चाहना मुफ़्त है
सुमन ख़रीदारी वैसे ही करती थी जैसे सबके सामने हर काम करती थी, यानी सँभलकर, ठोड़ी उठाकर, और ऐसे जैसे पैसा उसके पास बहुत हो और वो बस उसे बर्बाद न करना चुनती हो।
उसके पास एक लिस्ट थी। उसके पास फ़्लायर था, उस पन्ने पर मोड़ा हुआ जो काम का था। उसके पास तारा थी, कार्ट की सीट पर एक दस्ताना चबाती हुई, और कबीर था, कार्ट के बग़ल में पीठ पीछे हाथ बाँधे चलता हुआ जैसे कोई छोटा इंस्पेक्टर, और उसके दिमाग़ में एक अंक था, और वो अंक और कार्ट एक धीमी, चुप जंग में थे जिसे वो बिना किसी के देखे जीतने का इरादा रखती थी।
वो कोटों के पास से गुज़रे।
एक नीला कोट था। ऊन का, या उस तरह की नरमी का जो ऊन जैसी दिखती है, उस आसमान के रंग का जो स्ट्रीटलाइट जलने से ठीक पहले के दस मिनट में होता है। वो सेल पर था। सेल पर भी वो अंक के ग़लत तरफ़ था।
सुमन रुक गई। उसने उसे वैसे देखा जैसे किसी ऐसे घर की खिड़की को देखा जाता है जिसे तुम ख़रीदने वाले नहीं। उसने बिना देखते हुए दिखे देखा कि कोई पास तो नहीं। फिर उसने उसे रैक से उतारा और खंभे पर लगे शीशे के छोटे-से टुकड़े में अपने आगे लगाकर देखा, बस एक सेकंड के लिए, बस देखने के लिए, और कबीर ने, जो सब देखता था, ये भी देख लिया।
फिर उसने उसे वापस रख दिया, और रैक पर सीधा कर दिया ताकि ठीक से लटके, और कार्ट आगे बढ़ा दी, और उसका चेहरा ज़रा भी नहीं बदला, क्योंकि वो इसमें बहुत अच्छी थी। दुनिया में वो सबसे अच्छी इसी में थी।
“आपको वो चाहिए था,” कबीर बोला।
“मेरे पास कोट है।”
“पर आपको वो वाला चाहिए था।”
“चाहना मुफ़्त है,” सुमन बोली। “ब्रेड नहीं है। हम ब्रेड लेने आए हैं।” और वो उन्हें आगे ले गई, और बात वहीं ख़त्म हो जाती, अगर कबीर ऐसा लड़का होता जो ख़त्म होती बातों को ख़त्म होने देता।
वो गलियारों में मददगार था। अपनी समझ में वो बहुत मददगार था।
“हम वो नहीं ले सकते,” उसने उसी सीरियल की तरफ़ हाथ बढ़ाते एक आदमी से कहा। “इस हफ़्ते वो फ़्लायर में नहीं है। फ़्लायर वाला दो नीचे है। स्वाद वही है। मेरी मम्मी ने चेक किया है।”
“कबीर।”
“ये पैसे बर्बाद करने वाले थे,” कबीर ने समझाया। “मैंने रोक दिया। कोई बात नहीं,” उसने आदमी से जोड़ा, जो जल्दी से चला गया।
डेयरी पर उसने एक औरत को बताया कि बड़ा दूध प्रति लीटर सस्ता है पर तभी फ़ायदेमंद है जब चार लोग हों, और क्या उसके चार लोग हैं, क्योंकि उनके साढ़े तीन हैं, तारा को आधा गिनकर, और इसलिए वो मीडियम लेते हैं। औरत ने कहा ये बहुत अच्छा गणित है। कबीर ने माना कि है।
“प्लीज़,” सुमन ने धीमे से कहा। “बस चलो। पीठ पीछे हाथ और चलो।”
“मैं मदद कर रहा हूँ।”
“पता है,” उसने कहा, और उसे पता था, यही तो सबसे बुरा था, “पर मेरी मदद चलकर करो।”
