एपिसोड 7: ग़लत नाम
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
अख़बार आठ बजे आया, स्कूटर के पीछे से गिराया गया, तीस-तीस की गड्डियों में बँधा, जूट की रस्सी से। रशिका ने रस्सी काटी। रस्सी हमेशा वो ही काटती थी। मलिक खिड़की वाली कुर्सी पर था। मोहित पीछे अपनी चाय के साथ बैठा था। गोपिना उस शेल्फ़ के पास खड़ी थी जो उसकी डेस्क का काम करती थी।
रशिका ने पहली कॉपी खोली, पेज तीन पर गई, और रुक गई।
हेडलाइन थी: वार्ड 14 की नालियाँ उफ़नीं, अनाज मंडी जलमग्न। नीचे, बाईलाइन वाली जगह — जहाँ दो दिन पहले उसका नाम टाइप हुआ था, प्रूफ़ हुआ था, ख़ुद मोहित ने ओके किया था: रवि मलिक, वरिष्ठ संवाददाता।
हर लाइन उसकी थी। तीन दिन वार्ड 14 में पैदल घूमी थी, दुकानदारों से बात की थी, खुले मैनहोल गिने थे, अनाज की भीगी बोरियों का फ़ोटो खींचा था जो म्युनिसिपल नाले के सामने लगी थीं। मलिक कहीं नहीं गया था। पर प्रूफ़ और प्रिंट के बीच कहीं उसका नाम चढ़ गया और उसका उतर गया, और किनारे इतनी सफ़ाई से काटे गए कि दिखे ही नहीं। काउंसिलर के साले को ड्रेनेज का ठेका मिलने वाला हिस्सा ग़ायब था। बचा था तो बस नालियाँ। बस नालियाँ। किसी की ग़लती नहीं, किसी की ज़िम्मेदारी नहीं, ऐसा कुछ नहीं जिससे कोई फ़ोन उठाकर पूछे।
रशिका अख़बार लेकर गलियारे में गई। मलिक बाथरूम से लौट रहा था, हाथ पतलून पर पोंछते हुए।
“ये मेरी स्टोरी थी,” उसने कहा।
उसने उसके हाथ में अख़बार देखा। हैरान नहीं लगा।
“अख़बार की स्टोरी है,” उसने कहा। “आदत हो जाएगी।”
“मैं उस वार्ड में घूमी। फ़ोटो मेरे फ़ोन में हैं। दुकानदारों ने मुझे अपने नाम दिए।”
“और मैंने उसे तराशा।” वो दीवार से टिक गया। न गुस्सा, न ग़ुरूर। पचास पार का आदमी जिसे उस चीज़ का वज़न महसूस होना बंद हो गया था जो वो रोज़ करता था। “काउंसिलर वाले ऐंगल से लीगल नोटिस आता। मोहित मान गया। बड़ी होगी तो शुक्रिया कहेगी।”
“शुक्रिया कहूँगी।”
“हाँ।”
“मेरा काम लेने का।”
“अख़बार एक महीना और चलाने का।” वो दीवार से हटा और उसके बग़ल से निकल गया। “तू अच्छी है, रशिका। सच कह रहा हूँ। पर बाईलाइन एक निशाना है, और ये अख़बार निशाना झेलने की हालत में नहीं।”
गोपिना शेल्फ़ के पास थी। सब सुना था। रशिका लौटी, अपनी डेस्क पर बैठी, अख़बार दोबारा नहीं खोला। मोहित का दरवाज़ा बंद रहा।
किसी ने इसके बारे में और कुछ नहीं कहा। दस बजे प्रिंटर जाम हो गया। ठीक किया। सुबह आगे बढ़ गई।