Chapter 1

एपिसोड 1 — भोर से पहले का पानी

शहर जागने से पहले सतनाम दास पानी लेने निकल पड़ा।

वो अँधेरे में गया, दो पीतल के घड़े और कंधे पर बहँगी लिए। गली सूनी थी। कुत्ते उसे पहचानते थे और भौंके नहीं।

मंदिर के पास वाले पत्थर के कुंड पर रात का चौकीदार कंबल लपेटे बैठा था, और सतनाम को सड़क से आते देखकर उसने ठोड़ी उठाई।

“फिर तू,” चौकीदार बोला। “रोज़ सुबह। पंडित जी भी तुझसे ज़्यादा देर सोते हैं, हलवाई।”

“पंडित जी भगवान के ज़्यादा पास हैं,” सतनाम ने पहला घड़ा भरने को झुकते हुए कहा। “मुझे थोड़ा लेने आना पड़ता है।”

“पानी तो दोपहर को भी है। वही पाइप। वही राजपुर। दिन भर बहता है।”

“दोपहर तक पूरा शहर इसमें हाथ डाल चुका होता है।” सतनाम ने घड़ा उठाया और एक बूँद नहीं गिराई। “दोपहर तक पानी बहुत कुछ सुन चुका होता है। मुझे वो तब चाहिए जब उसने कुछ न सुना हो।”

चौकीदार हँसा और कंबल ऊपर खींच लिया। “पागल,” उसने कहा, पर प्यार से, जैसे किसी आदमी को पागल तब कहते हैं जब आधा मन चाहता हो कि हम भी उसके जैसे होते।

दुकान उसी बसंत में खुली थी। एक कमरा, एक मिट्टी का चूल्हा, एक काउंटर जो अभी से घिसकर चिकना हो चला था। दरवाज़े के ऊपर सतनाम ने ख़ुद, धीरे-धीरे, तीन शब्द लिखे थे, क्योंकि वो पेंटर नहीं था: शुद्ध घी ही। आख़िरी अक्षर तिरछा था। सबसे पहले उसकी घरवाली ने देखा था।

“ये टेढ़ा है,” जानकी ने गोद में बच्ची लिए सड़क पर खड़े होकर कहा था। “लोग हँसेंगे।”

“तो सच्चे शब्द पर हँसें,” उसने कहा था। “सीधे झूठे शब्द से अच्छा है।”

“सच्चा शब्द खाया नहीं जाता।”

“नहीं,” उसने माना था। “पर उसके बाद नींद आ जाती है।”

उसने अभी, जब आसमान सलेटी ही था, चूल्हा जलाया। घी पिघलाया, सुनहरा, उन दो गायों के दूध का जिनके मालिक को वो नाम से जानता था, और उसमें बेसन डालकर चलाने लगा, और रुका नहीं, क्योंकि बतीसा जल्दी में नहीं बनता।

बूढ़ा सफ़ाई वाला अपना ख़राब घुटना घसीटता हुआ दरवाज़े के पास से गुज़रा और रुक गया, जैसे रोज़ सुबह रुकता था, बिना पूछे, क्योंकि उसे पता था।

सतनाम ने पहला टुकड़ा काटा और आगे बढ़ा दिया।

सफ़ाई वाले ने खड़े-खड़े खाया, और आँखें बंद कर लीं। “पिछले हफ़्ते जैसा है,” उसने कहा।

“होना चाहिए,” सतनाम बोला। “बनता भी वैसे ही है।”

“हर हलवाई यही कहता है।”

“हर हलवाई कहता है। मैं करता हूँ।” वो अपनी कड़ाही की तरफ़ लौटा। “कल आना। कल भी ऐसा ही होगा। बस यही तरकीब है। और कोई तरकीब नहीं।”

दोपहर को जानकी बच्ची को दुकान पर लाई। बच्ची दो महीने की थी। उसका नाम चंपा रखा था, क्योंकि वो उसी हफ़्ते पैदा हुई थी जब चंपा के फूल खिले थे और पूरी गली एक साथ महक उठी थी।

“इसे पकड़ो,” जानकी बोली। “मेरी बाँहें जवाब दे गईं।”

“मेरे हाथों में बेसन है।”

