Chapter 5

एपिसोड 5: टेढ़ा फ़्रेम

बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026

प्रिंटर मंगलवार सुबह नौ बजकर चौदह मिनट पर जाम हुआ, यानी प्रिंटर वक़्त पर जाम हुआ।

गोपिना ने ट्रे खींची, रोलर में फँसी काग़ज़ की गर्म अकॉर्डियन निकाली, और बाईं तरफ़ झुकाया जैसे मलिक ने पहले हफ़्ते सिखाया था। रोलर पकड़ा और चला। निकलने वाले पन्ने पर: एक वार्ड पार्षद का पौधारोपण अभियान, शब्द-दर-शब्द जैसा पार्षद के दफ़्तर ने भेजा था, ऊपर मलिक का नाम। हेराल्ड पेज चार ऐसे ही भरता था।

हेराल्ड आर्य नगर की मुख्य सड़क पर एक फ़ोटोकॉपी की दुकान के ऊपर दो कमरों में चलता था। अगला कमरा: चार डेस्क, जिनमें से तीन बराबर थीं, और प्रिंटर। पिछला कमरा: मोहित का ऑफ़िस। एक लोहे की मेज़, टायर कंपनी का कैलेंडर, और कुर्सी के पीछे दीवार पर एक फ़्रेम की हुई तस्वीर। मोहित, कोमिला मोदी से हाथ मिलाते हुए, किसी रिबन-कटिंग पर, कोई दस साल पहले। काँच पर धूल जमी थी। फ़्रेम टेढ़ा था। किसी ने कभी सीधा नहीं किया। किसी ने कभी ज़िक्र नहीं किया।

चार लोग ये अख़बार बनाते थे। मोहित, जो इसका मालिक भी था और एडिटर भी और कुछ सुबह ख़ुद कॉपियाँ डिस्ट्रीब्यूशन पॉइंट तक ले जाता था क्योंकि डिलीवरी का लड़का बुधवार को आना बंद कर चुका था। मलिक, जो गोपिना के पैदा होने से पहले से सीनियर रिपोर्टर थे और दिन भर दूसरों की प्रेस रिलीज़ टाइप करने में ऐसी लगन दिखाते थे जिस पर सवाल करने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी। रशिका, जो इस इमारत में अकेली इंसान थी जिसमें असल ख़बर की सूझ थी, इसीलिए अकेली वो थी जिसे बार-बार कहा जाता था कि इस्तेमाल मत कर। और गोपिना। बिना तनख़ाह इंटर्न, BCA की प्रैक्टिकल ज़रूरत, फ़ोन उठाने वाली, प्रिंटर ठीक करने वाली, फ़ाइल-क्लर्क, और उधार के कैमरे से कभी-कभार फ़ोटोग्राफ़र। खाना वो अपना लाती थी क्योंकि सुषमा बाँध देती थीं। हेराल्ड खाना नहीं देता था। हेराल्ड ज़्यादातर चीज़ें नहीं देता था।

बही मोहित की मेज़ पर खुली पड़ी थी। अगले कमरे से थोड़ा दाईं तरफ़ झुककर दिख जाती थी। लाल स्याही काली से ज़्यादा। दोनों के बीच का फ़ासला गोपिना के आने से पहले से ग़लत दिशा में बढ़ रहा था, और कोई इसकी बात नहीं करता था, उसी वजह से जिससे कोई उस तस्वीर की बात नहीं करता था।

दो बजे बिजली गई।

रशिका की स्क्रीन लेआउट के बीच में मरी। ऊपर की ट्यूबलाइट झपकी और बुझ गई। छत का पंखा धीरे-धीरे घूमता रहा और फिर बस लटक गया।

“जेनरेटर,” मोहित ने कहा, अपने दरवाज़े से।

गोपिना पीछे की सीढ़ियों पर गई। जेनरेटर लैंडिंग पर रखा था, नीचे फ़ोटोकॉपी वालों के साथ साझा, इमारत में मलिक के बाद सबसे पुराना। रस्सी खींची। कुछ नहीं। फिर खींची। इंजन घूमा और बंद। तीसरी बार। पकड़ा और चला।

