एपिसोड 2 — बड़ा ऑर्डर
शहर के किनारे बड़ा लाल मकान बन रहा था, और उसे खिलाना था।
सब उसे जंगल वाला मकान कहते थे। वो किसी की देखी हुई सबसे बड़ी ईंटों की इमारत बनने वाली थी, एक ऐसी जगह जहाँ अंग्रेज़ पेड़ों के बारे में पढ़ाई करेंगे, और उसमें सैकड़ों मेहराबें थीं और सैकड़ों मज़दूर, और उनमें से हर मज़दूर को शाम चार बजे भूख लगती थी।
ठेकेदार अच्छे जूते पहनकर दुकान पर आया और जल्दी-जल्दी बोला।
“बतीसा,” उसने कहा। “और एक सख़्त लड्डू जो कई दिन चले। पूरी लेबर के लिए। रोज़। जब तक इमारत बने, और भगवान जाने, पाँच साल लग सकते हैं।” उसने हाथ ऐसे फैलाए जैसे काउंटर पर सोना उँडेल रहा हो। “समझे, तुम्हारी झोली में क्या डाल रहा हूँ? दूसरे हलवाई मेरे पैरों में गिर पड़ें।”
सतनाम अब तैंतालीस का था, दाढ़ी में सफ़ेदी। उसकी बेटी चंपा, तेरह की, काउंटर सँभालती थी और बिना तराज़ू के मिठाई को ठीक एक तोला तौल सकती थी। उसका बेटा मोहन, नौ का, सुनने के लिए झाड़ू लगाना छोड़ चुका था।
“रोज़ कितने?” सतनाम ने पूछा।
“एक हज़ार। शुरुआत में।”
“मैं दो सौ बना सकता हूँ। बढ़िया। जैसे एक बनाता हूँ, वैसे।”
ठेकेदार का फुर्तीला चेहरा ठहर गया। “मैंने एक हज़ार कहा।”
“और मैंने दो सौ कहा। तुम्हें या तो गिनती मिलेगी या क्वालिटी। एक चूल्हे और एक जोड़ी हाथों से दोनों नहीं मिल सकते।” सतनाम ने कंधे उचकाए। “एक हज़ार के लिए तुम्हें चार हलवाई चाहिए। या एक जो तुमसे झूठ बोलने को तैयार हो।”
“कोई झूठ बोलने को नहीं कह रहा।” ठेकेदार आगे झुका, अब सब्र से, जैसे चालाक आदमी धीमे आदमी से सब्र रखते हैं। “मैं समझदारी की बात कर रहा हूँ। घी थोड़ा कम। आटा थोड़ा सख़्त, सस्ता, अच्छे से जुड़ा रहता है। ये मज़दूर हैं, सेठ जी। इन्हें चार बजे कुछ मीठा और भारी चाहिए। ये नवाब नहीं हैं। इन्हें पता नहीं चलेगा।”
“इन्हें पता नहीं चलेगा,” सतनाम ने दोहराया, जैसे सिक्का पलटकर दूसरी तरफ़ देख रहा हो।
“मेरी पूरी बात यही है।”
“मेरी पूरी दिक़्क़त यही है।” सतनाम ने काउंटर पोंछा। “वो आदमी धूप में ईंटें ढो रहे हैं। दिन भर उनका शरीर उस लाल मकान को सब कुछ दे देता है। चार बजे जब वो मेरी मिठाई खाएँगे, तो वो पूरे दिन में उनके साथ होने वाली इकलौती सच्ची चीज़ होगी। तुम चाहते हो मैं उसे भी झूठ बना दूँ? फिर सुबह से रात तक उनके पास कुछ भी सच नहीं बचेगा।” उसने सिर हिलाया। “नहीं। ऐसे आदमी को दो जिसे उसके बाद नींद आ जाए।”
ठेकेदार अपने अच्छे जूते लेकर दो गली आगे रत्तन नाम के एक नौजवान हलवाई के पास गया, जो हर चीज़ के लिए हाँ कहता था।
