एपिसोड 2: सोमवार से शुक्रवार
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
गोपिना दस क़दम दूर खड़ी थी, कैमरा कलाई पर भारी। पट्टा वहाँ चुभ रहा था जहाँ उसने दो बार लपेटा था। उसे गेट से बाहर निकल जाना चाहिए। फ़ोटो मिल गई थी। लाइन मिल गई थी। वो पहले से लेट हो रही थी।
वो उसकी तरफ़ चली गई।
किसी से बात मत करना।
“बिमला आंटी।”
औरत ने उसे देखा। एक पल लगा। चेहरा अपने धुँधलके में से रास्ता ढूँढ रहा था, पहचान रहा था। कुम्हार गली। वर्मा घर की भतीजी। वो जो हमेशा कॉपियाँ उठाए रहती है।
“गोपिना?”
“क्या हुआ?”
बिमला ने हाथ के पीछे से चेहरा पोंछा। “ये कह रहे हैं कि वो यहाँ कभी था ही नहीं। मेरा दीपक। चार महीने इस फ़र्श पर काम किया। हर रात टाइल की धूल की बास लेकर आता था। और ये कह रहे हैं कि वो यहाँ कभी था ही नहीं।”
गोपिना ने प्लास्टिक के फ़ोल्डर को देखा। पारदर्शी कवर से एक लैमिनेटेड कार्ड दिख रहा था। एक लड़का, चौड़ी मुस्कान, बाल फ़ोटो के लिए चिपकाकर सँवारे हुए। नीचे, छोटे अक्षरों में: लोडिंग — यूनिट 3 (लाइन B)।
“ये किसी को अंदर दिखाया?”
“ऑफ़िस के बाबू को। उसने ठीक से देखा तक नहीं।” बिमला ने फ़ोल्डर को दो उँगलियों से शरीर से दूर पकड़कर दिखाया — जैसे उस बाबू ने पकड़ा था। “ऐसे। जैसे कूड़े की कोई चीज़ हो।”
गोपिना ने गार्ड की तरफ़ देखा। गार्ड ने दीवार की तरफ़ देखा।
वो मुड़ी और मैदान पार करके वापस गई।
पीआर वाला सामान समेट रहा था। क्लिपबोर्ड बग़ल में दबाया। ज़िले के फ़ोटोग्राफ़र जा चुके थे। उसकी मुस्कान अभी भी चालू थी, छोटा वर्शन, वो जो इवेंट्स के बीच बनाए रखते हैं कि कोई देख ले तो ठीक रहे।
“सर, गेट पर एक औरत है। उसका बेटा लोडिंग लाइन पर काम करता था, यूनिट 3। दो हफ़्ते पहले उसकी मौत हो गई। वो कह रही है कि कंपनी के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है।”
मुस्कान चेहरे पर रही। पर आँखें किसी सावधान जगह चली गईं।
“किस अख़बार से हो?”
“हेराल्ड।”
“लोकल वाला।”
“जी सर।”
उसने एक पल उसे देखा। फिर शर्ट की जेब से पेन निकाला और दो बार क्लिक किया, धीरे।
“कोई छोटी-सी ग़लती होगी,” गोपिना ने कहा। “अगर कोई बस रजिस्टर चेक कर ले।”
“एम्प्लॉयमेंट संबंधी पूछताछ का हमारा एक प्रोसेस है,” पीआर वाले ने कहा। “वो मुख्य ऑफ़िस में लिखित अनुरोध दे सकती हैं। सोमवार से शुक्रवार, दस से चार।”
“वो अभी यहीं हैं।”
“सोमवार से शुक्रवार।” उसने पेन फिर क्लिक किया। “दस से चार।” मुस्कान वापस आई। पूरी। “और कुछ चाहिए आपके अख़बार के लिए?”
गोपिना वहीं खड़ी रही। उसके पास दो और सवाल थे और पूछने की जगह ख़त्म। मैदान ख़ाली हो रहा था। कूलर ले जाने वाली औरतें जा चुकी थीं। ऑफ़िस के दरवाज़े पर गेंदे की मालाएँ गर्मी में मुरझा गई थीं। कहीं लोडिंग बे के अंदर से फ़ोर्कलिफ़्ट फिर चालू हुई।
“नहीं,” उसने कहा। “शुक्रिया।”
बिमला अभी भी गेट पर थी।
“उन्होंने कहा कि आप मुख्य ऑफ़िस में लिखित अनुरोध दे सकती हैं,” गोपिना ने कहा। “सोमवार से शुक्रवार।”
बिमला ने सिर हिलाया। उसने ये पहले सुना था। उस औरत का सिर हिलाना जिसे इतनी बार अगली खिड़की भेजा गया है कि अब उसे यक़ीन नहीं रहा कि कोई आख़िरी खिड़की भी होती है।
“मैं सोमवार को आपके साथ चलूँगी,” गोपिना ने कहा। “अगर आप चाहें।”
बिमला ने शुक्रिया नहीं कहा। कुछ नहीं कहा। बस प्लास्टिक का फ़ोल्डर बंद किया और सीने से वापस लगा लिया।
एक आदमी साइड गेट से आया। जवान, ऑफ़िस के कपड़े, आस्तीनें कोहनी तक चढ़ी हुईं। उसने गोपिना की तरफ़ नहीं देखा। सीधा उस बाड़ तक गया जहाँ बिमला खड़ी थी, सलाखों के बीच से पानी की एक बोतल बढ़ाई, और तब तक पकड़े रहा जब तक उसने ले नहीं ली। फिर मुड़ा और वापस अंदर चला गया। न तेज़, न धीरे। पीछे मुड़कर नहीं देखा।
बिमला ने एक हाथ में बोतल पकड़ी और दूसरे में फ़ोल्डर, और दोपहर की धूप में गेट पर खड़ी रही।
गोपिना ने फ़ोन देखा। बारह बजकर अठारह। लेट थी। मोहित फ़ोटो और लाइन माँगेगा, और बाक़ी का उसे जवाब देना होगा। फ़ोटो तो थी। लाइन भी थी।
उसने एक बार और पीछे देखा। बिमला हिली नहीं थी। फ़ोल्डर सीने पर सपाट, पानी हाथ में गर्म होता हुआ, सलाखों के पीछे वो लोडिंग बे जहाँ उसके बेटे ने काम किया था।
गोपिना गेट से बाहर निकली और सड़क की तरफ़ मुड़ी। वो चौदह मिनट लेट थी और उसने किसी से बात कर ली थी।