एपिसोड 3: रोटी का ढेर
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
रोटी के ढेर का एक हिसाब था।
सुषमा ने पहली रोटी तौलिये से उठाई — गरम, फूली हुई, बीच में मक्खन पिघल रहा — और रशिका की थाली में रख दी। दूसरी मामा जी को, जिन्होंने फ़ोन से नज़र उठाए बिना उठा ली। तीसरी उन्होंने ख़ुद आधी तोड़ी, काउंटर पर खड़ी-खड़ी, जैसे अपनी शादी के दिन से खाती आ रही थीं। आख़िरी वाली, किनारों से अकड़ी हुई जहाँ तवा ठंडा हो गया था, गोपिना को गई।
कोई इस पर बात नहीं करता था। घर का एक क्रम था, जैसे नाली का एक रुख़ होता है, और गोपिना उसके सबसे नीचे थी जब से वो नौ साल की थी।
“बड़ी ख़बर,” मामा जी बोले। उन्होंने फ़ोन इस गंभीरता से रखा जैसे जंग की घोषणा करने वाले हैं।
सुषमा ने नज़र नहीं उठाई। “अगर अखाड़े की बात है —”
“बाबा रामजी ने सुबह का स्लॉट बदल दिया है। साढ़े छह से सवा सात।” रुके, इफ़ेक्ट के लिए। “पैंतालीस मिनट। पहले सिर्फ़ पैंतीस थे। रोज़ दस मिनट ज़्यादा ट्रेनिंग। एक साल में बनता है —”
हिसाब ने हरा दिया।
“साठ घंटे,” रशिका ने कहा। बिना दिलचस्पी।
“साठ घंटे! देखा? यही तो लोग नहीं समझते बाबा रामजी के बारे में। आदमी दूर की सोचता है।”
सुषमा ने दाल की कटोरी इतने ज़ोर से रखी कि चम्मच खनक उठे। “बाबा रामजी दो सौ रुपये महीना लेते हैं अधेड़ आदमियों से कि वो मिट्टी में लोटें और भैंसों जैसी महक लेकर घर आएँ। उनकी दूर की सोच बस इतनी है।”
मामा जी का चेहरा कई तरह के ऐतराज़ों से गुज़रा और चुप्पी पर आकर ठहरा। रोटी तोड़ी, दाल में डुबोई।
गोपिना ने अपनी रोटी खाई। ठंडी थी, पर उसने ध्यान से चबाई, बिना शिकायत, मेज़ पर जितनी कम जगह ले सकती थी उतनी लेती हुई।
· · ·
खाने के बाद, आँगन। दीवारों में दोपहर की गर्मी अभी बाक़ी थी — दो से चार की कटौती ने घर को भट्टे की तरह पकाया था, और बिजली आने पर भी पंखा बस गर्म हवा गोल-गोल घुमा रहा था।
“बैठ,” सुषमा ने रशिका से कहा, और वॉटर कूलर के पीछे से तेल की बोतल निकाली। गुरुवार। तेल का दिन।
रशिका ज़मीन पर बैठी और फ़ोन निकाला। गोपिना दो फ़ुट दूर सीढ़ी पर बैठ गई, कपड़े तह कर रही थी जो किसी ने माँगे नहीं थे।
“अब,” सुषमा बोलीं, रशिका के बालों में तेल लगाती हुईं उस ध्यान से जैसे कोई बंद नाली खोल रही हो। “अनिल का लड़का।”
“ना,” रशिका बोली।
“पूरी बात तो सुन।”
“पिछले गुरुवार को ना बोल चुकी हूँ।”
“पिछले गुरुवार दूसरा लड़का था। ध्यान रख।” बालों की लट अलग की, खींची। “अनिल का लड़का। सरकारी क्लर्क। क्लास टू। गज़ेटेड। छब्बीस साल। गोरा। शराब नहीं पीता — कम से कम उसकी माँ कहती है नहीं पीता, जो कि शादी होने तक एक ही बात है।”
“क्या मानक है।”
“चुप रह और सुन। तनख़ाह: बयालीस हज़ार। स्कूटर: अपना। घर: जॉइंट फ़ैमिली, पाँच लोग, सँभल जाएगा। माँ, बस —” हाथ रुक गए बीच में। “माँ पूरा कैबिनेट माँगती है। सोना। ऊपर से नीचे तक। आधा नहीं, पौना नहीं। पूरा। जैसे हम स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा चला रहे हैं।”
तेल फिर लगाने लगीं। “तो। ना।”
रशिका चुप रही। उसने सालों पहले सीख लिया था कि लड़के वालों की समीक्षा बातचीत नहीं होती। पाठ होता है। उसका काम था चुपचाप बैठना और दर्शक बनना।
“फिर शर्मा का भतीजा है, रोहतक से। रेवेन्यू क्लर्क। मोटरसाइकल है, स्कूटर नहीं — जो कि कुछ तो है। पर घर वाले Bolero माँगते हैं।”
“Bolero.”