वो काउंटर तक लगभग पहुँच गए थे। और फिर, सीज़नल वाले गलियारे के पास, उन्हें मिसेज़ भाटिया मिल गईं।
मिसेज़ भाटिया आरव की माँ थीं, और भाटिया परिवार प्रेयरी तंदूर चलाता था, और कौन कितना अच्छा कर रहा है इसके छोटे-से हिसाब में वो गिल परिवार से एक-दो पायदान ऊपर थे और इस बारे में ऐसे भले थे जो बुरे होने से भी बुरा था। उनकी कार्ट भरी हुई थी। उनके पास एक नया कोट था, असली वाला, नीला नहीं बल्कि वो ऊँटिया रंग जिसकी क़ीमत उतनी होती है जितनी होती है।
“सुमन! मुझे नहीं पता था तुम यहाँ ख़रीदारी करती हो।”
“अरे, कभी-कभी,” सुमन बोली, और उसकी आवाज़ अच्छे वाले सुर में निकली, वो जो वो तैयार रखती थी, गर्म और सहज, एक ऐसी आवाज़ जिसके पास बहुत पैसा है और जो बस उसे बर्बाद न करना चुनती है। “इक्का-दुक्का चीज़ के लिए। आप कैसी हैं। रेस्टोरेंट कैसा चल रहा है।”
“भीड़, भीड़, तुम्हें तो पता है। लंबे वीकेंड के लिए हम गाड़ी से कैलगरी जा रहे हैं, आरव ने पहाड़ कभी नहीं देखे, सोचो।” मिसेज़ भाटिया मुस्कुराईं। “और तुम? कोई बड़ा प्लान?”
“हम बहुत अच्छे हैं,” सुमन बोली। “बहुत अच्छे, शुक्रिया।”
“मेरे पापा को यहाँ गैरी कहते हैं,” कबीर ने बताया।
मिसेज़ भाटिया ने नीचे उसकी तरफ़ देखा।
“स्टोर पर,” कबीर बोला। “उनका नाम गुरमेल है पर यहाँ सब गैरी कहते हैं। वो अभी काम कर रहे हैं, उधर दूर वाले काउंटर पर। हम उनके दिनों पर आते हैं क्योंकि उन्हें डिस्काउंट मिलता है। दस परसेंट। मेरी मम्मी कहती हैं इसी वजह से हम आ पाते हैं।” उसने ये चहककर कहा, वैसे जैसे अच्छी ख़बर सुनाई जाती है। “वो रहे। वो हाथ नहीं हिला सकते। जब वो गैरी होते हैं तो उन्हें हमें हाथ हिलाने की इजाज़त नहीं।”
स्टोर के उस पार, दूर वाले काउंटर पर, नॉर्डमार्ट की जैकेट पहने पापा ने ऊपर देखा, और अपने परिवार को सीज़नल गलियारे के पास देखा, और देखा कि वो किसके साथ खड़े हैं, और आधे सेकंड में पूरी तस्वीर समझ गए कि क्या हो रहा है, और अपना काउंटर नहीं छोड़ सकते थे, और उन्होंने अपना हाथ बेल्ट से कुछ इंच उठाया, और फिर नीचे रख दिया।
“कितना अच्छा है,” मिसेज़ भाटिया बोलीं, “कि उन्हें डिस्काउंट मिलता है।”
सुमन की ठोड़ी अब भी ऊपर थी। अच्छा वाला सुर अब भी चल रहा था। पर उसके नीचे कुछ धँसने लगा था, वैसे जैसे बर्फ़ धँसती है, चुपचाप, नीचे से, जबकि ऊपर से वो अब भी सड़क जैसी दिखती है।
“कबीर,” उसने कहा। “जाकर देखो कि मीडियम दूध आख़िरी तो नहीं था।”
“मैं देख चुका हूँ। चार बचे थे।”
“जाकर फिर देखो।”
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कबीर के अंदर एक और सच्ची बात थी, और वो सबसे अच्छी वाली थी, वो जो वो बचाकर रख रहा था, और वो नीले कोट के बारे में थी।