एक ने मुल्क खोया था। एक ने अपने बाप की ईमानदारी खोई थी। दोनों हर सुबह, वक़्त जो भी चर्बी छोड़ दे, उसमें जितना अच्छा तल सकते थे, तल रहे थे।
सतनाम दो जाड़े बाद मरा, कुएँ के पास वाली चारपाई पर, भोर से पहले वाले घंटे में। जब ये हुआ, मोहन पानी लेने गया था। उसने ख़ुद जाना शुरू कर दिया था, अँधेरे में, दो पीतल के घड़े लेकर, इसलिए नहीं कि वो अब पुराने तरीक़े से मिठाई बनाता था, बल्कि इसलिए कि ये उसके बाप का इकलौता हिस्सा था जिसे वो अब भी निभा सकता था।
वो भरे घड़े लेकर घर आया और चारपाई को स्थिर और घर को जागा हुआ पाया। और उसे समझ आया कि सैंतीस सालों में पहली बार, उस सुबह देहरा में कोई सबसे पहले नहीं आया था।
उसका बाप उससे पहले चला गया था।
बारह दशक। एक मिठाई की दुकान। पानी इतनी धीरे-धीरे बिगड़ता है कि कोई नहीं बता सकता कि किस साल बिगड़ा।
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