मोज़ा ग़लत है
बस 8:04 पर आती थी, और 7:41 पर गिल परिवार का घर पहले से हार रहा था।
बाहर प्रेयरी की सर्दियों की सुबह का सपाट, सख़्त अँधेरा था, डेक पर ठुके थर्मामीटर पर माइनस तीस और हवा से पूछो तो माइनस चालीस, और उसमें बाहर पापा एक पुराने सीडी केस के आधे टुकड़े से गाड़ी की बर्फ़ खुरच रहे थे, क्योंकि अच्छा वाला खुरचना वहीं चला गया था जहाँ अच्छे खुरचने चले जाते हैं।
अंदर मम्मी स्नोसूट को जाल की तरह खोले खड़ी थीं।
“बाँहें,” उन्होंने कहा। “बीस मिनट हैं।”
“तेईस,” कबीर बोला।
“तेईस से कोई मदद नहीं होती। बाँहें।”
उसने बाँहें डालीं। फिर वो रुक गया, एक बाँह अंदर और एक बाहर, उस लड़के की स्थिरता के साथ जिसने कुछ ऐसा महसूस किया हो जिसे वो अनदेखा करके आगे नहीं बढ़ सकता।
“ये मोज़ा ग़लत है।”
“मोज़ा ठीक है।”
“नहीं है। लाइन ग़लत तरफ़ है।” वो उसे देखने के लिए बैठ गया, आधा स्नोसूट के अंदर। “लाइन उँगलियों के ऊपर होनी चाहिए। ये नीचे है। मुझे वहाँ नीचे महसूस हो रही है। ये घूम रही है।”
“ये मोज़ा है। ये घूमता नहीं।”
“जब मैं चलता हूँ तो ये चलता है। वो और बुरा है।”
“कबीर। अठारह मिनट में बस आएगी। अगर हम सड़क पर नहीं हुए, तो वो रुकती नहीं। उसके पास और बच्चे हैं। उसका टाइम-टेबल है।”
“टाइम-टेबल का इंचार्ज कौन है,” कबीर ने अपने मोज़े की तरफ़ हाथ बढ़ाते हुए कहा। “आप, या वो?”
“आज ये शुरू मत करना,” मम्मी बोलीं।
वो फ़र्श पर बैठ गईं, जहाँ 7:44 पर होने का उनका कोई प्लान नहीं था, और मोज़ा उतारा और घुमाया और वापस पहनाया, सिलाई उँगलियों के ऊपर, ठीक वहीं जहाँ दुनिया को उसकी ज़रूरत थी।
“लो,” उन्होंने कहा। “ठीक हो गया। बूट।”
कबीर ने उँगलियाँ हिलाईं। उसके चेहरे ने कुछ किया।
“अब ये ऊपर है पर बहुत ज़्यादा ऊपर है।”
रसोई में कहीं तारा ने, जो दो साल की थी और अफ़रा-तफ़री को वैसे समझती थी जैसे दूसरे लोग अपना नाम समझते हैं, अपने दोनों बूट उतारे और एक छिपा दिया।
“सुनिए!” मम्मी ने पुकारा। “गाड़ी का क्या हाल है?”