“सेटलमेंट में। पूरी Bolero। सफ़ेद। नया मॉडल।” उन्होंने सिर वैसे हिलाया जैसे कोई ख़राब महीने में प्याज़ का भाव सुनकर हिलाता है। “रेवेन्यू क्लर्क के लिए। मैंने सीमा को बोला किटी में — सीमा, Bolero के लिए मुझे कम से कम डिप्टी कलेक्टर चाहिए। कम से कम। वो भी मानी।”
“पूरी किटी मानी?”
“सर्वसम्मति से।”
“तो सच ही होगा।”
“मुझसे होशियारी मत कर।” बालों की एक लट ज़रूरत से ज़्यादा खींची। रशिका सिसकी। “तुझे लगता है रिश्ते आसमान से गिरते हैं? हर गुरुवार मैं बैठती हूँ इन औरतों के साथ और सुनती हूँ, और गिनती करती हूँ, और हिसाब लगाती हूँ ताकि तुझे न लगाना पड़े। तुझे पता है इस शहर में अभी अच्छे रिश्ते का क्या रेट चल रहा है? तू जानना ही नहीं चाहेगी।”
मामा जी आँगन के दरवाज़े पर बनियान में प्रकट हुए, पानी का गिलास हाथ में ऐसे पकड़े जैसे बड़ी मेहनत से कमाया हो। “प्रेम नाथ का लड़का? वो जो गुरुग्राम के कॉल सेंटर में है?”
सुषमा ने उन्हें ऐसे देखा जैसे कोई प्रिंसिपल उस बच्चे को देखती है जो ग़लत एग्ज़ाम हॉल में आ गया हो।
“प्रेम नाथ का लड़का,” उन्होंने कहा, “दीवाली के मेले में नशे में धुत्त होकर कम्युनिटी तालाब में गिरा था। पूरी कॉलोनी के सामने। तू चाहता है मैं अपनी बेटी उस घर भेजूँ?”
“उसे धक्का दिया गया था,” मामा जी ने कहा। पर वो दरवाज़े से पीछे हट रहे थे।
गोपिना के होंठ हिले। कपड़े तह करती रही।
“क्या मुस्कुरा रही है?” सुषमा बोलीं, बिना पीछे मुड़े। औरत की उँगलियों में आँखें थीं। “तुझे लगता है ये मज़ाक़ है? एक दिन तेरे लिए भी यही करना पड़ेगा, और बता दूँ — तेरी लिस्ट छोटी है।”
मुस्कान गई।
“इसलिए नहीं कि तुझमें कोई कमी है,” सुषमा ने जोड़ा, एक पल बाद, तेल लगाती रहीं, गोपिना की तरफ़ देखा नहीं। “शक्ल ठीक है तेरी। खाना — चलो ख़ैर। खाने की बात नहीं करते। पर कार्ड पर बाप का नाम नहीं है। ज़मीन नहीं। भाई नहीं जो गेट पर खड़ा हो जब लड़के वाले आएँ। ये सब मायने रखता है। मैंने नियम नहीं बनाए। बस गिनती मुझे करनी पड़ती है।”
आँगन शांत। सुषमा के हाथ रशिका के बालों में। गली के ट्रांसफ़ॉर्मर के नीचे कुत्ता, बिना वजह भौंकता हुआ।
तीन घर आगे, गुप्ता परिवार ने पूरी बिजली कटौती इनवर्टर पर बिताई थी — पंखे चालू, टीवी चालू, पर्दे बंद — जबकि बाक़ी गली अँधेरे में बैठकर पसीना पोंछ रही थी। पैंतीस हज़ार का इनवर्टर। सुषमा को दाम पता था जैसे उन्हें इस शहर की हर चीज़ का दाम पता था। उनके पास पैंतीस हज़ार नहीं थे। वो गुप्ता के इनवर्टर की बात नहीं करती थीं। हर वक़्त करती थीं।