Chapter 5

शिल्पी

3102 ईसा पूर्व · कांची · युग पलटने से 37 दिन पहले

वो भाले लिए पेड़ों के बीच से निकले।

सिपाही नहीं थे। पुरम मशाल की रोशनी में भी इतना देख सकता था। सिपाही लाइन में खड़े होते हैं। ये लोग एक ढीले घेरे में खड़े थे, आठ या नौ, खुरदुरे सूती कपड़ों में आदमी और औरतें, नंगे पैर, भाले ऐसे पकड़े जैसे नीचे कोई आवाज़ सुनकर झाड़ू पकड़ी जाती है। सबसे आगे एक लड़का था, शायद चौदह का, जो डरा हुआ कम और रोमांचित ज़्यादा लग रहा था। उसके पीछे एक बूढ़ी औरत सूखी घास के एक टुकड़े को बट-बटकर रस्सी बना रही थी, गोल-गोल, और देख रही थी।

“नीचे रहो,” पुरम ने कांची से कहा।

वो पहले से नीचे थी। वो फिर गुनगुना रही थी, बहुत धीरे, बारिश वाला गीत। उसने इसे सौ जॉब्स पर सौ बार सुना था। उसने कभी इसके बारे में पूछा नहीं था। उसे हमेशा लगता था कि अगर पूछेगा तो वो शायद बंद कर देगी।

लड़का पास आया। उसकी मशाल से पत्तों पर आग टपकी। “तुम में से शिल्पी कौन है?”

“कोई नहीं,” पुरम ने कहा। “हम भटक गए हैं। हम जा रहे हैं। अभी के अभी जा रहे हैं।”

“ये है,” कांची ने कहा।

पुरम ने सिर घुमाकर उसे घूरा।

“ये चीज़ें बनाता है,” उसने लड़के से कहा। “पूछ लो इससे। इसने सैंतालीस स्टेप वाला पूरा प्लान बनाया था।”

“कांची।”

“क्या? इनके पास भाले हैं। तुम शिल्पी हो।”

भाले ऊपर उठे, नोकें आसमान की तरफ़, और उन्हें पकड़े लोगों ने एक-दूसरे को देखा, और घेरे में से कुछ ऐसे गुज़रा जैसे घास में से हवा। बूढ़ी औरत ने रस्सी बटना बंद कर दिया।

और फिर जंगल ख़ामोश हो गया।

मेंढक रुक गए, सबके सब एक साथ। इस बार कुछ जमा नहीं। मशालें अब भी लपलपा रही थीं। लड़का अब भी साँस ले रहा था। पर हवा नरम और गरम हो गई थी, जैसे किसी ने उसे जगाए बिना उसके कंधों पर कंबल डाल दिया हो, और जो डर पुरम करघे वाले शेड से अपने पेट में पकड़े बैठा था, वो बस वहाँ था ही नहीं। उसने उसे ढूँढ़ा और नहीं मिला।

उसके बग़ल में, कांची ने गुनगुनाना बंद कर दिया था।

ये शायद दस सेकंड चला। फिर मेंढक फिर शुरू हो गए, एक, फिर दस, फिर हज़ारों, और रात एक आम रात थी।

बूढ़ी औरत आगे आई। वो नंगे पैर थी और झुकी हुई और उसकी आँखें बहुत चमकीली थीं। उसने पुरम को ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे ख़रीदने से पहले घोड़ा जाँचा जाता है।

“मैं नीला हूँ,” उसने कहा। “ये सेंधन है। हम इस धरती की रखवाली करते हैं।” उसने घास की रस्सी कमर में खोंस ली। “हमें बताया गया था कि अंत से पहले एक शिल्पी आएगा। एक शिल्पी जो जानता है कि ये युग कैसे ख़त्म होता है।”

“मुझे नहीं पता कि कुछ भी कैसे ख़त्म होता है,” पुरम ने कहा। “मुझे तो ये भी नहीं पता कि मैं कहाँ हूँ।”

“तुम कांची में हो।”

उसके बग़ल में कांची ने एक आवाज़ निकाली। उसने उसकी तरफ़ नहीं देखा।

“तुम्हें पता है,” नीला ने कहा, “युग ख़त्म हो रहा है।”

“कौन-सा युग?”

उसने उसे ऐसे देखा जैसे उसने पूछा हो कौन-सा आसमान।

“पुराना वाला,” लड़के, सेंधन, ने मदद करते हुए कहा। “उसकी सैंतीस रातें बची हैं। फिर नया शुरू होगा। सबको पता है।” उसने पुरम के हाथ को देखा। “वो क्या है?”

