सीक्रेट शनिवार
पता चला कि जीतना आसान हिस्सा था।
सवा दस बजे कबीर शासन शुरू करने ऑफ़िस गया।
प्रिंसिपल हाल्वोर्सन एक भारी-भरकम, थके हुए आदमी थे जो बहुत समय से स्कूल चला रहे थे और ज़्यादातर उसमें बच्चों की गिनती से डरते थे, जो बढ़ती ही जाती थी जबकि बिल्डिंग उतनी ही रहती थी। उन्होंने चश्मे के ऊपर से कबीर को देखा।
“मैं चुना गया हूँ,” कबीर बोला।
“बधाई हो।”
“मुझे तीन घंटे की रिसेस चाहिए, और रोज़ हॉट चॉकलेट।”
प्रिंसिपल हाल्वोर्सन ने वो चेहरा बनाया जो बड़े बनाते हैं, जो मुस्कान पहने हुए एक ना होता है। “रिसेस पंद्रह मिनट की होती है।”
“क्यों?”
“टाइम-टेबल है।”
“इंचार्ज कौन है,” कबीर बोला। “आप, या टाइम-टेबल?”
प्रिंसिपल हाल्वोर्सन ने मुँह खोला, और बंद किया, और कबीर ने एक भारी, थके आदमी को ठीक उसी पल उसी जगह पहुँचते देखा जहाँ मिस ढिल्लों पहली सुबह पहुँची थीं: वो जगह जहाँ तुम्हें पता चलता है कि तुम ज़िंदगी भर काग़ज़ के एक टुकड़े से हुक्म लेते रहे हो और उसी वक़्त बता नहीं सकते कि क्यों।
“टाइम-टेबल,” प्रिंसिपल हाल्वोर्सन ने माना।
“मुझे यही लगा था,” कबीर बोला, और अपने वोटरों को बताने चला गया।
रिसेस में, जो पंद्रह मिनट की थी, जैसे उनमें से किसी के पैदा होने से पहले से थी, क्लास को नतीजे चाहिए थे।
“हॉट चॉकलेट कहाँ है,” कोल बोला।
“नहीं है,” कबीर बोला, और ठंडी सीढ़ी पर बैठ गया। “घंटी असली है, और टाइम-टेबल असली है, और प्रिंसिपल हाल्वोर्सन उनसे मुझसे ज़्यादा डरते हैं। फिर वही कैलेंडर वाली बात है। हर चीज़ कैलेंडर है।”
“तो तुम कुछ नहीं कर सकते,” कोल बोला।
“एक चीज़ कर सकता हूँ,” कबीर बोला।
वो ठंडी सीढ़ी पर ऐसे खड़ा हुआ जैसे सीढ़ी कोई स्टेज हो।
“तीन घंटे की रिसेस नहीं मिल सकती,” उसने उनसे कहा। “घंटी असली है। मैं असली चीज़ नहीं हिला सकता। पर शनिवार को कोई नहीं देख सकता। शनिवार बस एक एहसास है। और अब इंचार्ज मैं हूँ।” उसने उन सबको देखा। “तो। अगले दस मिनट, शनिवार है।”
“बुधवार है,” टायलर बोला।
“साबित करो,” कबीर बोला।
टायलर ने काली किताब खोली, और पाया कि उसमें कहीं भी एक भी ऐसी चीज़ नहीं थी जो साबित करे कि बुधवार है, और उसे फिर बंद कर दिया।
तो दस मिनट के लिए, सितंबर के एक बुधवार को, कनाडा के सबसे बदनाम शहर में, बीस बच्चों का एक सीक्रेट शनिवार हुआ। इसकी कोई क़ीमत नहीं थी। ये किसी टाइम-टेबल में नहीं था और इसलिए कोई इसे रद्द नहीं कर सकता था। ये कबीर का इकलौता चुनावी वादा था जो उसने कभी निभाया, और क्लास इस पर एकमत थी कि ये उनकी ज़िंदगी की सबसे अच्छी रिसेस थी।
टायलर उसके किनारे खड़ा रहा, खेले बिना, काली किताब सीने से लगाए।
“तुम इसके इंचार्ज बन सकते हो,” कबीर ने उससे कहा।
