एपिसोड 6: एक विज्ञापनदाता
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
गोपिना ने इंतज़ार किया।
उसने इंतज़ार किया जब तक फ़ोटो वाला बहस ख़ुद न मर गया, और जब तक मोहित अपने ऑफ़िस में लौटकर एक फ़ोन कॉल नहीं कर चुका जो सुनाई देती थी पर समझ नहीं आती थी, और जब तक मलिक ने पानी का पाउच ख़त्म करके ख़ाली प्लास्टिक अपनी डेस्क पर नहीं रख दिया जहाँ वो गर्मी में धीरे-धीरे फूल रहा था।
फिर उसने कहा।
“सर। मैं एक ख़बर की बात करना चाहती हूँ।”
मोहित दरवाज़े पर आया। मलिक की टाइपिंग धीमी हुई पर रुकी नहीं। रशिका ने लेआउट से नज़र उठाई।
“बोलो,” मोहित ने कहा।
“मोदी टाइल्स में दो हफ़्ते पहले एक मज़दूर मरा। नाम दीपक। उन्नीस साल। लाइन B पर लोडर, यूनिट 3।” उसकी आवाज़ एक जैसी रही। शांत होने का नाटक नहीं। वो ऐसे ही बोलती थी। “उसके मरने के बाद कंपनी में किसी ने उसकी माँ से कहा कि उसने कभी वहाँ काम नहीं किया। वो फ़्रंट ऑफ़िस गई। वही बात। उसके पास कंपनी कार्ड है। कार्ड उसके पास है और वो कह रहे हैं वो कभी था ही नहीं।”
प्रिंटर गुनगुनाता रहा। कोई नहीं बोला।
“वो मेरी पड़ोसन है। बिमला। कुम्हार गली में हमसे तीन घर। वो फ़ैक्ट्री के गेट पर गई और उन्होंने लौटा दिया। मैं वहीं खड़ी थी।”
मलिक ने ख़ाली पाउच रखा और तह किया।
“बच्ची,” वो बोले। “तुझे पता है इस बिल्डिंग का ख़र्चा कहाँ से चलता है?”
गोपिना ने उनकी तरफ़ देखा।
“पेज पाँच। फ़ुल-पेज ऐड। मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर। महीने में दो बार। वो ऐड है इसलिए आज सुबह कटौती से पहले बत्ती जल रही थी। वो ऐड है इसलिए प्रिंटर में टोनर है जिसे तू हर मंगलवार ठीक करती है।” वो नाराज़ नहीं थे। बुरे नहीं थे। एक आदमी थे जो चौदह साल से इस कमरे में था और जानता था दीवारें किस चीज़ की बनी हैं। “उस हाथ को काटना है तो काट। पर इस मुँह से नहीं। ये मुँह उसी हाथ से खाता है।”
रशिका अपनी कुर्सी पर सीधी हुई।
“दो लाइन हैं,” उसने कहा। “एक तथ्य की पुष्टि। आरोप नहीं। एक मज़दूर का परिवार कहता है नौकरी के रिकॉर्ड में गड़बड़ है। बस। दो लाइन। वो चाहें तो जवाब दें, न दें।”
मोहित दरवाज़े से हिला नहीं था। बाँहें बँधी हुईं। पीछे, अँधेरे ऑफ़िस में, दीवार पर तस्वीर आधी दिख रही थी। मोहित और कोमिला, रिबन-कटिंग पर। धूल भरा काँच। टेढ़ा फ़्रेम जो किसी ने सीधा नहीं किया।
“दो लाइन,” मोहित बोला। आवाज़ धीमी। “दो लाइन से शुरू होता है। पहले दो लाइन तथ्य की पुष्टि। फिर कोई सवाल पूछता है। फिर फ़ॉलो-अप क्योंकि सवाल का जवाब नहीं आया। फिर कोई बड़ा आदमी बेचैन होता है। फिर सिविल लाइन्स रोड से फ़ोन आता है। फिर ऐड कटता है। फिर अख़बार नहीं रहता।”
