Chapter 4

एपिसोड 4: ग़लत पाला

बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026

“मामी।”

“क्या।”

“आज फ़ैक्ट्री के गेट पर। कुम्हार गली की एक औरत थी —”

“मुझे पता है उस औरत के बारे में।” सुषमा के हाथ रशिका की खोपड़ी पर रुके। “वो लड़का जो लोडिंग लाइन पर मरा। किटी में सुना, तेरे घर आने से पहले।”

गोपिना आगे झुकी। “तो आपको पता है कि वो कह रहे हैं उसने कभी वहाँ काम नहीं किया। पर उसने किया। उसके पास गेट कार्ड था —”

“मुझे गेट कार्ड के बारे में नहीं सुनना।” सुषमा ने रशिका का सिर सीधा किया। “मुझे ये जानना है कि मेरी भतीजी — जिसे मैंने ग्यारह साल खिलाया-पिलाया और इस छत के नीचे रखा — मोदी टाइल्स के गेट पर खड़ी होकर वो सवाल पूछ रही है जो तनख़ाह वाले पूरे रिपोर्टर नहीं पूछ रहे।”

“ये मेरा असाइनमेंट था। मोहित सर ने मुझे भेजा था —”

“मोहित ने तुझे एक फ़ोटो के लिए भेजा था। एक फ़ोटो।”

सुषमा ने तेल की बोतल रखी और हाउसकोट से हाथ पोंछे, कपड़े पर काली धारियाँ।

“सुन। एक बार बोलूँगी।”

वो गोपिना की तरफ़ मुड़ीं। हाथ घुटनों पर सपाट।

“तेरी उम्र बीस साल है। डिग्री अभी नहीं। बचत नहीं। बाप नहीं। एक चीज़ है तेरे पास — इस शहर में तेरा नाम किसी झंझट से नहीं जुड़ा। किसी से नहीं। ये सोने से ज़्यादा क़ीमती है, सरकारी नौकरी से ज़्यादा, किसी भी चीज़ से ज़्यादा जो मैं शादी के कार्ड पर लिख सकती हूँ। उस औरत के लिए मत फेंक जिसकी तू मदद नहीं कर सकती।”

“वो हमारी पड़ोसन है।”

“वो हमारी पड़ोसन है जिसका बेटा मर गया और जिसकी लड़ाई उस फ़ैक्ट्री से है जो आधे ज़िले को रोज़गार देती है। तू उस लड़की बनना चाहती है जो ये लड़ाई लड़े? फिर कौन करेगा तुझसे शादी? बता। एक नाम दे। इस शहर का एक ख़ानदान बता जो उस लड़की के लिए रिश्ता भेजेगा जिसका चेहरा मोदी टाइल्स के ग़लत पाले में दिखा हो।”

वो चिल्ला नहीं रही थीं। सुषमा कभी नहीं चिल्लातीं। उनके हाथ ने गोपिना की कलाई पकड़ ली थी बिना किसी के तय किए, और बहुत ज़ोर से पकड़ रखी थी।

गोपिना ने हाथ नहीं खींचा। वो हिसाब जानती थी। पूछने से पहले से जानती थी।

“अच्छा,” सुषमा बोलीं। तेल की बोतल फिर उठाई। “अब जा किचन की नाली देख। फिर बंद हो गई है।”

· · ·

गोपिना ने मोहित को रात नौ बजे फ़ोन किया, किचन के पीछे वाले स्टोररूम से। आटे की बोरी पर बैठी, फ़ोन कान से लगाया, दरवाज़ा बंद किया।

“सर। सुबह वाली औरत — बिमला। उसका बेटा दीपक लोडिंग लाइन पर था, यूनिट 3, लाइन B। उन्नीस साल का था। उसके पास गेट कार्ड था। अगर अख़बार में बस दो लाइन छप जाएँ कि उसने वहाँ काम किया —”

“गोपिना।” मोहित की आवाज़ थकी हुई थी। बुरी नहीं। बत्तीस पन्ने भरने वाले और एक विज्ञापनदाता सँभालने वाले आदमी की आवाज़। “इस हफ़्ते जगह नहीं है।”

“दो लाइन, सर। पूरी ख़बर भी नहीं। बस एक तथ्य।”

“सुन लिया। जगह नहीं।”

ख़ामोशी। स्टोररूम के दरवाज़े के पार, मामा जी एक क्रिकेट मैच की कमेंट्री कर रहे थे जो घर में कोई और नहीं देख रहा था।

“अगले हफ़्ते?” उसने कहा।

“देखते हैं।”

दोनों जानते थे इसका मतलब क्या है।

वो फ़ोन रखने के बाद आटे की बोरी पर बैठी रही। फ़ोन अँधेरा, गोद में। दीवार के पीछे नाली की घुर-घुर, जो इस घर में और कोई ठीक करने वाला नहीं था।

· · ·

स्टोररूम का दरवाज़ा खुला। रशिका, बालों में अभी तेल, एक हाथ में फ़ोन।

“मैंने सुन लिया,” उसने कहा।

गोपिना ने ऊपर देखा।

“इस घर की दीवारें काग़ज़ की हैं। सबने सुना।” रशिका दरवाज़े के फ़्रेम से टिकी, बाँहें बाँधीं। “मोहित नहीं छापेगा। तू जानती है।”

“उन्होंने कहा अगले हफ़्ते।”

“उन्होंने कहा ‘देखते हैं।’ मोहित की भाषा में इसका मतलब है रात नौ बजे फ़ोन करना बंद कर।” वो एक पल चुप रही। वो ख़ामोशी जो रशिका पर आती है जब वो कुछ बोलने वाली होती है जो अभी तय नहीं किया है।

“मैं मलिक से बात करूँगी,” उसने कहा। “वो मेरा उधार है। ड्रेनेज वाली ख़बर — जिस पर उसने अपना नाम लगाया — वो मेरी थी। अगर पीछे के पन्नों में कहीं जगह है, उसे पता होगा।”

गोपिना ने मुँह खोला।

“मत।” रशिका ने हाथ उठाया। “शुक्रिया मत बोल। मैं ये तेरी बिमला के लिए नहीं कर रही। मैं इसलिए कर रही हूँ क्योंकि मलिक ने मेरी बाईलाइन चुराई और उसे एक और एहसान में फँसाना काम का है। बस यही वजह है।” वो दरवाज़े से हटी। “और उम्मीद मत लगा।”

वो गई। सीढ़ियों पर उसके क़दम, और फिर नीचे से सुषमा की आवाज़ — स्टोररूम की बत्ती किसने जलाकर छोड़ी, इस घर में किसी को ज़रा सा भी अंदाज़ा है बिजली का बिल कैसा आता है, और वो नाली किसी ने देखी या सब कुछ उन्हीं को करना है।

गोपिना उठी। फ़ोन जेब में रखा। नाली खोलने गई।

शहर के उस पार से, फ़ैक्ट्री की सीटी। दस बजे। शिफ़्ट बदली।

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