Chapter 3

एपिसोड 3 — सेल्समैन

सेल्समैन जाड़ों में पलटन बाज़ार आया, दो टिन और एक मुस्कान लेकर।

वो शहर का आदमी था, बंबई से, दून की ठंड के लिए बहुत पतले कोट में, और एक लड़के के साथ दुकान-दुकान घूमता था जो उसका सैंपल वाला बक्सा उठाता था। तब तक सड़क पार वाले पिक्चर हॉल का नाम पड़ चुका था, कोहिनूर टॉकीज़, और उस पर एक हीरोइन वाला पेंट किया बोर्ड लगा था, और शनिवार की रातों को आख़िरी शो की भीड़ से पूरा बाज़ार भर जाता था, भूखी, कुछ मीठा ढूँढ़ती हुई।

सतनाम सत्तावन का था, ठंड ने उसकी कलाइयाँ बर्बाद कर दी थीं, और अब खाना मोहन बनाता था, तेईस का और तगड़ा, जबकि बूढ़ा चूल्हे के पास बैठकर टोकता था।

सेल्समैन ने घिसे हुए काउंटर पर एक टिन रखा और अँगूठे से ढक्कन उचकाया। अंदर चर्बी साबुन जैसी सफ़ेद और चिकनी थी।

“सूँघो,” उसने कहा।

मोहन ने झुककर सूँघा। “इसमें कोई महक नहीं।”

“बिलकुल! कुछ नहीं। तुम्हारी इलायची से लड़ने वाली कोई महक नहीं। गर्मी में तुम्हारे घी की तरह ख़राब नहीं होता। और,” वो आगे झुका, क्योंकि यही असली प्रवचन था, “क़ीमत एक-तिहाई। एक-तिहाई, सेठ जी। वही मिठाई बनाओ, वही दाम लो, और हर तीन आने में से दो आने तुम्हारे। अमृतसर से कलकत्ता तक हर दुकान बदल रही है। जल्द ही तुम हिंदुस्तान के आख़िरी आदमी होगे जो अपने दादा की तरह चूल्हे पर गाय का दूध जला रहा होगा।”

मोहन ने चलाना बंद कर दिया था। सतनाम ने देखा कि उसके बेटे ने चलाना बंद कर दिया था।

“फ़र्क़ कौन बता सकता है?” मोहन ने पूछा। वो सफ़ेद चर्बी को देख रहा था।

“कोई नहीं।” सेल्समैन ख़ुश हो गया, यही वो सवाल था जिसका मतलब होता था कि आधा सौदा हो गया। “यही तो ख़ूबी है। कोई ज़बान नहीं बता सकती। ये साइंस है, खाना पकाना नहीं।”

सतनाम चूल्हे के पास वाले अपने पीढ़े से बोला। “अपने हाथ दिखाओ।”

“सेठ जी?”

“तुम्हारे हाथ। आगे करो।”

हैरान होकर सेल्समैन ने हाथ आगे किए। वो नरम थे, साफ़, शहर के आदमी के हाथ।

“तुमने ज़िंदगी में कभी मिठाई नहीं बनाई,” सतनाम ने कहा। वो काउंटर पकड़कर धीरे से उठा, टिन पर एक उँगली रखी, और उसे घिसी लकड़ी पर सेल्समैन की तरफ़ वापस खिसकाया, एक इंच, फिर एक और। “मिठाई चीनी नहीं है। मिठाई भरोसा है। तुम मुझे पहली चीज़ रखने और दूसरी फेंकने का तरीक़ा बेच रहे हो, और कोई ज़बान फ़र्क़ नहीं बता सकती, कुछ वक़्त के लिए।” उसने आख़िरी इंच खिसकाकर टिन अपने काउंटर से उतार दिया, आदमी के हाथों में। “ले जाओ।”

