चरित्र का गवाह
कॉल पंद्रह मिनट की तय थी। क़िला चार मिनट चला।
मैनेजर का नाम रिक था, और वो स्क्रीन पर वैसे ही आया जैसे मैनेजर आते हैं, थोड़ा ज़्यादा पास, एक माथा और एक पौधा।
“गैरी! ये रहे। बताओ, क्या कर सकता हूँ।”
“रिक। वक़्त देने के लिए शुक्रिया।” पापा सीधे बैठे, अच्छी क़मीज़ अपना काम करती हुई। “मैं एक्स्ट्रा शिफ़्ट के बारे में पूछना चाहता था। वीकेंड, शाम, जो भी हो। मैं और ले सकता हूँ। मैं और लेना चाहता हूँ।”
“और घंटे।” रिक ने एक ऐसी आवाज़ निकाली जो हाँ नहीं थी। “हालात तंग हैं, गैरी, झूठ नहीं बोलूँगा। सबको घंटे चाहिए। मुझे तुम्हें लिस्ट में ऊपर करने के लिए कोई वजह चाहिए होगी, समझ रहे हो?”
पापा के पीछे कंबलों के गिरजाघर ने एक धीमी, इमारत जैसी कराह निकाली, एक दो साल की बच्ची की आवाज़ जिसने भार उठाने वाली मुसीबत बनने का फ़ैसला कर लिया हो।
“समझ रहा हूँ,” पापा बोले, बिना मुड़े, वैसे जैसे आदमी तब नहीं मुड़ता जब वो तकनीकी तौर पर अब भी मान सकता हो कि कुछ नहीं हो रहा।
क़िला गिर पड़ा।
वो वैसे गिरा जैसे क़िले गिरते हैं, एक साथ और एक बड़ी, नरम धप्प के साथ, और मलबे में से उठी तारा, ख़ुश, कंबल को चोग़े की तरह पहने और उसके सिवा कुछ ख़ास नहीं, और उसके पीछे, शांत, सीधा, और मक़सद के साथ लैपटॉप की तरफ़ बढ़ता हुआ, कबीर आया।
“गैरी। वो चोग़े में कोई बच्चा है?”
“मेरे बच्चे,” पापा बोले। “सॉरी, रिक। एक सेकंड।”
पर कबीर स्क्रीन तक पहुँच चुका था और उसने अपना चेहरा उसके सामने कर दिया था, पास, वैसे जैसे किसी इंसान का मुआयना किया जाता है जिसकी तुम मदद करने वाले हो।
“आप मैनेजर हैं?” उसने पूछा।
“मैं मैनेजर हूँ,” रिक बोला, न चाहते हुए भी मोहित होकर।
“तो मैं आपको अपने पापा के बारे में कुछ सच्ची बातें बताना चाहता हूँ।” कबीर ने हाथ बाँध लिए। पापा ने आँखें बंद कर लीं। “वो स्टोर खोलते हैं। अँधेरे में जाते हैं। वो एक बार लेट हुए थे और वो मोज़े की वजह से था, उनकी वजह से नहीं, मोज़ा नीचे चला गया और हमारी बस छूट गई और उसमें उनकी कोई ग़लती नहीं थी। घर पर उनका नाम गुरमेल है और वो थके होते हैं और फिर भी हर रात तारा को कहानी पढ़कर सुनाते हैं, उन रातों में भी जब वो सलेटी होते हैं। वो हर दिन काम सही करते हैं। कोई चेक नहीं करता, और फिर भी वो सही करते हैं। मेरी मम्मी कहती हैं ये सबसे मुश्किल तरह का सही है। वो वाला जिसे कोई नहीं देख रहा।” उसने साँस ली। “और उन्हें घंटे किसी वजह से चाहिए। अच्छी वजह है। दुनिया की सबसे अच्छी वजह।”
और वहाँ कबीर रुक गया।
उसने ख़ुद को रोका, मैनेजर के सामने, खुली स्क्रीन पर, सच्ची बात ठीक उसके मुँह में, सबसे बड़ी और सबसे अच्छी और सबसे मददगार सच्ची बात, कोट, नीला कोट, क्यों की पूरी शक्ल। उसने अपने पापा को देखा। उसके पापा ने उसे वापस देखा और कुछ नहीं कहा, और बस इंतज़ार किया, ये देखने के लिए कि उनके बेटे ने इस हफ़्ते एक पार्किंग में किसी सच्ची बात को खुला छोड़ देने की क़ीमत के बारे में क्या सीखा।