“गाड़ी फ़्रिज है,” पापा ने फ़्रिज के अंदर से जवाब दिया। “गाड़ी एक छोटा, और ठंडा घर है। दो मिनट।”
गुरुवार को स्टोर पापा खोलते थे। अगर नौ बजे तक नॉर्डमार्ट के दरवाज़े नहीं खुलते, तो फ़ुटपाथ पर ठिठुरते लोगों की एक छोटी लाइन लग जाती और वो अपनी घड़ियाँ देखते, और उनमें से कोई न कोई मैनेजर से ज़िक्र कर देता, और मैनेजर हमेशा गैरी से ज़िक्र कर देता। गैरी लेट नहीं हो सकता था। गुरमेल के पास दुनिया भर का वक़्त था; गैरी को 8:45 पर पहुँचना था।
“बूट,” मम्मी ने फिर कहा, एक आगे बढ़ाते हुए।
“वो बायाँ है।”
“बूट है। पैर में जाता है।”
“बाएँ पैर में जाता है। वो बायाँ है। ये मेरा दायाँ पैर है।” कबीर ने सबूत के तौर पर पैर पेश किया। “अगर मैं बायाँ दाएँ में पहनूँगा, तो सारा दिन मेरे पैर बहस करते रहेंगे, और मैं उस बहस के अंदर रहूँगा, और मुझे टीचर सुनाई नहीं देंगी।”
“तुम्हें वैसे भी टीचर सुनाई नहीं देतीं। तुम टीचर से बहस करते हो।”
“वो अलग है। वो जान-बूझकर होता है।”
7:52। मम्मी को दूसरा बूट सोफ़े के पीछे मिला, जहाँ बूट नहीं रखे जाते थे, और जोड़ी वाला दस्ताना कहीं नहीं मिला, क्योंकि जोड़ी वाला दस्ताना तारा के पास था, जिसने उसे कहीं ऐसे शांत आत्मविश्वास से रख दिया था जैसे कोई इंसान जो किसी भी पूछताछ में कभी नहीं बताएगा।
“तारा। दस्ताना कहाँ है।”
तारा ने अपनी माँ को सचमुच के गुनहगार की बड़ी, साफ़ आँखों से देखा, और एक ऐसा शब्द बोला जो शब्द नहीं था, और उस कुत्ते की तरफ़ इशारा किया जो उनके पास था ही नहीं।
“हमारे पास कुत्ता नहीं है,” कबीर बोला।
“उसे पता है,” मम्मी सोफ़े में खोदते हुए बोलीं। “ये ध्यान भटकाना है। तुम्हारी बहन बहुत होशियार है। बूट। प्लीज़। मैं प्यार से कह रही हूँ और प्यार ख़त्म हो रहा है।”
पापा अंदर आए, उनसे ठंड एक चादर की तरह लुढ़क रही थी, पैर पटकते हुए, भौंहें सफ़ेद। “गाड़ी चालू है। हम चल रहे हैं। किसी का कोट क्यों नहीं पहना। एक बच्चा स्नोसूट में है और बूट नहीं, और एक बच्चा बूट में है और पैंट नहीं, ऐसा क्यों।”
“तारा की पैंट नहीं है क्योंकि तारा बस के बाद वाली मुसीबत है,” मम्मी बोलीं। “कबीर के बूट नहीं हैं क्योंकि बूट ग़लत पैरों पर ग़लत बूट हैं, इस तरह से कि जितना वक़्त भगवान ने मुझे दिया है उसमें मैं ठीक नहीं कर सकती। इसे ले जाइए। आप गाड़ी चला रहे हैं। मैं नहीं कर सकती। तारा नंगी है।”
“मैं नंगा नहीं हूँ,” कबीर बोला।
“तुम नहीं।”
पापा ने स्नोसूट की ज़िप चढ़ाई। ज़िप चार इंच ऊपर गई और कपड़े के एक टुकड़े पर अटक गई, जिसे वो छोड़ने से पहले मर जाती।
“नहीं,” पापा ने ज़िप से कहा।
“अटक गई?”
“अटकी नहीं। आराम कर रही है।” पापा ने खींचा। ज़िप ने कपड़े को किसी कुत्ते की वफ़ादारी से दाँतों में पकड़े रखा। “साँस बाहर मत छोड़ना। अंदर लो और रोको।”
“मिस ढिल्लों यही करती हैं।”
“तो काम करता है। रोको।” पापा ने झटका दिया, और ज़िप ने एक साथ छोड़ दिया और ऊपर तक भागी, और स्नोसूट ने कबीर को आँखों तक निगल लिया, और एक सेकंड के लिए पूरी तरह कपड़े पहने बच्चे का साफ़, शुद्ध सन्नाटा छा गया।
7:58। एक लड़के को चार चीज़ें पहनाने में उन्हें सत्रह मिनट लगे थे।
बचे छह मिनट, और दरवाज़े से बस स्टॉप तक बर्फ़ के चालीस क़दम, और एक मोज़ा जिसे घुमाया गया था, और फिर से घुमाया गया था, और जो अब भी चुपचाप फिर से चलने लगा था।