“किसके इंचार्ज। ये असली नहीं है। तुमने ख़ुद कहा।”
“ये पक्का करने के इंचार्ज कि कोई न कहे कि बुधवार है। ये असली काम है। मेरा बस यही एक नियम है, और वो तुम्हारा है।”
टायलर ने इस पर सोचा। फिर उसने काली किताब का एक साफ़ पन्ना खोला और सबसे ऊपर, अपने सबसे अच्छे अक्षरों में, लिखा: शनिवार। नियम। उसके नीचे उसने पहला नियम लिखा: कोई बुधवार नहीं। और वो थोड़ा और सीधा खड़ा हो गया, एक ऐसे दिन की रखवाली करता हुआ जो था ही नहीं, और पता चला कि ये पहला काम था जिससे उसे कभी प्यार हुआ।
घर पर, डिनर के वक़्त, कबीर ने बताया कि वो चुना गया है।
“चुना गया,” पापा सीधे होकर बैठ गए। “मेरा बेटा। चुना गया।” वो अपनी आँखों के पीछे कहीं पहले ही नॉर्डमार्ट के लोगों को बता रहे थे। “किसलिए चुना गया?”
“सबकी तरफ़ से बोलने के लिए।”
“सबकी।” पापा ख़ुश होकर पीछे टिक गए। “देखा,” उन्होंने मम्मी से कहा, “इस देश में एक लड़का हवाई जहाज़ से उतरता है, और तीन साल में सबकी तरफ़ से बोल रहा होता है। और कहाँ। कहीं नहीं।” वो अपनी आँखों के पीछे नॉर्डमार्ट के लोगों को पहले ही बता चुके थे, और वो लोग, उनकी आँखों के पीछे, प्रभावित हो चुके थे।
“और वादा क्या किया?” मम्मी बोलीं, सधी हुई आवाज़ में।
“हॉट चॉकलेट। तीन घंटे की रिसेस। एक सीक्रेट शनिवार।”
सधी हुई आवाज़ बिल्कुल ठहर गई। “और क्या तुम उन्हें ये चीज़ें दे सकते हो?”
“नहीं।”
“तो लोग बातें करेंगे,” मम्मी बोलीं। “ऐसे लड़के के बारे में जो वादा करता है और पूरा नहीं करता।”
“लोग वैसे भी बातें करेंगे,” कबीर बोला, उन्हीं के शब्द उन्हें लौटाता हुआ बिना जाने कि वो उनके हैं, “तो मैंने उन्हें कुछ सच दे दिया। मैंने उन्हें शनिवार दे दिया।” वो फिर खाने लगा। “आपको भी करके देखना चाहिए। आइडिया आपका है।”
मम्मी ने जवाब नहीं दिया। रसोई के दरवाज़े में, जहाँ उन्हें लगता था कि कोई उन्हें देख नहीं सकता, उन्होंने अपने बेटे को ऐसे देखा जैसे उस आईने को देखा जाता है जो पलटकर जवाब देने लगा हो।
प्लेटें उठने तक प्रमिला आंटी को पता चल चुका था, क्योंकि प्रमिला आंटी को हमेशा पहले से पता होता था। उन्होंने मम्मी को बधाई देने के लिए फ़ोन किया और पैंतालीस मिनट तक गर्मजोशी से देती रहीं। “लीडर,” उन्होंने लाइन पर कहा। “अभी से लीडर।” मम्मी ने शुक्रिया कहा, और हाँ, और शुक्रिया, और पूरे वक़्त मेज़ पर बैठे उस लड़के को देखती रहीं जिसने एक एहसास से टाइम-टेबल को हरा दिया था।
जब आख़िरकार उन्होंने फ़ोन रखा, तो उन्होंने वो मेज़ पोंछी जो कबीर पहले ही साफ़ कर चुका था, और फिर दोबारा पोंछी, और फिर तीसरी बार, वैसे ही जैसे वो उन क़मीज़ों पर इस्त्री करती थीं जिनमें कोई सिलवट बची ही न हो।