जो किसी के लिए भी चले
3102 ईसा पूर्व · कांची · युग पलटने से 37 दिन पहले
रखवालों ने अपनी मशालें एक-एक करके कीचड़ में बुझा दीं, छस्स, छस्स, छस्स, और जंगल काला हो गया।
सेंधन ने कांची और पुरम को एक बहुत बड़े पेड़ की जड़ों के बीच के एक गड्ढे में खींच लिया। उसमें सड़न और गीली छाल की गंध थी। नीला अकेली खुली जगह में रुकी रही, एक पत्थर पर बैठी, अँधेरे में अपनी घास की रस्सी बटती हुई, जैसे बस का इंतज़ार कर रही हो।
“बनाओ,” सेंधन ने फुसफुसाकर कहा। उसने पुरम के हाथ में एक डंडी थमा दी।
“अभी?”
“उसने कहा था तुम घरों का नक़्शा बनाओगे। अभी बनाओ। कहीं सेनापति तुम्हें मार दे।”
“ये बड़ी व्यावहारिक बात है,” पुरम ने कमज़ोर आवाज़ में कहा।
“बनाओ,” कांची ने कहा। “तुम डरकर बेहतर सोचते हो।”
उसने बनाया। वो तारों की रोशनी में उसका हाथ देखती रही। एक चौकोर। चौकोर के अंदर एक चौकोर। अंदर जाती सीढ़ियाँ, बाएँ से गिनी हुई। बाईं तरफ़ एक दरवाज़ा जो कहीं नहीं जाता। ऊपर के कोने में एक छोटा-सा फूल, वैसा जैसा वो अपने हर प्लान पर बना देता था। उसने एक बार उससे पूछा था कि वो हमेशा फूल क्यों बनाता है। उसने कहा था, क्योंकि कोई कभी नहीं पूछता कि फूल किसलिए है।
सेंधन लकीरों को घूरता रहा, उन्हें रटता हुआ।
खुर खुली जगह में आ पहुँचे।
कांची ने बिना चाहे गिना। उन्नीस घोड़े, बीस। लंबे भालों वाले आदमी, पीठ पर धनुष। और सबसे आगे, एक सलेटी घोड़े पर, कवच पहने एक आदमी।
एक पल के लिए वो डरना भूल गई, क्योंकि वो कवच देख रही थी। कांसे की परतें, चमड़े पर कीलों से जड़ी, हर परत एक नाख़ून जितनी। उसने ऐसा कवच एक बार देखा था, टुकड़ों में, हरा, काँच के एक केस में जिसके कार्ड पर लिखा था दुर्लभ। ये हरा नहीं था। कंधे पर नए चमड़े के एक चौकोर से पैबंद लगा था, बुरी तरह सिला हुआ। इसे किसी ऐसे ने ठीक किया था जो नया नहीं ख़रीद सकता था।
आदमी बूढ़ा था। सफ़ेद दाढ़ी। उसका बायाँ कान बहुत पहले कटा था, और ऊबड़-खाबड़ भरा था।
“माई,” उसने नीला से कहा। उसकी आवाज़ थकी हुई और शिष्ट थी। “शिल्पी कहाँ है?”
“यहाँ कोई शिल्पी नहीं है,” नीला ने कहा। “बस मेंढक हैं।”
“लोग कहते हैं एक शिल्पी आ रहा है। लोग कहते हैं वो ऐसी रोशनी लेकर चलता है जिसे आग नहीं चाहिए।” बूढ़ा अपने घोड़े की गर्दन पर झुका। “जानती हो, माई, आज सुबह मेरे धनुष ने क्या किया? कुछ नहीं। मैंने उसे खींचा, और वो लकड़ी और डोरी था। सारी ज़िंदगी उसने मुझे जवाब दिया है। उसे जगाने वाले शब्द मेरे सिर से निकल गए हैं। मेरे आदमियों के हथियार भी ऐसे ही हैं।” उसने अँधेरी खुली जगह में चारों तरफ़ देखा। “मुझे कुछ ऐसा चाहिए जो अब भी जवाब दे।”
नीला ने अपनी रस्सी बटी।
“महावन,” उसने कहा, “घर जाओ।”
वो लगभग मुस्कुराया। “मेरा कोई घर नहीं। हम उस बड़े मैदान में हार गए थे। तुम जानती हो।” वो सीधा बैठ गया। “पेड़ों में ढूँढ़ो।”
सवार फैल गए। उनमें से एक सीधा उनके पेड़ की तरफ़ आया।
कांची ने पुरम को अपने बग़ल में अकड़ते महसूस किया। घोड़ा और पास आया। उसे उसकी गंध आ रही थी। उसे रकाब में सवार का पैर दिख रहा था, उसके चेहरे से एक हथेली भर दूर।
पुरम ने अपनी टॉर्च जला दी।
उसने उसे सीधा ऊपर, घोड़े की आँखों में किया, पूरी ताक़त पर। घोड़ा चीख़ा और पिछले पैरों पर खड़ा हो गया। सवार पीठ के बल पत्तों में जा गिरा। टॉर्च पुरम के हाथ से उड़ गई, घूमती हुई, पेड़ों को, आसमान को, पेड़ों को रोशन करती हुई, और खुली जगह के बीच में जा गिरी, अब भी जली हुई, कीचड़ में एक सफ़ेद गोला।
“भागो,” सेंधन ने कहा।
