एपिसोड 11: ग्यारह बजने में पाँच
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
सिविल लाइन्स रोड की दुकानें साढ़े नौ तक शटर गिराने लगीं। लाउडस्पीकर ने दुकानों के बारे में कुछ नहीं कहा था, पर खुले रहने का फ़ायदा नहीं था जब पूरा शहर सड़क किनारे आ रहा था। बस स्टैंड वाला मोची भी, जिसका मोदी टाइल्स से कोई लेना-देना नहीं था और जो हफ़्ते में दो बार ये सबको बताता था, अपना स्टूल उठाकर ऐसे दरवाज़े पर ले गया जहाँ से नज़ारा बेहतर था।
दस बजे तक सड़क ऐसी लगती थी जैसे कोई मेला शुरू होने वाला हो पर अभी हुआ नहीं। दोनों तरफ़ तीन-तीन कतारें, मिठाई की दुकान के पास चार। बच्चे बाप के कंधों पर। कोने वाली चाय की दुकान का महीने का सबसे अच्छा कारोबार। दो सिपाही चौराहे के पास हाथ पीछे बाँधे खड़े थे, ऐसे आदमी जिन्हें जगह बता दी गई थी और उसके आगे कोई हिदायत नहीं।
मामा जी को जगह मिल गई थी। पहली क़तार, गोदाम की दीवार के ठीक बाद, एक पैर फ़ुटपाथ पर और दोनों कोहनियाँ उस रेलिंग पर जो किसी ने मंदिर के आँगन से खींचकर लाई थी। उन्होंने गोपिना को उस गर्व से हाथ हिलाकर बुलाया जो कुश्ती मैच में रिंगसाइड सीट पकड़ने वाले को होता है।
“आ, आ। आठ बजे से हूँ। बाबा रामजी नौ बजे आए, मैंने बोला पहले आया सो पहले।”
“बाबा रामजी अस्सी के हैं,” गोपिना ने कहा।
“अस्सी के और तेज़। तू उस आदमी को नहीं जानती।”
सुषमा पौने ग्यारह पर इस्त्री की हुई साड़ी में पहुँची और गोपिना के बग़ल में उस सावधानी से खड़ी हुई जैसे कोई फ़ोटो के लिए ऐंगल चुन रही हो जो कोई लेने वाला नहीं था।
“बीस मिनट,” उसने फ़ोन देखकर कहा।
“इस धूप में बीस मिनट,” रशिका ने कहा। “पौने ग्यारह पर आ सकते थे।”
“और दीपिका खोसला के पीछे खड़ी होती? नहीं जी।”
मामा जी गोपिना की तरफ़ झुके। “बाबा रामजी को यही रेलिंग चाहिए थी। उनका चेहरा जब देखा कि मैं पहले से खड़ा हूँ।” उन्होंने उँगलियाँ चूमीं।
“उस आदमी ने सत्तासी में एक कुश्ती लड़ी थी,” सुषमा ने कहा। “उनतालीस साल से उसी पर जी रहा है।”
“अड़तीस,” मामा जी ने कहा।
“बात वही है।”
धूप चढ़ती गई। बंद दुकानों के नीचे की छायाएँ दीवारों की तरफ़ सिमटती गईं। एक लड़का बाल्टी से पानी के पाउच बेच रहा था, इतनी आवाज़ में दाम बता रहा था जैसे काफ़िले से उसकी होड़ हो।
मामा जी के पास एक बूढ़ा आदमी, पतली शर्ट, हाथ पीछे बाँधे, कुछ बड़बड़ाया जो गोपिना को टुकड़ों में सुनाई दिया।
“—दो हफ़्ते नहीं हुए लड़का मर गया और स्कूल के बच्चों को वॉटर कूलर बाँट रहे—”
उसके बग़ल वाली औरत ने उसका हाथ छुआ। “बस करो।”
वो चुप हो गया। पानी वाला लड़का बुलाता रहा। किसी ने मुड़कर नहीं देखा। एक वाक्य, आया और गया, जैसे अख़बार का कोई टुकड़ा सड़क पर उड़ा और किसी के पैर के नीचे आ गया।
“मेरे पैर हो गए,” रशिका ने कहा।
“तेरे पैर ठीक हैं,” सुषमा ने कहा। “दीपिका की एड़ियों के बारे में सोच।”
मिनट खिंचते गए। एक कुत्ता सड़क के बीच में आकर बैठ गया और एक सिपाही ने उसे भगाया जिसे आख़िरकार कुछ करने को मिला।
सुषमा ने फिर फ़ोन देखा।
“पाँच मिनट बाक़ी।”
“पाँच मिनट,” गोपिना ने कहा।
सुषमा ने साड़ी ठीक की। गोपिना ने कैमरा उठाया।