Chapter 3

अम्मा

2026 · स्वर्णा डायनैमिक्स टावर, 40वीं मंज़िल · रात 2:15

विक मेहरोत्रा सोया नहीं था। वो कम ही सोता था।

वो खिड़की पर सलेटी स्वेटर में गरम पानी और नींबू का कप लिए खड़ा था, और उस टैबलेट पर वॉल्ट का वीडियो देख रहा था जो उसकी असिस्टेंट ने आगे बढ़ा रखा था। काली जैकेट वाली एक औरत। एक शेल्फ़। औरत डायल को ऐसे उठाती हुई जैसे फ़ुटपाथ से सिक्का।

दफ़्तर की हर चीज़ काँच की थी या स्टील की या बहुत महँगी, सिवाय एक चीज़ के। उसकी मेज़ के कोने पर एक पुराना खनिक वाला लैंप रखा था, वैसा जैसा कभी कोलार की सोने की खदानों में आदमी अपने हेलमेट पर पहनते थे। पीतल में गड्ढे थे। काँच चटका हुआ था। उसे साफ़ करने की किसी को इजाज़त नहीं थी।

“हम उन्हें एक घंटे में उठवा सकते हैं,” रिया ने कहा। वो बीस घंटे से जागी हुई थी। उसकी कलाई पर एक पतला रेशमी धागा बँधा था, और वो उसे अँगूठे से घुमाती रहती थी।

“नहीं,” विक ने कहा। “रखने दो उन्हें। इसे सही हाथ चाहिए।”

“सर, एक और बात है। डायल केस बारह में था, अलार्म के साथ। किसी ने केस बारह नहीं खोला। कैमरे आधी रात को वो शेल्फ़ ख़ाली दिखाते हैं। 12:40 पर डायल उस पर है।”

विक खिड़की से मुड़ा। उस रात पहली बार उसमें दिलचस्पी दिखी।

“तो कोई और भी खेल रहा है,” उसने कहा।

2026 · कांचीपुरम, बुनकरों की गली · दो दिन बाद, शाम 6:40

कांचीपुरम तक पूरे रास्ते बारिश होती रही, और क्लाइंट ने कुछ नहीं लिखा।

पुरम ने गुड़गाँव से तमिलनाडु तक हर टोल प्लाज़ा पर जॉब वाला फ़ोन देखा था। दो हज़ार एक सौ किलोमीटर। कुछ नहीं। हर आधी रात, किसी ट्रक स्टॉप पर गाड़ी में बैठकर, घुटनों पर तौलिए में लिपटा डायल रखे, उसने खाँचे गिने थे, और हर आधी रात एक और काला पड़ गया था।

एक सौ पाँच।

“तुम फिर गिन रहे हो,” ड्राइवर की सीट से कांची ने कहा।

“मैं चेक कर रहा हूँ।”

“तुम गिन रहे हो। तुम्हारे होंठ हिलते हैं।”

“नहीं हिलते।”

“वो कहते हैं इकतालीस, बयालीस।” उसने सलेटी एसयूवी मेन रोड से उतारकर एक ऐसी गली में मोड़ी जो उसके लिए बहुत तंग थी। “पहुँच गए।”

बुनकरों की गली वैसी ही दिखती थी जैसी छह साल पहले थी। हरे, गुलाबी और नीले रंग के नीचे घर, दीवार से दीवार जुड़े। एक ठेले पर गीली चमेली। कहीं मंदिर की घंटी। और सबके नीचे, हर घर के अंदर से, वो आवाज़ जो पुरम कभी नहीं भूला था: हथकरघों की खट और धम, दर्जनों, जैसे एक धीमा दिल जो पूरी गली का हो।

छह साल पहले वो अपनी पहली जॉब पर साथ यहाँ आए थे, एक ऐसे परिवार की चोरी हुई साड़ी वापस लाने जो पुलिस को पैसे नहीं दे सकता था। पूरे वक़्त वो बहस करते रहे थे। एक बूढ़ी औरत अपने दरवाज़े से उन्हें देखती रही थी, और जब उनका काम हो गया, उसने कहा था, “एक शहर, दो टुकड़ों में।” तब से वो उन्हें कांची और पुरम कहती थी। बाक़ी सब भी।

उसका दरवाज़ा खुला था। हमेशा खुला रहता था।

“अम्मा?” कांची ने आवाज़ दी।

“यहाँ। जूते उतारो। मेरे फ़र्श पर टपक रहे हो।”

अम्मा बहुत छोटी और बहुत बूढ़ी थीं और फ़र्श के एक गड्ढे में अपने करघे पर बैठी थीं, इस तरह कि उनका सिर उनके घुटनों के बराबर था। उनके हाथ चलते रहे। ढरकी एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ गई, हत्था नीचे आया, धम, और लाल रेशम एक बाल की चौड़ाई जितना बढ़ गया।

“आ गए,” उन्होंने ऊपर देखे बिना कहा। “बड़ी देर लगाई।”

“हमने आपको साल भर से नहीं देखा,” पुरम ने कहा। “आपको कैसे पता था कि हम आ रहे हैं?”

