सब्स्टिट्यूट वाला जाल
गुरुवार को मिस ढिल्लों नहीं आईं, और कमरे ने इसे जानने से पहले महसूस कर लिया, वैसे ही जैसे कोई कमरा रात में खिसकाई गई कुर्सी को महसूस करता है।
“वो कहाँ हैं,” कबीर ने ख़ाली डेस्क से कहा।
“जब टीचर बीमार होती हैं तो सब्स्टिट्यूट आते हैं,” आरव बोला, जिसे चीज़ें पता होती थीं। “एक दिन के लिए दूसरी मिल जाती हैं।”
“दूसरी क्या।”
“दूसरी टीचर।”
कबीर को ये बिल्कुल पसंद नहीं आया। उसने अभी-अभी पहली वाली को सीखना ख़त्म किया था।
दूसरी टीचर मिस क्रान थीं, और वो तेज़ी से अंदर आईं, वैसे जैसे लोग तब तेज़ी से आते हैं जब वो डरे हुए हों और उन्होंने तय कर लिया हो कि रफ़्तार डर को छिपा लेगी। उन्होंने बोर्ड पर अपना नाम इतने ज़ोर से लिखा कि मार्कर चीं-चीं करने लगा।
“मिस क्रान,” उन्होंने कहा, उसके नीचे दो बार लकीर खींचते हुए। “आज के नियम सीधे हैं। हम बात नहीं करेंगे। हम अपनी सीट से नहीं उठेंगे। हम वॉशरूम जाने की इजाज़त नहीं माँगेंगे जब तक इमरजेंसी न हो, और इमरजेंसी कभी नहीं होती। समझ गए।”
“क्यों,” कबीर बोला।
मिस क्रान को उम्मीद नहीं थी कि ग्यारह सेकंड में ही टोका जाएगा। “क्या क्यों।”
“इमरजेंसी कभी क्यों नहीं होती।”
“क्योंकि अगर मैंने तुम में से एक को जाने दिया, तो सब कहेंगे कि उन्हें जाना है।”
“क्यों।”
“क्योंकि बच्चे यही करते हैं।”
“क्यों।”
“क्योंकि।” मिस क्रान रुक गईं। वो सुबह के नौ बजकर ग्यारह मिनट पर क्योंकि शब्द तक पहुँच गई थीं, जो उस सड़क का आख़िरी घर है, और उन्हें सुनाई दे रहा था कि लड़का उसका दरवाज़ा खटखटाने के लिए अभी से हाथ उठा रहा है।
“बहुत हो गया,” उन्होंने कहा।
“मैं बस पूछ रहा हूँ क्यों,” कबीर बोला। “अगर कोई अच्छी वजह है, तो मैं रुक जाऊँगा। आमतौर पर वजह होती है। मेरी असली टीचर के पास वजहें होती हैं। कभी-कभी उन्हें मिलती नहीं, पर वो ढूँढ़ती हैं। आपको उन्हें ढूँढ़ते देखना चाहिए।”
“वजह,” मिस क्रान बोलीं, “ये है कि मैंने कहा।”
“वो वजह नहीं है। वो बस वो आवाज़ है जो किसी वजह की होती।”
क्लास ने वो हल्की-सी आवाज़ निकाली जो बीस बच्चे तब निकालते हैं जब वो किसी बड़े को गड्ढे में पैर रखते देखते हैं।
जैसे कमरे ने ख़ुद नियम को परखने का फ़ैसला किया हो, पेटन नाम की एक छोटी बच्ची ने हाथ उठाया।
“मिस क्रान? इमरजेंसी है।”
“इमरजेंसी कभी नहीं होती।”
“ये वाली ऐसी है जो बन जाती है,” पेटन बोली, उस बच्ची के सुकून के साथ जिसने हिसाब लगा लिया हो।
मिस क्रान ने पेटन को देखा, और घड़ी को, और उस छह साल की बच्ची के चेहरे पर उस ख़ास धीरज भरी दहशत को जिसने अपनी हालत का सही अंदाज़ा लगा लिया था, और उन्होंने अपनी सुबह का पहला समझदारी वाला फ़ैसला लिया।
“जाओ,” उन्होंने कहा। “जल्दी।”
“अब इमरजेंसी क्यों है,” कबीर ने ख़ुश होकर कहा, “जब नौ बजे उसे होने की इजाज़त नहीं थी?”
“क्योंकि अब असली वाली है,” मिस क्रान बोलीं, और आधा सेकंड देर से सुना कि उन्होंने क्या कह दिया।
“तो इमरजेंसी हो सकती है,” कबीर बोला। “आपने कहा कभी नहीं। कभी नहीं नहीं था। बस अभी नहीं था।”
मिस क्रान ने तरीक़ा बदला। उन्होंने टीचरों वाली एक किताब में पढ़ा था कि बच्चों से लड़ा नहीं जाता, उन्हें सँभाला जाता है, तो उन्होंने बोर्ड पर पाँच सितारे बनाए।
“जब भी क्लास पाँच मिनट चुप रहेगी, तुम्हें एक सितारा मिलेगा,” उन्होंने कहा। “पाँच सितारे, और शुक्रवार को फ़्री टाइम।”
“शुक्रवार को हम यहाँ नहीं होंगे। आप होंगी। शुक्रवार को हमें मिस ढिल्लों वापस मिल जाएँगी।”
“तो सितारे उनकी क्लास के लिए हैं।”
“तो काम हम करें और इनाम वो दें?” कबीर ने इसे पलटकर देखा और उसे इसकी शक्ल पसंद नहीं आई। “ये घाटे का सौदा है। और फ़्री टाइम तो बस टाइम है। हमारे पास पहले से जितना टाइम है, सारा है। आप हमें वो चीज़ नहीं दे सकतीं जो हमारे पास पहले से है और उसे इनाम नहीं कह सकतीं।”
मिस क्रान ने अपने बनाए पाँच सितारों को देखा और समझ गईं कि किसी तरह, बीस मिनट से भी कम में, उनसे मोल-भाव कर लिया गया था, और वो हार गई थीं।
“और,” डॉसन बोला, हिम्मत पाकर, “पाँच सितारे क्यों। चार क्यों नहीं।”
“मत करो,” मिस क्रान बोलीं।
“उसे पूछने की इजाज़त है,” कोल बोला। “कबीर ने इजाज़त बना दी।”
और अब ये पानी में घुल चुका था। अब ये एक लड़का नहीं था जो क्यों पूछ रहा था, ये पूरा कमरा था जिसे याद आ गया था कि उसे पूछने की इजाज़त है, और हर तरफ़ से एक साथ क्यों आने लगे, धीरे-धीरे, बिना किसी बुराई के, गोफ़र रिज के इतिहास की सबसे धीरज भरी बग़ावत।
अपने करियर की पहली क्लास के बीस मिनट में वो पूरा कमरा खो चुकी थीं। और इसलिए अब उन्होंने डरी हुई टीचर के पास मौजूद सबसे पुराने और सबसे बुरे औज़ार की तरफ़ हाथ बढ़ाया।