दूसरा मोज़ा
चालीस क़दम दूर बस स्टॉप तक पहुँचने के लिए छह मिनट काफ़ी होते हैं। तब काफ़ी नहीं होते जब कोई एक क़दम रुककर आपत्ति दर्ज कराने लगे।
8:00। वो कबीर को दौड़ाते हुए दरवाज़े से बाहर ले गए, या दौड़ के सर्दियों वाले रूप में, जो तेज़ी से डगमगाना होता है, एक छोटा, अकड़ा हुआ अंतरिक्ष-यात्री जमे हुए ड्राइववे को पार करता हुआ, पापा का हाथ उसके हुड में। बस स्टॉप कोने पर था, चालीस क़दम, और चालीसों क़दम बर्फ़ थे।
कोने पर, पहले से इंतज़ार करता, दो घर छोड़कर रहने वाला पीटरसन परिवार का लड़का खड़ा था, ज़िप चढ़ाए, दस्ताने पहने, समय से पहले, अपनी माँ का हाथ पकड़े। मिसेज़ पीटरसन ने पापा और उनके आधे-अधूरे कपड़ों वाले बेटे की तरफ़ एक छोटा-सा चमकता हाथ हिलाया। पापा ने, कबीर को हुड से पकड़कर बर्फ़ पर घसीटते हुए, उस हाथ से जवाब में हाथ हिलाया जिसमें बच्चा नहीं था, और हाथ हिलाने से नफ़रत की, और फिर भी हिलाया। हाथ हिलाया जाता है।
“वो रही,” पापा बोले। सड़क पर, दो ब्लॉक दूर, लंबी पीली आकृति, उसकी बत्तियाँ अँधेरे में फैलती हुईं। “हम ठीक हैं। हाथ हिलाओ। हि-ला-ओ।”
कबीर ने हाथ नहीं हिलाया। कबीर ड्राइववे के बीच में, माइनस तीस के बीच में, उस ख़ास स्थिरता के साथ रुक गया था जिसे पापा अपनी पत्नी के बयानों से जानते थे और जिसे मैदान में कभी न देखने की उन्होंने दुआ की थी।
“लाइन खिसक गई,” कबीर बोला।
“कौन-सी लाइन। किसकी लाइन। कबीर। बस।”
“मोज़ा। जब मैं दौड़ा, तो वो वापस नीचे चली गई।” उसने अपने पापा की तरफ़ ऊपर देखा, जैसे पूरे ब्रह्मांड ने धोखा दिया हो। “वो फिर चल रही है।”
बस कोने पर पहुँची। बस ने दरवाज़े खोले। बस, बस होने के नाते, ठीक उतने सेकंड रुकी जितने एक बस रुकती है, जो एक मोज़े को लेकर दार्शनिक इमरजेंसी के लिए काफ़ी सेकंड नहीं होते, और फिर उसने दरवाज़े बंद किए और बाक़ी सब बच्चों के चेहरे खिड़कियों में लिए चल पड़ी, गर्म और चलते हुए और ओझल।
8:04।
पापा सड़क पर खड़े उसे जाते देखते रहे, वैसे जैसे उस चीज़ को देखा जाता है जो पकड़ी जा सकती थी अगर दुनिया एक मोज़े जितनी मेहरबान होती।
“ठीक है,” उन्होंने कहा। “ठीक है। फ़्रिज में बैठो।”
गाड़ी में, जो फ़्रिज से गर्म होकर ठंडा कमरा बन रही थी, पापा चलाते रहे, और कबीर पीछे अपने स्नोसूट में बैठा रहा, अब शांत, इमरजेंसी पीछे छूट चुकी, उस तबाही के बीच सुकून से बैठा लड़का जो उसने मचाई थी और जिसका बिल उसे नहीं भरना था।
“आप स्टोर के लिए लेट हो जाएँगे,” कबीर ने ग़ौर किया।
“हो जाऊँगा।”
“ठंडे लोग मैनेजर को बताएँगे?”
“बताएँगे।”
“मैनेजर गैरी को बताएगा?”
“वो गैरी को बताएगा,” पापा बोले, “हाँ।”
कबीर कुछ देर इस पर सोचता रहा, अँधेरे क़स्बे को फिसलते देखता हुआ, एक जलती खिड़की वाला बंद डोनट डेपो, लीजन के ऊपर जमा हुआ झंडा।
“मैं उन्हें एक चिट्ठी लिख सकता हूँ,” उसने पेशकश की। “मैनेजर को। टायलर ने मुझे सिखाया है। सच्ची बात लिखो और साइन करो। मैं लिख दूँगा कि मोज़े की वजह से हुआ। फिर ग़लती आपकी नहीं होगी। मोज़े की होगी। मुसीबत में मोज़ा होना चाहिए, गैरी नहीं।”
पापा ने शीशे में अपने बेटे को देखा, स्नोसूट में ये छोटा-सा गंभीर इंसान जो लिखकर नॉर्डमार्ट के मैनेजर के ख़िलाफ़ उनका बचाव करने की पेशकश कर रहा था, और उन्होंने उस आदमी का वो ख़ास बेबस प्यार महसूस किया जो लेट होने वाला है और जिस वजह से लेट हो रहा है उस पर ग़ुस्सा भी नहीं कर सकता।
“शुक्रिया,” पापा बोले। “शायद मत लिखना।”
“मैं मुसीबत में हूँ? बस के लिए।”
“नहीं।”
“मोज़े के लिए?”
“मोज़ा भी मुसीबत में नहीं है। कोई मुसीबत में नहीं है। गुरुवार है, बस चली गई, और हम गाड़ी में हैं। सुबह बस ऐसी निकली।” कहते हुए उन्हें लगा कि वो इस पर आधा यक़ीन करते हैं। “कुछ सुबहें ऐसी निकलती हैं। हर एक पर इस्त्री करके उसे सपाट नहीं किया जा सकता।”
कबीर ने इस पर सोचा। उस चीज़ के बारे में जो उसकी मम्मी सुबहों के साथ, और क़मीज़ों के साथ, और पूरे परिवार के साथ करने की कोशिश करती थीं, हर एक दिन। सपाट, सपाट, सपाट।
“वो कोशिश करना चाहेंगी,” उसने कहा।
“चाहेंगी,” पापा बोले। “वो तुम्हारी मम्मी हैं।”
“ठीक है।” कबीर फिर खिड़की की तरफ़ मुड़ गया। फिर, धीमे से, सीधे-सीधे, इसे अपने तक रखने की कोई वजह न देखते हुए:
“ये दूसरा मोज़ा भी ग़लत है।”
पापा गाड़ी चलाते रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। एक लंबी लाल बत्ती आई, और वो उस पर रुके रहे, गर्म होती गाड़ी में, अब भी अँधेरी सुबह में, और उनकी आँखों के पीछे कहीं एक छोटी-सी आवाज़ शुरू हुई, और उसे पहचानने में उन्हें एक सेकंड लगा, क्योंकि ये आवाज़ उन्होंने काफ़ी समय से नहीं निकाली थी, और फिर उन्होंने उसे पहचान लिया। वो हँस रहे थे।