सेल्समैन उस आदमी की आसान हँसी हँसा जिसने बहुत बार ना सुनी हो। उसने अपना बक्सा बाँधा। दरवाज़े पर वो रुका, और तमाशेवाले वाली मेहरबानी से काउंटर पर एक छोटा टिन रख दिया।

“तोहफ़ा,” उसने कहा। “उस दिन के लिए जब तुम व्यावहारिक बनोगे। ये सालों चलता है, ये इसकी दूसरी ख़ूबी है। ये इंतज़ार करता है।” और वो सड़क पार कोहिनूर के पास वाले हलवाई के पास गया, जिसने वहीं खड़े-खड़े चार टिन ख़रीद लिए।

“इसे नाली में फेंक दे,” सतनाम ने मोहन से कहा।

मोहन टिन लेकर पीछे गया, पुराने कुएँ के पास से, जो अब भी मीठा पानी देता था। वो ठंड में उसे हाथ में लिए खड़ा रहा। वो अपने बाप से हिसाब में तेज़ था, आदमी के बोलते-बोलते ही उसने गिनती कर ली थी।

उसने पीछे से बाप के आने की आवाज़ सुनी, पत्थर पर धीमे क़दम।

“अब भी हाथ में लिए है,” सतनाम ने कहा।

“इस टिन के पैसे लगे हैं। बंद अलमारी पर रखा रहे तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ता। जो पैसा किसी का कुछ नहीं बिगाड़ता उसे फेंकना, ये भी तो एक तरह की बर्बादी है, है ना?” मोहन मुड़ा। “आपने ही सिखाया था, बर्बाद मत करो।”

सतनाम ने सलेटी रोशनी में कुएँ के पास अपने बेटे को देर तक देखा।

“मैंने घी बर्बाद न करना सिखाया था,” उसने कहा। “झूठ जमा करना नहीं। दोनों में फ़र्क़ है, और जिस दिन तुम्हें अपने हाथ में वो फ़र्क़ महसूस न हो, उस दिन दुकान ख़त्म हो चुकी होगी, बस शहर को पता चलने में कुछ साल लगेंगे।” वो चूल्हे की तरफ़ मुड़ा। “जो करना है कर। तू बड़ा आदमी है। पर सुन ले, जो चीज़ इंतज़ार करती है वो इसलिए बेक़सूर नहीं होती कि इंतज़ार कर रही है। वो बस सब्र वाली होती है। और ये बदतर है।”

वो अंदर चला गया।

मोहन ने टिन नाली में नहीं फेंका। उसने उसे पीछे की एक ऊँची अलमारी पर ख़ाली मर्तबानों के पीछे रख दिया, जहाँ बाप की कमज़ोर होती आँखें उसे न ढूँढ़ पाएँ। इस्तेमाल के लिए नहीं, उसने ठंड में खड़े-खड़े ख़ुद से साफ़ कहा। बस रखने के लिए।

टिन अलमारी पर बैठा रहा। इंतज़ार करता रहा। कम से कम इस बारे में सेल्समैन ईमानदार था, सालों में दुकान में आई सबसे ईमानदार चीज़ वही थी, और दुकान में इकलौती चीज़ भी वही थी जो झूठ थी।

उस रात सतनाम पानी लेने रोज़ से देर में गया, कूल्हों में ठंड लिए। बाज़ार आख़िरी शो की भीड़ से गूँज रहा था। उसने कुंड पर अपने दोनों घड़े भरे और ख़ाली होती सड़क पर घर ले आया, और एक बूँद नहीं गिराई, और सबसे पहले आया, क्योंकि देहरा में अब कोई और नहीं सोचता था कि भोर से पहले वाला घंटा उठने लायक़ है।

वो हमेशा सबसे पहले आता था। उसे नहीं पता था कि ऐसी कितनी कम सुबहें बची थीं जिनमें ये बात सच रहेगी।

बारह दशक। एक मिठाई की दुकान। पानी इतनी धीरे-धीरे बिगड़ता है कि कोई नहीं बता सकता कि किस साल बिगड़ा।

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