Chapter 4

जंगल

2026 · कांचीपुरम, बुनकरों की गली · शाम 6:52

“पीछे से निकलो,” अम्मा ने करघे से नज़र उठाए बिना कहा। “सेल्वी की रसोई से होकर। उसे बुरा नहीं लगेगा। उससे कहना चावल जल रहे हैं।”

“क्या उसके चावल जल रहे हैं?”

“हमेशा जलते रहते हैं।”

कांची ने डायल वाला तौलिया उठाया और पुरम ने अपना बैग, और वो पिछले दरवाज़े से एक गीले आँगन में निकले, फिर एक दीवार की दरार से, फिर एक रसोई में जहाँ नीली नाइटी में एक भारी-भरकम औरत एक पतीले में करछी चला रही थी।

“तुम्हारे चावल जल रहे हैं,” कांची ने कहा।

“नहीं जल रहे,” सेल्वी ने कहा, और देखा, और गाली दी, और उसके पलटने से पहले वो उसके आगे वाले दरवाज़े से अगली गली में निकल चुके थे।

उनके पीछे, दूर, कोई अम्मा का दरवाज़ा खटखटा रहा था। एक औरत की आवाज़, शिष्ट और थकी हुई, बारिश के ऊपर से आई। “मिस रॉय? मिस्टर मेहरोत्रा बस बात करना चाहते हैं। किसी को भीगने की ज़रूरत नहीं।”

“उसे मेरा नाम पता है,” कांची ने कहा।

“उसे सब पता है।” पुरम पहले से दाएँ-बाएँ देख रहा था। “गाड़ी दूसरी तरफ़ है। उसके लिए वापस नहीं जा सकते।”

“तो उसके लिए वापस नहीं जाएँगे।”

अगली गली बुनाई वाली गली थी, लंबी वाली, जहाँ करघे पर चढ़ाने से पहले ताना खुले में फैलाया जाता है। सैकड़ों रेशमी धागे, लाल और हरे और सुनहरे, गली के बीचोबीच पचास मीटर तक कमर की ऊँचाई पर डंडों पर तने थे, बारिश में चमकते हुए। आदमी मौसम को कोसते हुए उन्हें तेज़ी से लपेट रहे थे। आख़िरी सिरे पर एक बड़ा शेड, दरवाज़े खुले, अंदर दस करघे, सब चलते हुए। खट, धम। खट, धम।

कांची धागों के साथ-साथ भागी। पुरम उसके पीछे भागा, हर उस आदमी से “सॉरी, सॉरी, सॉरी” कहते हुए जिसके पास से वो गुज़रे।

गली के दूर वाले सिरे पर हेडलाइटें घूमकर आईं।

वो झुककर शेड में घुस गए। वो गरम और शोर भरा था और उसमें रेशम और मशीन के तेल की गंध थी। बुनकरों ने ऊपर देखा, दो भीगे अजनबियों को धागों की रीलों के एक ढेर के पीछे दुबकते देखा, और वापस बुनने लगे। कांची ने तय किया कि उसे उन सबसे प्यार है।

वो गुनगुना रही थी। उसे तभी पता चला जब पुरम ने उसकी तरफ़ देखा। ये वो गीत था जो उसकी माँ कोलकाता में बारिश होने पर गाती थीं, बिना असली शब्दों वाला, बस एक धुन जो छत से गिरते पानी की तरह ऊपर जाती और नीचे आती। वो डरने पर हमेशा इसे गुनगुनाती थी। उसने उसे कभी बताया नहीं था। फिर भी उसे पता था। वो उसे जानते हुए देख सकती थी।

“कितने हैं?” उसने फुसफुसाकर कहा।

उसने रीलों के बीच की दरार से देखा। “चार। औरत। तीन आदमी। घर चेक कर रहे हैं।”

“प्लान?”

“बना रहा हूँ।”

“जल्दी बनाओ।”

“मुझे दो मिनट चाहिए, कांची। प्लान को चाहिए —”

शेड का दरवाज़ा भड़ाक से खुला। आदमियों में से एक उसमें खड़ा था, जैकेट से बारिश झाड़ता हुआ, इधर-उधर देखता हुआ।

कांची हिली। उसने तय नहीं किया था। वो पिछले दरवाज़े की तरफ़ भागने को खड़ी हुई, और तौलिया एक करघे के कोने में अटक गया, और डायल बाहर गिर गया।

वो सबसे पास वाले करघे के ताने से टकराया और उछला, और घूमा, और फ़र्श पर दरवाज़े वाले आदमी की तरफ़ लुढ़का।

उसने उसकी तरफ़ छलाँग लगाई। पुरम ने भी।

उसका हाथ कांसे के किनारे पर बंद हुआ, कॉफ़ी के कप जितना गरम। उसका हाथ दूसरी तरफ़ बंद हुआ।

शेड का हर करघा रुक गया। दसों एक साथ, धम के बीच में। सबसे पास वाले में ढरकी धागों के बीच हवा में लटकी रह गई।