पुरम ने नीचे देखा। वो अब भी अपना फ़ोन पकड़े था। स्क्रीन बुझ गई थी। उसने दबाया तो जल उठी, और घेरे का हर इंसान पीछे हटा, और सेंधन आगे आया।

“ये फ़ोन है,” पुरम ने कहा।

“ये क्या करता है?”

“अभी? कुछ नहीं। सिग्नल नहीं है। ये किसी को कॉल नहीं कर सकता। ये नहीं बता सकता कि हम कहाँ हैं। इसमें बस…”

वो रुक गया।

इसमें बस वो था जो उसने इसमें डाला था। नक़्शे। मैनुअल। चार सौ पीडीएफ़, क्योंकि पुरम सब कुछ डाउनलोड करता था, क्योंकि कभी पता नहीं होता। कांची इस पर हँसती थी। माइक्रोवेव का मैनुअल कौन पढ़ता है? वो पढ़ता था। और एक रात, दो साल पहले, पुणे के एक म्यूज़ियम वाली जॉब के बाद, उसने कुछ और भी डाउनलोड किया था, क्योंकि वो उसके बारे में बात करना बंद ही नहीं करती थी।

उसने फ़ाइलें खोलीं। स्क्रॉल किया। उसका अँगूठा थोड़ा काँप रहा था।

महाभारत। संपूर्ण। अंग्रेज़ी अनुवाद। 18 पर्व।

“पुरम?” कांची ने कहा।

उसने सोलहवाँ पर्व खोला और जगह ढूँढ़ी। वो पढ़ने लगा, एक ऐसे जंगल में खड़ा होकर जो किसी के इसे लिखने से पाँच हज़ार साल पहले का था, जबकि एक लड़का उसकी बाँह के ऊपर से चमकते अक्षर उल्टे पढ़ रहा था।

सड़कों पर चूहे भर गए और सोते हुए आदमियों के बाल और नाख़ून कुतरने लगे। बिना वजह घड़े चटकने लगे। सारस उल्लुओं की तरह रोने लगे।

“तुमने कितनी रातें कहा था?” उसने पूछा।

“सैंतीस,” सेंधन ने कहा।

पुरम ने नज़र उठाकर नीला को देखा। वो इंतज़ार कर रही थी। वो, उसने सोचा, बहुत लंबे समय से इंतज़ार कर रही थी, और उसे किसी चीज़ पर हैरानी नहीं थी।

“मुझे पता है ये कैसे ख़त्म होता है,” उसने कहा। उसकी आवाज़ अपनी जैसी नहीं लगी। “ये यहीं है मेरे पास। मुझे पता है ये कैसे ख़त्म होता है।”

“तो तुम बना सकते हो,” नीला ने कहा। “हमारे पास पाँच चीज़ें हैं जिन्हें बचाकर रखना है। पाँच गरम चीज़ें। जब युग पलटे, उन्हें ऐसी जगह होना चाहिए जहाँ कोई उन्हें न ढूँढ़े। जहाँ नया युग भी न ढूँढ़े। नया युग उन्हें चाहेगा, और उनके लायक़ नहीं होगा। हमें उनके लिए पाँच घर चाहिए। तुम उनका नक़्शा बनाओगे।”

“पाँच वॉल्ट।”

“अगर तुम्हारा शब्द यही है।”

“पाँच वॉल्ट, सैंतीस दिन में, किससे…” उसने भालों को देखा, सूती कपड़ों को, नंगे पैरों को। “किससे?”

नीला पहली बार मुस्कुराई। उसके ज़्यादातर दाँत जा चुके थे।

“हमसे,” उसने कहा। “और इससे।”

वो कांची को देख रही थी, जो खड़ी हो गई थी और जैकेट से पत्ते झाड़ रही थी और बूढ़ी औरत को ऐसे चेहरे से देख रही थी जो पुरम ने उस पर पहले कभी नहीं देखा था। जैसे किसी ने आख़िरकार उससे सही सवाल पूछ लिया हो।

फिर सेंधन का सिर झटके से मुड़ा। नीला का भी।

पुरम ने इसे एक पल बाद सुना, मेंढकों के नीचे: एक गहरी, बेतरतीब धमक, उत्तर से पेड़ों के बीच से आती हुई। तेज़ होती हुई।

खुर। बहुत सारे।

“सेनापति,” सेंधन ने कहा। उसका रोमांच जा चुका था। “वो भी शिल्पी को ढूँढ़ रहा है।”

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