Chapter 1

एपिसोड 1: उधार का कैमरा

बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026

कैमरा उधार का था। गोपिना ने उसे दोनों हाथों से पेट से लगाकर पकड़ रखा था, पट्टा कलाई पर दो बार लपेटा हुआ — जैसे रशिका ने बताया था — और फ़ैक्ट्री के गेट के बाहर खड़ी थी, गार्ड का इंतज़ार कर रही थी कि वो नज़र उठाए।

फ़ोन बजा। मोहित।

“एक फ़ोटो,” उसने कहा। “एक लाइन। बारह बजे तक वापस। किसी से बात मत करना।”

“जी सर।”

“दोहरा कर बोल।”

“एक फ़ोटो। एक लाइन। बारह बजे तक वापस। किसी से बात नहीं करनी।”

“फ़ोटो में बैनर दिखना चाहिए। बैनर, वॉटर कूलर, और जो बाँट रहा हो वो। मोदी टाइल्स का लोगो फ़्रेम में आना चाहिए। बस इतना काम है।”

“जी सर।”

“गोपिना।”

“सर।”

“किसी से बात मत करना।”

उसने फ़ोन बैग में रखा और इंतज़ार किया। गार्ड ने उसका प्रेस कार्ड देखा, वो लैमिनेटेड वाला जिस पर हेराल्ड इतने बड़े फ़ॉन्ट में छपा था जैसे किसी को डर था कि कोई पढ़ नहीं पाएगा। उसने कार्ड को हाथ से दूर पकड़ा। चेहरे से फ़ोटो मिलाई। उसकी धूल भरी चप्पलें देखीं। अंदर जाने दिया।

कंपाउंड में टाइल की धूल और डीज़ल की गंध थी। सुबह की शिफ़्ट चल रही थी और दूसरी तरफ़ लोडिंग फ़्लोर गूँज रहा था — फ़ोर्कलिफ़्ट पीछे हो रहीं, आदमी एक-दूसरे को छोटी-छोटी आवाज़ों में बुला रहे। दो आवारा कुत्ते खड़े ट्रक के नीचे सो रहे थे। किसी ने ऑफ़िस के दरवाज़े पर गेंदे की ताज़ी मालाएँ लगा दी थीं — कार्यक्रम के लिए।

· · ·

बँटवारा लोडिंग बे और मुख्य ऑफ़िस के बीच के मैदान में लगाया गया था। तीन लंबी मेज़ें। प्लास्टिक में लिपटे वॉटर-कूलर के डिब्बे, ढेर लगा हुआ, हर एक पर मोदी टाइल्स का लोगो। एक विनाइल बैनर पर लिखा था — मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर — सामुदायिक सेवा पहल — और उस पर एक औरत की तस्वीर थी जिसे गोपिना ने कभी क़रीब से नहीं देखा था पर शहर की हर दीवार से पहचानती थी। कोमिला मोदी। तस्वीर कम से कम दस साल पुरानी थी। कोई बदलने वाला नहीं था।

मेज़ों के दूसरे सिरे पर औरतों की क़तार लगी थी। दस, बारह, धूप में। एक-एक करके आगे आतीं, एक रजिस्टर पर दस्तख़त करतीं, और मोदी टाइल्स की पोलो शर्ट पहने एक आदमी उन्हें एक डिब्बा पकड़ा देता। कोई उनसे बात नहीं करता। दस्तख़त करो, डिब्बा लो, चलो। एक औरत ने फ़िल्टर के बारे में पूछने की कोशिश की — उसे डिब्बे पर छपे हेल्पलाइन नंबर की तरफ़ इशारा कर दिया गया।

चेक शर्ट में एक आदमी सामने क्लिपबोर्ड और एक मुस्कान के साथ खड़ा था जो सुबह से चल रही थी। पीआर वाला। ज़िले के अख़बारों के दो फ़ोटोग्राफ़र पहले से वहाँ थे, वो जो बोल रहा था वो बिना ऊपर देखे लिख रहे थे।

“साठ इकाइयाँ बाँटी जा चुकी हैं,” पीआर वाले ने कहा। “बारह वार्ड्स कवर हो रहे हैं। श्रीमती मोदी का हमेशा से मानना रहा है कि स्वच्छ पानी एक स्वस्थ समुदाय की नींव है।”

एक फ़ोटोग्राफ़र ने गिनती दोहराने को कहा। उसने दोहराई। दूसरे ने योजना का नाम स्पेल करने को कहा। उसने किया। दोनों ने लिख लिया।

एक ने अपनी कॉपी दूसरे की तरफ़ झुकाई। “झज्जर वाली जैसी ही है?”