प्रिंटर फिर गुनगुनाया। पंखे नहीं चले।

दो से चार का यही रोज़ का इंतज़ाम था: जेनरेटर प्रिंटर चलाता था, जिसे बदलने में असल पैसा लगता, और बाक़ी कुछ नहीं, जिसमें नहीं लगता। तो दो घंटे हर दोपहर कमरा तंदूर बन जाता, और चारों उसमें काम करते क्योंकि दूसरा रास्ता था काम बंद करना, जो अख़बार न निकालने जैसा था, जो घर चले जाने जैसा था।

दस मिनट में मलिक की शर्ट पीठ पर भीग गई। रशिका ने बिना रुके बाल ऊपर बाँधे। मोहित अपने दरवाज़े पर खड़ा रहा क्योंकि उसका ऑफ़िस, छोटा और बिना खिड़की, और भी बुरा था। गोपिना को पसीना वहाँ जम रहा था जहाँ कलाइयाँ कीबोर्ड से मिलती थीं।

“पेज पाँच अभी ख़ाली है,” रशिका बोली। “मेडिकल स्टोर ने कन्फ़र्म नहीं किया।”

“फिर फ़ोन कर।”

“तीन बार कर चुकी हूँ।”

“चौथी बार कर।”

“वो ऐड नहीं देंगे, सर। उन्होंने कहा शायद अगले महीने। मार्च से कह रहे हैं शायद अगले महीने।”

मोहित ने छत की तरफ़ देखा जहाँ पंखा नहीं चल रहा था।

“तो पेज पाँच पर मोदी टाइल्स का हाफ़-पेज लगा दे और सिनेमा की लिस्टिंग नीचे कर।”

“सिनेमा की लिस्टिंग ही एक चीज़ है जो लोग असल में पढ़ते हैं।”

“नीचे कर।”

उसने नीचे कर दी। कुछ देर कमरे में बस टाइपिंग थी और गर्मी। गोपिना की स्क्रीन पर प्रोग्रेस बार रुक-रुककर, आधे-आधे सेंटीमीटर खिसक रहा था। पसीने की एक बूँद ठोड़ी से स्पेसबार पर गिरी।

मलिक बिना कुछ कहे उठे, नीचे फ़ोटोकॉपी की दुकान पर गए, और एक ठंडे पानी का पाउच लेकर आए। गर्दन के पीछे लगाया और बैठ गए। किसी और के लिए लाने की पेशकश नहीं की।

रशिका, लेआउट पर आँखें सिकोड़कर: “पेज तीन की फ़ोटो। पार्षद रिबन उल्टी तरफ़ से काट रहा है।”

“वो लेफ़्ट-हैंडेड है,” गोपिना बोली।

“वो लेफ़्ट-हैंडेड नहीं है। मैं वहाँ थी।”

“तो फिर क्यों —”

“क्योंकि मलिक ने फ़ोटो पलट दी।” वो कुर्सी पर मुड़ी। “मलिक। आपने फ़ोटो पलट दी।”

“बाईं तरफ़ से अच्छी लगती है,” मलिक बोले। पीछे नहीं मुड़े।

“ये झूठ है।”

“ये मिरर इमेज है। अलग बात।”

“अलग बात नहीं है।”

मलिक ने पानी का पाउच गर्दन पर और ज़ोर से दबाया। “ख़बर कहती है उसने पेड़ लगाए। उसने पेड़ लगाए। फ़ोटो जिधर मर्ज़ी मुँह कर ले।”

रशिका ने एक आवाज़ निकाली जो पूरा शब्द नहीं थी और स्क्रीन पर लौट गई। गोपिना ने पेज तीन का क्रॉप फ़ोटो पलटे बिना पूरा किया और प्रिंटर से प्रूफ़ निकाला।

फ़ैक्ट्री की सीटी अभी नहीं बजी थी। शिफ़्ट बदलने में एक घंटा बाक़ी। गर्मी कमरे पर वैसे दबी थी जैसे हथेली मेज़ पर सपाट दबी हो।

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