ऑर्डर रत्तन को मिला। रत्तन ने घी खींचा, आटा सख़्त किया और पाँच साल तक रोज़ एक हज़ार आदमियों को खिलाया, और जब तक बड़ा लाल मकान अपनी सारी मेहराबों के साथ खुला, रत्तन ने अपनी दुकान के बग़ल वाली इमारत ख़रीद ली थी, और एक घोड़ा।
मोहन, तब तक चौदह का, एक शाम घोड़ा गुज़रते देखकर चुप नहीं रह सका।
“वो अब हमसे ज़्यादा अमीर है। रत्तन।”
“हाँ,” सतनाम ने कहा।
“मज़दूरों ने पाँच साल उसकी मिठाई खाई। कोई नहीं मरा। किसी ने शिकायत तक नहीं की।”
“किसी ने शिकायत नहीं की।”
“तो फिर ग़लत कैसे हुआ?” लड़का बदतमीज़ी नहीं कर रहा था। उसे सच में जवाब चाहिए था, जैसे कोई लड़का जानना चाहता है कि दरवाज़ा बंद क्यों है। “आप बार-बार ग़लत कहते हैं। पर किसी को चोट नहीं लगी। और हम ग़रीब हैं, और उसके पास घोड़ा है।”
सतनाम ने कपड़ा रख दिया और कुछ देर सोचा।
“ये वैसा ग़लत नहीं था जैसा चाकू ग़लत होता है,” उसने कहा। “किसी का ख़ून नहीं बहा। ये वैसा ग़लत था जैसे दीवार में एक छोटी दरार। दीवार खड़ी रहती है। सालों खड़ी रहती है। फिर एक दिन नहीं रहती, और सब कहते हैं, पर कल तो खड़ी थी। और दरार किसी को याद नहीं रहती।”
मोहन ने बात को उलट-पलटकर देखा। “तो हमें ग़रीब रहना चाहिए। एक ऐसी दरार की वजह से जो किसी को दिखती नहीं, एक ऐसी दीवार में जो गिरी नहीं।”
“हमें ग़रीब रहना चाहिए,” सतनाम ने कहा, “क्योंकि मैं अपनी मिठाई ख़ुद खाना चाहता हूँ। आदमी को वो खा सकना चाहिए जो वो बेचता है। बस इतनी-सी बात है।”
उसने लड़के के सिर पर हाथ रखा, और रखे रहा, और कुछ नहीं बोला, जो उसके लिए अनोखी बात थी, और लड़के को वो चुप्पी किसी भी शब्द से ज़्यादा देर याद रही।
पर सतनाम ने देखा कि मोहन ने दूसरा हिस्सा रख लिया था, कोई नहीं मरा, किसी ने शिकायत नहीं की, उसे छोटा मोड़कर किसी सुरक्षित जगह रख दिया था, जैसे कोई सिक्का जिसकी कभी ज़रूरत पड़ सकती हो।
सड़क के उस पार, सपाट प्लॉट पर जहाँ तंबू लगा था, आदमी अब पक्की नींव डाल रहे थे।
“वो क्या बना रहे हैं?” चंपा ने काउंटर से आवाज़ दी।
“पिक्चर हॉल,” ठेकेदार ने जाते हुए बताया था। “एक असली, छत वाला, नाम वाला। ताकि चलती तस्वीरें तंबू समेटकर चली न जाएँ, देहरा में ही रहें।”
“अच्छा है,” सतनाम ने कहा। “कुछ तो रुके।”
वो भोर में पानी लेने गया, दो पीतल के घड़े, सड़क पर पहले से धीमा। पर अब भी सबसे पहले पहुँचा।
वो हमेशा सबसे पहले आता था।
बारह दशक। एक मिठाई की दुकान। पानी इतनी धीरे-धीरे बिगड़ता है कि कोई नहीं बता सकता कि किस साल बिगड़ा।