“ये सीक्रेट वजह है,” कबीर ने सँभलकर कहा, हर शब्द ऐसे रखते हुए जैसे बर्फ़ पर बूट रखा जाता है। “तो मैं इसे नहीं बताऊँगा। पर ये असली है, और अच्छी है, और आपको उन्हें घंटे दे देने चाहिए।” उसने एक लंबी साँस छोड़ी, उस लड़के की साँस जिसने किसी भारी चीज़ को पूरे कमरे की चौड़ाई तक उठाकर ले जाकर बिना गिराए नीचे रख दिया हो। “मैंने अंदर रखा। बहुत मुश्किल था। पर मैंने अंदर रखा।”
पापा ने वो साँस छोड़ी जो वो एक हफ़्ते से रोके हुए थे।
रिक एक सेकंड चुप रहा, उस आदमी की ख़ास चुप्पी जो वीडियो कॉल पर ना कहने आया था और जिस पर सात साल के एक चरित्र-गवाह ने घात लगाकर हमला कर दिया हो।
“ख़ैर,” रिक बोला। “ये तो कमाल की गवाही है, गैरी।” उसने गला साफ़ किया। “मुझे वीकेंड का बोर्ड देखने दो। वादा नहीं कर रहा। पर देखने दो।”
“शुक्रिया, रिक,” पापा बोले।
“शुक्रिया, रिक,” कबीर बोला। “आप सही काम कर रहे हैं। आपको भी इसे करते हुए कोई नहीं देख रहा। वो सबसे मुश्किल तरह का होता है।”
उन्होंने कॉल ख़त्म की। लिविंग रूम कंबलों का खंडहर था। तारा ने ज़्यादातर सीरियल खा लिया था और बाक़ी पहन रखा था। बाहर बर्फ़ ऐसे गिरती रही जैसे उसके पास ख़र्च करने को पूरी दोपहर हो।
पापा ने मलबे के पार अपने बेटे को देखा।
“तुमने अंदर रखा,” उन्होंने कहा।
“बहुत मुश्किल था,” कबीर बोला। “वो पूरे वक़्त बाहर आना चाहता था। धक्का दे रहा था।” उसने अपनी छाती मली, जहाँ सच्ची बातें रहती थीं। “क्या यही दूसरा तरीक़ा है? सच्ची बात को अंदर रखना ताकि वो कुछ गिरा न दे?”
“इसका बहुत बड़ा हिस्सा यही है,” पापा बोले। “हाँ।”
“मुझे पसंद नहीं,” कबीर बोला। “पर मैं कर सकता हूँ। कोट के लिए, मैं कर सकता हूँ।”
“पता है तुम कर सकते हो।” पापा ने लिविंग रूम के खंडहर को देखा, कंबलों को, सीरियल को, लगभग ख़र्च हो चुके दो घंटों को। “तुमने आज एक अच्छा काम किया। दो अच्छे काम। तुमने मेरे बारे में सच बताया, और कोट के बारे में सच छिपाए रखा। ये उलटे काम हैं, और तुमने दोनों किए, एक दोपहर में, एक स्क्रीन पर।” उन्होंने सिर हिलाया। “मुझे इनमें से एक सीखने में चालीस साल लगे।”
“कौन-सा,” कबीर बोला।
“बड़े हो जाओगे तब बताऊँगा,” पापा बोले। “ये राज़ है।” और वो मुस्कुराए, क्योंकि पूरी ज़िंदगी में ये पहली बार था जब उन्हें ये बात किसी से कहने को मिली थी, उसकी जगह जिससे ये कही जाती है।
उन्होंने मम्मी के घर आने से पहले क़िला फिर बना दिया, क्योंकि क़िला समझाने से ज़्यादा आसान दोबारा बनाना होता है, और जब वो अंदर आईं, ठंड से गुलाबी और जितनी गई थीं उससे किसी तरह हल्की, और अपने पति और दोनों बच्चों को उनके पास मौजूद हर कंबल के नीचे बैठे पाया, तो वो एक पल दरवाज़े में खड़ी रहीं।
“ये क्या है,” उन्होंने कहा।
“क़िला,” कबीर अंदर से बोला। “आप अंदर नहीं आ सकतीं। ये सीक्रेट क़िला है।” फिर, क्योंकि एक राज़ रखने में उसका सब कुछ ख़र्च हो चुका था: “ये बिल्कुल नॉर्मल क़िला है जिसमें कोई राज़ है ही नहीं। अंदर आइए।”
और मम्मी ने, जिन्होंने दो घंटे कहीं किसी की माँ और किसी की सँभली हुई पत्नी न बनकर बिताए थे, उस बेतुके कंबल-गिरजाघर को देखा जिसमें उनका सब कुछ था, और अपने अच्छे बाहर जाने वाले कपड़ों में घुटनों के बल बैठ गईं, और रेंगकर अंदर चली गईं।