“शब्द-दर-शब्द। बस कूलर का ब्रांड बदला है।” वो अपनी कॉपी बंद कर ही रहा था।

गोपिना ने कैमरा उठाया। बैनर। कूलर। पीआर वाला। मोदी टाइल्स का लोगो दिख रहा था। उसने फ़ोटो खींची। दो और खींचीं क्योंकि पहली धुँधली हो सकती थी और रशिका ने कहा था हमेशा तीन खींचो।

दोपहर हो गई। धूप मैदान पर सपाट बैठी थी और मेज़ों के नीचे की छाँव पतली हो गई थी। लोडिंग बे के पास के मज़दूर बिना किसी के कुछ कहे कैंटीन की तरफ़ चल दिए। पीआर वाले ने घड़ी देखी और बोलता रहा।

“अगर परिवार से कोट चाहिए तो अंदर कोई है,” पीआर वाले ने ज़िले के फ़ोटोग्राफ़रों से कहा। “मैं सेट करा सकता हूँ।”

किसी को कोट नहीं चाहिए था। उनके पास काफ़ी था। गोपिना के पास भी काफ़ी था। एक फ़ोटो। एक लाइन। बैनर, कूलर, लोगो। वो जा सकती थी।

मेज़ों के पार, कूलर की क़तार के आगे, लोडिंग बे के दरवाज़े खुले थे। अंदर का फ़र्श दिख रहा था। ऊँचे लगे पैलेट, हवा में धूल, एक फ़ोर्कलिफ़्ट बिना किसी के खड़ी चलती हुई। रात की शिफ़्ट का बचा-खुचा, दिन वालों का इंतज़ार करता हुआ।

वो गेट की तरफ़ मुड़ रही थी जब उसने उस औरत को सुना।

चिल्ला नहीं रही थी। बोल भी नहीं रही थी, ठीक से। एक आवाज़ जो छाती में कहीं नीचे से आ रही थी, पतली और लगातार, वो आवाज़ जो कई दिनों से चलती रही हो और जिसके पीछे अब साँस नहीं बची। गेट का गार्ड हाथ ऊपर किए खड़ा था, हथेली सपाट। धक्का नहीं दे रहा था। रोक रहा था।

औरत छोटे क़द की थी, पतली, फ़ीका हरा सूट, दुपट्टा सिर पर आगे खींचा हुआ। उसने एक प्लास्टिक का फ़ोल्डर सीने से लगा रखा था। उसके पीछे सड़क ख़ाली थी। अकेली आई थी।

“प्लीज़,” औरत ने कहा। “बस पूछने दो। मुझे बस पूछना है।”

“बिना इजाज़त अंदर नहीं आ सकते,” गार्ड ने कहा। उसने ऐसे कहा जैसे कोई वो बात कहता है जो उस सुबह चालीस बार कह चुका हो और अब ख़ुद भी नहीं सुनता।

“मेरा बेटा यहाँ काम करता था। दीपक। लोडिंग फ़्लोर पर। प्लीज़। बस चेक कर लो।”

गोपिना के क़दम रुक गए।

बिमला। कुम्हार गली में तीन घर आगे। उसके बेटे ने गली की हर साइकिल ठीक की थी। चेन उतरी तो दीपक के दरवाज़े ले जाओ, वो ठीक कर देता, बिना पैसे, हाथ नाश्ते से पहले ही ग्रीस से काले। उन्नीस साल का। फ़ैक्ट्री में नौकरी लगी तो इतना ख़ुश था। आईडी कार्ड गले में डोरी से लटकाकर छुट्टी के दिन भी पहने रहता, बस ऐसे ही, कि गले में हो।

दो हफ़्ते पहले उसकी मौत हो गई थी। गली में सबको पता था। उसके घर का दरवाज़ा बंद रहता था।

“ये कहते हैं कि उसने यहाँ कभी काम ही नहीं किया,” बिमला ने कहा। वो गार्ड से बोल रही थी पर नज़र उसके पीछे मैदान पर थी, लोडिंग बे पर। “मैं ऑफ़िस गई। उन्होंने कहा कोई रिकॉर्ड नहीं है। कोई दीपक नहीं लिस्ट में। पर उसने यहाँ काम किया। उसने मुझे अपना कार्ड दिखाया था। वो तनख़्वाह घर लाता था। वो बताता था कि शुक्रवार को कैंटीन में क्या बनता है।”

गार्ड ने अपने जूतों के बीच की ज़मीन देखी।

“मैडम, मेरे पास कोई लिस्ट नहीं है। मेरे पास बस हिदायतें हैं।”

“तो किसी को बुलाओ जिसके पास लिस्ट हो।”

उसने जवाब नहीं दिया। बिमला वहीं खड़ी रही अपने प्लास्टिक के फ़ोल्डर और अपने ख़ामोश आँसुओं के साथ, और गार्ड अपनी हिदायतों के साथ, और कोई नहीं हिला।

गोपिना के बैग में फ़ोन बजने लगा। मोहित। एक फ़ोटो। एक लाइन। बारह बजे तक वापस।

उसने बजने दिया।

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