फिर बारिश भी रुक गई।

फिर कोई शेड नहीं था।

3102 ईसा पूर्व · कांची · युग पलटने से 38 दिन पहले

अँधेरा। असली अँधेरा, वैसा जैसा उसने बरसों पहले कच्छ के रण में एक खुदाई के बाद से नहीं देखा था, जहाँ सबसे पास का बल्ब साठ किलोमीटर दूर था।

गीली मिट्टी। पत्ते। उसके घुटनों के नीचे कुचलती किसी हरी और तीखी चीज़ की गंध। मेंढक, हज़ारों, सब एक साथ बोलते हुए। ऊपर, उसके जाने किसी भी पेड़ से ऊँचे पेड़ों की एक दरार से, आसमान से ज़्यादा तारे।

वो घुटनों के बल थी। पुरम उसके सामने घुटनों के बल था। उनके बीच, दोनों के हाथों में, डायल बहुत हल्का चमक रहा था, जैसे फूँक मारने पर कोयला चमकता है।

“छोड़ो,” पुरम ने कहा। “धीरे से। साथ में।”

उन्होंने छोड़ दिया। चमक बुझ गई।

देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। मेंढकों ने बहुत कुछ बोला।

“हम कहाँ हैं?” आख़िर कांची ने कहा।

पुरम ने फ़ोन निकाल लिया था। स्क्रीन ने उसका चेहरा नीला कर दिया। “सिग्नल नहीं। जीपीएस नहीं।” उसने टैप किया। “ऑफ़लाइन मैप्स को भी नहीं पता हम कहाँ हैं।”

“तारों वाली चीज़ आज़माओ।”

उसने वो स्टार ऐप खोला जो वो अपनी ड्रोन उड़ानों के लिए इस्तेमाल करता था। उसने उसे पेड़ों की दरार की तरफ़ उठाया। ऐप ने सोचा। स्क्रीन पर एक धीमा गोला घूमा। फिर एक लाल चेतावनी का डिब्बा आया, और उसने उसे पढ़ा, और फिर पढ़ा।

“क्या?”

“ये कह रहा है ध्रुव तारा ग़लत है।”

“तारे ग़लत नहीं हो सकते।”

“नहीं, पर वो हिलते हैं। बहुत धीरे। जो तारा उत्तरी ध्रुव के ऊपर बैठता है वो हज़ारों सालों में बदलता है।” उसने फ़ोन घुमाया ताकि वो देख सके। ऐप ने एक धुँधले तारे तक लकीर खींची थी जिसे वो नहीं जानती थी। “अभी ध्रुव तारा पोलारिस है। ऐप कह रहा है ये वाला है। थुबान।”

“और थुबान ध्रुव तारा कब था?”

उसने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसका अँगूठा स्क्रीन पर चला।

“लगभग पाँच हज़ार साल पहले,” पुरम ने कहा।

कांची हँस पड़ी। वो रोक नहीं पाई। हँसी उसके अंदर से गुब्बारे से निकलती हवा की तरह निकली, और जंगल के लिए बहुत ज़ोर की थी, और मेंढक सुनने के लिए एक पल रुक गए।

“पाँच हज़ार साल,” उसने कहा। “पुरम। किताबें कहती हैं कि यहाँ तब तक कोई रहता ही नहीं था। कोई शहर नहीं। कोई मंदिर नहीं। यहाँ कुछ नहीं है। मैं एक पेपर लिख सकती हूँ। मैं दस पेपर लिख सकती हूँ, और वो मुझे देश की हर खुदाई से निकाल देंगे, और मैं सही होऊँगी…”

वो हँसना बंद कर गई।

उसने उनके बीच ज़मीन पर पड़े डायल को देखा, और अपने हाथ को, और उसके हाथ को।

इसे कभी साथ मत छूना।

“हम वापस जा सकते हैं,” पुरम ने जल्दी से कहा। “दोनों हाथ इस पर, पहले जैसे। बस वापस चले जाएँ।”

“विक के आदमियों से भरे शेड में।”

“विक के आदमियों से भरे शेड में जो पाँच हज़ार साल दूर हैं। मुझे आदमी चलेंगे।”

“अभी गए तो ठीक उनके सामने उतरेंगे। दस मिनट दो। उन्हें ऊबकर चले जाने दो।”

“तुम्हारा प्लान इंतज़ार करना है?”

“मेरा प्लान इंतज़ार करना है,” उसने कहा। “लिख लो। पहली बार है।”

वो लगभग मुस्कुरा दिया। फिर उसका चेहरा बदला, और वो उसके पार, पेड़ों के अंदर देख रहा था।

कांची मुड़ी।

दूर, काले तनों के बीच, रोशनियाँ थीं। नारंगी रोशनियाँ, हिलती हुई, उछलती हुई, जैसे रोशनियाँ हिलती हैं जब लोग उन्हें उठाकर चलते हैं। मशालें। पाँच, छह, ज़्यादा। और आवाज़ें, जंगल के आर-पार एक-दूसरे को पुकारती हुई, पास आती हुई।

उसे शब्द समझ आए। ये पहली अजीब बात थी। दूसरी ये थी कि वो क्या पुकार रहे थे।

“शिल्पी!” कोई चिल्लाया। “शिल्पी! कहाँ हो तुम?”

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