Chapter 21

एपिसोड 21: भूरा लिफ़ाफ़ा

बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026

कॉन्ट्रैक्ट डाक से आया, मतलब मोहित ख़ुद लेटरबॉक्स चेक कर रहा था।

वो उसे सवा नौ बजे सामने वाले कमरे में लाया, भूरे लिफ़ाफ़े में ही। अपने ऑफ़िस में नहीं खोला। प्रिंटर और मलिक की पानी की बोतल के बीच टेबल पर रखा और एक पल दोनों हथेलियाँ काग़ज़ पर सपाट रखे खड़ा रहा, जैसे कोई आदमी ज़मीन ठोककर देखता है कि मज़बूत है या नहीं।

“मोदी टाइल्स ने रिन्यू कर दिया,” उसने कहा।

किसी ने ताली नहीं बजाई। मलिक कुर्सी में पीछे झुका और नाक से लंबी साँस छोड़ी, वो आवाज़ जो आदमी तब निकालता है जब डॉक्टर कहता है कि वो बात नहीं है जिसका डर था। रशिका ने कॉल पूरी किए बिना फ़ोन रख दिया। गोपिना ने प्रिंटर ट्रे से नज़र उठाई।

“कितने?” रशिका ने पूछा।

“तीन।”

“महीने?”

“महीने।”

“रेट वही?”

“रेट वही।”

तीन महीने उसी रेट पर मतलब छपाई का ख़र्चा, मलिक की तनख़्वाह, और फ़ोटोकॉपी वाली दुकान का किराया अक्टूबर तक। इसका मतलब तनख़्वाह बढ़ना नहीं था। इसका मतलब बुधवार वाला डिलीवरी वाला लड़का वापस आना नहीं था। इसका मतलब हेराल्ड एक और तिमाही चलेगा, और इस बिल्डिंग में यही फ़र्क़ था नौकरी होने और न होने के बीच।

मोहित ने लिफ़ाफ़ा खोला। कॉन्ट्रैक्ट निकाला — दो पन्ने, स्टेपल किए हुए — और सामने एक चेक क्लिप से लगा हुआ। उसने चेक ट्यूबलाइट के सामने उठाया और तिरछा किया जब तक वॉटरमार्क नहीं दिखा। फिर उसे शर्ट की जेब में मोड़कर रखा और कॉन्ट्रैक्ट टेबल पर छोड़ दिया।

“रशिका, पेज दो अपडेट कर। नए ऐड रन के लिए पूरा हाफ़-पेज।”

“नया लोगो नहीं भेजा उन्होंने।”

“फ़ोन कर। मँगवा।”

मलिक, जो साँस के बाद से हिला नहीं था, बिना कुछ बोले उठा और नीचे गया। पाँच मिनट बाद चार कप चाय लेकर आया, स्टॉल से। हर डेस्क पर एक। गोपिना की चाय उसकी कीबोर्ड ट्रे के किनारे पर रखी और वापस बैठ गया।

गोपिना ने चाय देखी। मलिक ने उसके लिए पहले कभी चाय नहीं ख़रीदी थी। उसने पी ली।

मोहित अपने ऑफ़िस में गया, डेस्क के पीछे बैठा, और बही खोली। हाशिए पर कुछ लिखा। बंद की। दोनों हाथों से सँभलकर किनारे रखी, जैसे कोई ऐसी चीज़ रखता है जो टूट सकती है।

दरवाज़े के पार, उसके पीछे दीवार पर तस्वीर। मोहित और कोमिला मोदी एक रिबन-कटिंग पर, दस साल पहले। धूल भरा शीशा। टेढ़ा फ़्रेम। किसी ने कभी सीधा नहीं किया था।

चेक उसकी जेब में था। कॉन्ट्रैक्ट टेबल पर था। मंगलवार की सुबह, और अख़बार अगले नब्बे दिन ज़िंदा था।

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