“बैठो। कॉफ़ी है।”

कॉफ़ी हमेशा होती थी। वो एक नीचे स्टूल पर दो स्टील के टंबलरों में रखी थी, गरम, जैसे उन्होंने उसी पल डाली हो जब उनकी गाड़ी गली में मुड़ी थी। पुरम ने इस बारे में न सोचने का फ़ैसला किया।

कांची करघे के बग़ल में फ़र्श पर बैठ गई। उसने तौलिया खोला। “हमें आपको कुछ दिखाना है।”

अम्मा के हाथ रुक गए।

पुरम ने उन्हें पहली बार रुकते देखा। उन्होंने डायल को देर तक देखा। वो हैरान नहीं लगीं। वो ऐसी लगीं जैसे लोग उस ट्रेन को देखते हैं जो ठीक वक़्त पर आई हो।

“ये कहाँ से मिला?”

“गुड़गाँव में एक अमीर आदमी के वॉल्ट से,” कांची ने कहा। “ये घड़ियाँ रोक देता है। इस पर कहीं कुछ लिखा नहीं है। बस खाँचे। पुराने निशान आप सबसे अच्छे पढ़ती हैं, अम्मा, तो…”

“इसे फ़र्श पर रखो।”

कांची ने उसे फ़र्श पर रख दिया। अम्मा धीरे-धीरे गड्ढे से बाहर निकलीं और कोने में रखे एक स्टील के ट्रंक तक गईं। उन्होंने अख़बार में लिपटा एक तह किया हुआ कपड़ा निकाला, अख़बार खोला, और कपड़ा खोला।

वो एक साड़ी के बॉर्डर का टुकड़ा था, बहुत पुराना, खाल जितना नरम, सूखे ख़ून के रंग का। उस पर फीके सुनहरे धागे से एक डिज़ाइन बुना था: एक पहिये के चारों तरफ़ छोटे गोल दानों की एक अँगूठी, बीच में सुई जैसी एक छोटी लकीर।

कांची पहले से गिन रही थी। उसके होंठ हिल रहे थे। पुरम ने देखा, और एक बार के लिए कुछ नहीं कहा।

“एक सौ आठ,” उसने धीरे से कहा।

“ये किसने बुना?” पुरम ने कहा।

“मेरी दादी की दादी ने। उनकी दादी वाले से नक़ल करके। उससे पुराने वाले से नक़ल करके।” अम्मा ने हाथ बाँध लिए। “नक़लों की नक़लें। हमेशा एक जैसी।”

“अम्मा। ये है क्या?”

उन्होंने डायल को देखा, और उन दोनों को, और उनके चेहरे में कुछ था जो अफ़सोस कर रहा था।

“मेरी बात सुनो,” उन्होंने कहा। “तुम इसे ले जा सकते हो। इसके पास सो सकते हो। जेब में रख सकते हो। पर इसे कभी साथ मत छूना। दोनों, एक ही वक़्त पर। कभी नहीं।”

“क्यों?” पुरम ने कहा।

उन्होंने अपनी कॉफ़ी उठाई।

“अम्मा। क्यों?”

“कॉफ़ी पियो। ठंडी हो रही है।”

पुरम ने कहने के लिए मुँह खोला कि उसने दो हज़ार एक सौ किलोमीटर गाड़ी चलाई है और एक सीधे जवाब का हक़दार है, तभी करघा हिलने लगा।

करघा नहीं, फ़र्श हिल रहा था। इंजन, बड़े वाले, गली में ऊपर आते हुए। कांची उठकर खिड़की तक गई, और पुरम ने उसकी पीठ अकड़ते देखी।

तीन काली गाड़ियाँ बुनकरों की गली में मुड़ आई थीं। वो उसके लिए बहुत चौड़ी थीं। पहली ने चमेली के ठेले को रगड़ा और रुकी नहीं। बारिश में, हेडलाइटों में, बाक़ी दो के ड्राइवर उतर रहे थे, और उनके कपड़े शादी वाले नहीं थे।

“पुरम,” कांची ने कहा। “इन्हें पता था हम कहाँ जाएँगे।”

उनके पीछे, अम्मा वापस अपने गड्ढे में उतरीं, करघे पर बैठीं, और शांति से बुनने लगीं।

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