“इस पर बेसन से बुरी चीज़ें लग चुकी हैं।” उसने बच्ची को उसके सीने से लगाया और अपनी कमर सीधी की। “रत्तन की घरवाली आज कुंड पर आई थी। कहती है उसके घरवाले काँच की अलमारी लगवाएँगे। सहारनपुर से। मिठाई उसके पीछे रखी रहेगी।”

“मिठाई के लिए अच्छा है।”

“कहती है लोग ख़रीदने से पहले मिठाई देखना पसंद करते हैं। काँच के पीछे। चमकती हुई।”

“मिठाई खाने के लिए होती है, देखने के लिए नहीं।” उसने एक साफ़ उँगली की पोर से बच्ची का गाल छुआ। “चीज़ काँच के पीछे तब रखते हैं जब नहीं चाहते कि हाथ उस तक पहुँचे। जब हाथ से डर लगता हो।” वो चंपा को देखकर मुस्कुराया। “मुझे हाथ से डर नहीं लगता। लोग हाथ डालें। पहले सूँघ लें। छुपाना क्या है?”

उस पतझड़ में एक तमाशेवाला एक मशीन लेकर सड़क पर आया और दुकान के सामने वाले ख़ाली प्लॉट पर तंबू तान दिया। उसने शहर से वादा किया कि तस्वीरें चलेंगी। किसी ने यक़ीन नहीं किया, और पूरा बाज़ार फिर भी गया।

सतनाम सड़क पार एक थाल ले गया और दीये बुझने से पहले हर टुकड़ा बेच दिया। फिर वो पीछे खड़ा होकर सफ़ेद पर्दे को ज़िंदा होते देखता रहा, एक रेलगाड़ी, एक समंदर, ऐसे लोग जो वहाँ थे ही नहीं। भीड़ ने एक साथ साँस खींची।

बाद में अँधेरे में एक व्यापारी उसे ढूँढ़ता हुआ आया और कुछ देर साथ चला।

“आज तो अच्छा कमाया, हलवाई। भूखी भीड़ अच्छी भीड़ होती है।” आदमी ने आवाज़ धीमी की, दोस्ताना। “मैं भी घी बेचता हूँ। तू जो इस्तेमाल करता है उससे सस्ता। थोड़ा कुछ मिला हुआ, छोड़ क्या। तू दुगना बचा सकता है, और इस शहर में किसी आदमी को फ़र्क़ पता नहीं चलेगा।”

सतनाम कुछ क़दम चला, फिर बोला। “किसी आदमी को पता नहीं चलेगा,” उसने माना।

“यही तो ख़ूबी है।”

“यही तो दिक़्क़त है।” उसने कंधे पर बहँगी ठीक की और चलता रहा। “राम-राम।”

व्यापारी बाक़ी का इंतज़ार करता रहा, वजहें, छोटा-सा प्रवचन। हर ईमानदार आदमी जिसे उसने आज़माया था, उसके पास वजहें होती थीं, और वजहों से बहस हो सकती है, उन्हें घिसा जा सकता है, सुबह तक पलटा जा सकता है। कोई वजह नहीं आई। सतनाम अपनी गली में मुड़ चुका था, और जाते हुए आदमी को कुछ बेचना बहुत मुश्किल होता है।

सतनाम घर चला गया। तंबू पीछे चमक रहा था। शहर उसके चारों तरफ़ सो रहा था, छोटा और अँधेरा और लीची की ख़ुशबू वाला, और उसकी बेटी दो महीने की थी, और उसका पानी साफ़ था, और जिस भी आदमी ने उस दिन उसकी मिठाई खाई थी, उसने ठीक वही खाया था जो उसने सोचा था कि खा रहा है।

उसे नहीं पता था कि वो इससे ज़्यादा अमीर कभी नहीं होगा।

उसे बस इतना पता था कि कल वो फिर अँधेरे में उठेगा और पानी लेने जाएगा, शहर के छूने से पहले। उसके कुछ सुनने से पहले।

वो हमेशा सबसे पहले आता था।

बारह दशक। एक मिठाई की दुकान। पानी इतनी धीरे-धीरे बिगड़ता है कि कोई नहीं बता सकता कि किस साल बिगड़ा।

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