वो भागे। कांची के हाथों में एक भाले का डंडा था। उसे याद नहीं था कि उसने कब लिया। अँधेरे से एक सवार उनकी तरफ़ आया और उसने उसे नीचे घुमाया, घोड़े की टाँगों पर, ज़ोर से नहीं, बस उतना, और घोड़ा बिदका और सवार बग़ल में गिरा और वो पार निकल गए।
उनके पीछे, खुली जगह में, कोई पीछा नहीं कर रहा था।
वो पेड़ों के किनारे रुकी और पीछे देखा। वो ख़ुद को रोक नहीं पाई।
बूढ़ा सेनापति अपने घोड़े से उतर आया था। वो टॉर्च के ऊपर खड़ा था। वो धीरे से झुका, जैसे बूढ़े झुकते हैं, और उसे उठाया।
उसने उसे पलटा। अँगूठे से बटन ढूँढ़ा। रोशनी बुझ गई। उसका चेहरा अँधेरा हो गया। उसने फिर दबाया, और रोशनी सीधी उसके चेहरे पर जल उठी, और उसने पलक नहीं झपकाई। वो बस सफ़ेद रोशनी में खड़ा उसे घूरता रहा।
कांची ने वो नज़र पहले देखी थी। बिहार की खुदाई में एक मज़दूर को कीचड़ में सोने का एक दाना मिला था। उसने उसे ठीक ऐसे ही देखा था। जैसे भूख से मरता आदमी रोटी को देखता है।
“ये चलती है,” महावन ने किसी से नहीं कहा। “ये मेरे लिए चलती है।”
“कांची,” पुरम ने उसकी बाँह खींचते हुए कहा। “अभी।”
सेंधन उन्हें एक धारा तक ले आया। कांची ने तौलिए से डायल निकाला।
“सैंतीस रातें,” सेंधन ने कहा। “तुम वापस आओगे?”
“हम वापस आएँगे,” कांची ने कहा।
“आएँगे?” पुरम ने कहा।
उसने डायल पर हाथ रखा। एक सेकंड बाद, उसने भी।
2026 · कांचीपुरम, करघे वाला शेड · रात 11:48
करघे ख़ामोश थे। बारिश रुक चुकी थी। शेड अँधेरा था, बस एक बल्ब के सिवा, और बल्ब के नीचे, एक प्लास्टिक के स्टूल पर, अम्मा बैठी थीं, पैरों के पास फ़र्श पर कॉफ़ी के दो स्टील के टंबलर रखे।
“पाँच घंटे,” उन्होंने कहा। “आदमी एक घंटे बाद चले गए।”
कांची धम्म से फ़र्श पर बैठ गई। उसकी टाँगें काम नहीं कर रही थीं। पुरम शेड के बीचोबीच खड़ा था, बालों में पत्ते, मुँह खुला, और उसमें से कुछ नहीं निकल रहा था।
उसने एक टंबलर उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे। कॉफ़ी गरम थी। ज़ाहिर है।
“हमें वापस जाना है,” उसने कहा। “सैंतीस दिन। हमें चीज़ें चाहिए होंगी। ढंग के जूते। टेंट। बैटरियाँ। और एक वो… वो…” उसने हाथ से एक आकार बनाया। एक छोटा गोल डिब्बा। अंदर एक सुई। वो सुई जिसे हमेशा पता होता था कि उत्तर किधर है। उसे ठीक-ठीक पता था कि वो क्या है। उसे दिख रहा था। शब्द वहाँ नहीं था। बस एक चिकनी, कोरी जगह थी जहाँ उसे होना चाहिए था, जैसे म्यूज़ियम की शेल्फ़ जब चीज़ सफ़ाई के लिए गई हो।
“कंपास?” पुरम ने कहा।
“वही। कंपास।” उसने कॉफ़ी पी। “मैं थक गई हूँ।”
उसने उसे एक पल ज़्यादा देर देखा। फिर उसने अपनी हरी नोटबुक निकाली और फ़र्श पर बैठकर बनाने लगा। एक चौकोर। चौकोर के अंदर एक चौकोर। बाएँ से सीढ़ियाँ। एक दरवाज़ा जो कहीं नहीं जाता। कोने में एक छोटा फूल।
“मैंने उनके लिए ये बनाया था,” उसने कहा। “मिट्टी में। मुझे नहीं पता ये वॉल्ट है या मज़ाक।”
अम्मा ने अपनी कॉफ़ी नीचे रखी।
वो शेड के पीछे गईं, जहाँ उनके घर वाले जैसा एक स्टील का ट्रंक था, उसे खोला, और अख़बार की तीन परतों में लिपटी कोई चीज़ निकाली। जब उन्होंने उसे खोला, तो वो सबसे पुराना कपड़ा था जो कांची ने किसी म्यूज़ियम के बाहर देखा था। भूरा। भुरभुरा। बॉर्डर की बस एक पट्टी, एक हथेली से ज़्यादा चौड़ी नहीं।
उसमें, धूल के रंग के हो चुके धागे से, एक चौकोर बुना था। चौकोर के अंदर एक चौकोर। बाएँ से सीढ़ियाँ। एक दरवाज़ा जो कहीं नहीं जाता।
और ऊपर के कोने में, एक छोटा-सा फूल।
अम्मा ने उसे पुरम की नोटबुक के बग़ल में रख दिया। उन्होंने उसे देखा, बिना किसी कठोरता के।
“ये तुमने बनाया था,” उन्होंने कहा।
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