उसने गोपिना को देखा। नापसंदगी से नहीं। उस आदमी के चेहरे से जिसने हिसाब लगा लिया है और कोई और जवाब नहीं निकलता।
“इस अख़बार में चार लोग हैं और एक विज्ञापनदाता,” उसने कहा। “एक। छोड़ दे।”
वो अपने ऑफ़िस में लौट गया। दरवाज़ा खुला रहा क्योंकि बिना पंखे का कमरा बंद दरवाज़े से और भी नहीं सहा जाता, तो कोई ज़ोर से बंद होने की आवाज़ नहीं आई, कोई विराम चिह्न नहीं मिला बात के आख़िर में। बस मोहित अपनी मेज़ पर बैठा, सामने लाल स्याही वाली बही, हथेलियों से आँखें मल रहा था।
मलिक अपनी स्क्रीन की तरफ़ मुड़े। रशिका अपनी। प्रिंटर गुनगुनाता रहा। जेनरेटर एक बार खाँसा और सँभला।
गोपिना लेआउट पर लौटी। पेज पाँच पर मोदी टाइल्स का हाफ़-पेज वहाँ बैठा था जहाँ मेडिकल स्टोर का ऐड होना चाहिए था। नीली टाइल, सफ़ेद ग्राउट, नीचे एक टोल-फ़्री नंबर। उसने सिनेमा की लिस्टिंग उसके नीचे लगाई और फ़ाइल सेव की।
बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
· · ·
सवा चार बजे बिजली आई। पंखे चालू हुए और गर्म हवा को धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाने लगे जिसे कुछ ठंडा करने में एक घंटा और लगना था। बाहर, शहर शाम की तरफ़ सिमट रहा था। चाय की दुकानें भर रही थीं। मुख्य सड़क पर स्कूटर स्टार्ट हो रहे थे। मंदिर का लाउडस्पीकर शाम की प्रार्थना के लिए चटक रहा था।
रशिका साढ़े चार पर निकली। मलिक पौने पाँच पर, एक फ़ाइल सेव करके जो सुबह से बदली नहीं थी। मोहित अपने ऑफ़िस में रहा, दरवाज़ा खुला, फ़ोन पर, आवाज़ धीमी और अस्पष्ट।
गोपिना ने लेआउट के सुधार पूरे किए। सेव किया। प्रिंटर ट्रे बुधवार के लिए तैयार की, यानी प्रिंटर चलेगा।
फिर उसने बैग से एक कॉपी निकाली। सस्ती, स्पाइरल वाली, बीस रुपये की जो बस स्टैंड के पास स्टेशनरी से मिलती है। पन्ने इस्तेमाल से मुलायम और ऊपर की तार तिरछे ठूँसने से मुड़ी हुई। आधी भरी — क्लास के नोट्स, बस के टाइम, दो हफ़्ते पुरानी राशन की लिस्ट।
उसने पेन खोला और पन्ने के नीचे दो लाइनें लिखीं।
दीपक, 19। लोडिंग, लाइन B, यूनिट 3। चार महीने। कंपनी कहती है कोई रिकॉर्ड नहीं।
गर्मी में स्याही गीली बैठी रही। दो लाइनें जो किसी ने माँगी नहीं थीं। कोई छापेगा नहीं।
उसने कॉपी बंद की और बैग में रखी। बैग भरा था और ज़िप आधी पर अटकी, तो आधी खुली छोड़ दी।
मोहित के ऑफ़िस में, दीवार पर तस्वीर ने दरवाज़े से आती दोपहर की आख़िरी धूप पकड़ी। काँच एक पल के लिए सफ़ेद चमका। फिर अँधेरा।
गोपिना ने बैग कंधे पर डाला, कैनवस से होकर कॉपी कूल्हे से दब रही थी, और गली में निकल गई जहाँ शाम उसके बिना शुरू हो चुकी थी।