एपिसोड 14: रबर की चप्पलें
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
वो शब्द गिरा और कमरा चलता रहा। पंखा डगमगाया। बाबू ने अख़बार पलटा। किसी और ने नहीं सुना।
गोपिना के हाथ गोद में ठहर गए।
खुशी ने उसकी तरफ़ देखा। रुकी। ख़ामोशी नहीं भरी, नज़र नहीं हटाई।
“तुम —”
“कोमिला मोदी की बेटी। हाँ।”
“और तुम यहाँ हो। इसी लाइन में।”
“लाइन तो वही लगती है जो सबकी लगती है। माँ इसका ख़ास ध्यान रखती हैं, दरअसल।”
उसने ऐसे कहा जैसे घर का कोई नियम बताती हो जिसके साथ पली-बढ़ी हो। न नम्रता, न गर्व। एक तथ्य, जैसे बिजली कटना या फ़ैक्ट्री की सीटी। उस घर में बस ऐसे ही चलता था।
गोपिना ने रबर की चप्पलें देखीं। सादा कुर्ता। बाहर न कोई गाड़ी, न ड्राइवर। क़तार छोड़कर आगे जाने के लिए कोई फ़ोन कॉल नहीं। वो एक प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी थी जिसकी एक टाँग छोटी थी, बंद खिड़की का इंतज़ार कर रही थी, बाक़ी सबकी तरह।
“परिवार कल्याण फ़ॉर्म,” गोपिना ने कहा, क्योंकि और कुछ कहने को नहीं था। “तुम तो बस — फ़ैक्ट्री से कोई सीधे भिजवा सकता था।”
“भिजवा सकते थे। पर स्टैम्प ज़िला कार्यालय से लगता है, और ज़िला कार्यालय लाइन छोड़ने पर स्टैम्प नहीं लगाता। नियम नियम हैं। हमारे लिए भी।” रुकी। “हमारे लिए ख़ासतौर पर, दरअसल। लोग देखते हैं।”
उनके पीछे, खिड़की 2 का शटर खड़खड़ाया और ऊपर उठने लगा। डेढ़ बज गए थे। खिड़की 2 का बाबू अलग आदमी था — जवान, धीमा — और उसके पास भी मूँगफली का अपना अख़बारी कोन था। उसने भी ऊपर नहीं देखा।
“तुम पहले,” खुशी ने कहा। “तुम ज़्यादा देर से हो।”
फ़ॉर्म ग़लत था।
जानकारी नहीं। फ़ॉर्म ही। गोपिना ने वेतन सुधार अनुरोध भरा था, जो ज़िंदा कर्मचारी के लिए होता है। मृतक कर्मचारी के लिए मृतक कर्मचारी रोज़गार सत्यापन चाहिए, जो अलग फ़ॉर्म है, सिर्फ़ खिड़की 3 पर मिलता है।
खिड़की 3 बंद थी।
“खिड़की 3 कब खुलती है?”
“मंगलवार और गुरुवार।”
आज बुधवार था।
गोपिना काउंटर पर एक लंबी पल खड़ी रही। बाबू ने इंतज़ार किया। ये बातचीत वो पहले भी कर चुका था और फिर भी करेगा।
उसने ग़लत फ़ॉर्म वापस लिया और कुर्सियों की तरफ़ गई।
खुशी अभी वहीं थी। उसका फ़ॉर्म भी ग़लत था — ग़लत वर्ज़न, जैसा उसने अंदाज़ा लगाया था — पर उसने बाबू से नया ब्लैंक ले लिया था और घुटने पर रखकर भर रही थी, फ़ोल्डर को डेस्क की तरह इस्तेमाल करते हुए।
“ग़लत फ़ॉर्म?” उसने बिना ऊपर देखे कहा।
“ग़लत फ़ॉर्म। मुझे मृतक कर्मचारी रोज़गार सत्यापन चाहिए।”
खुशी का क़लम रुक गया।
“जिसका रिकॉर्ड ग़ायब है,” उसने कहा। “वो मर गया?”
“फ़ैक्ट्री में। दो हफ़्ते पहले। उसकी माँ को कोई ये भी नहीं बता रहा कि वो कभी वहाँ था।”
खुशी ने क़लम घुटने पर रख दिया। गोपिना को एक पल उससे ज़्यादा देर तक देखा जितनी इस बातचीत ने अब तक माँगी थी।
“मैं प्लांट ऑफ़िस में किसी को जानती हूँ,” उसने कहा। “ऐडमिन साइड, फ़्लोर नहीं। अगर मृतक कर्मचारी का एम्प्लॉयमेंट रिकॉर्ड है, तो फ़ैक्ट्री की अपनी HR फ़ाइल में वही जानकारी होगी जो ज़िले के पास है। सीधे उनसे पूछना तेज़ पड़ सकता है।”
“तुम्हें ज़रूरत नहीं —”
“मैं वादा नहीं कर रही। बस पूछूँगी। कोई देखेगा, या नहीं देखेगा। पर ये एक शुरुआत है जो गुरुवार की खिड़की 3 नहीं है।”
उसने ऐसे कहा जैसे घर जाते हुए रास्ते में किसी दुकान का खुला होना देख लेने की बात हो। छोटी। काम की। एक चीज़ जिसमें उसका कुछ नहीं जाता, किसी ऐसे इंसान से जो सही दरवाज़े के पास बैठा था।
“इससे मदद मिलेगी,” गोपिना ने कहा। “शुक्रिया।”
“नाम लिख दो। कामगार का नाम, और जो भी तुम्हारे पास है।”
गोपिना ने ग़लत फ़ॉर्म पलटा और पीछे लिखा: दीपक। माँ बिमला। लोडिंग — यूनिट 3, लाइन B। जिस तारीख़ शुरू किया। जिस तारीख़ मरा।
खुशी ने काग़ज़ लिया और अपने फ़ोल्डर में अपने ग़लत फ़ॉर्म के साथ मोड़कर रख लिया। खड़ी हुई, फ़ोल्डर बग़ल में दबाया।
“गुरुवार को फिर भी आना,” उसने कहा। “खिड़की 3 के लिए। बैकअप रखना हमेशा अच्छा है।”
मुस्कुराई। गोपिना भी मुस्कुराई। हल्की और तेज़। पता चलने से पहले ही गुज़र गई।
“परिवार कल्याण फ़ॉर्म के लिए शुभकामनाएँ,” गोपिना ने कहा।
“चौथी बार में हो जाएगा। साइन में महारत आ रही है।”
वो चली गई। टाइल पर रबर की चप्पलें, पतला फ़ोल्डर, मोड़ पर चोटी एक बार हिली। ग़ायब।
दो बजे की सीटी बजी जब गोपिना बाहर निकली। श्रम विभाग की बत्तियाँ उसके पीछे टिमटिमाईं और बुझ गईं। बिजली कटी, ठीक वक़्त पर। अंदर से किसी ने आह भरी। पंखा डगमगाना बंद हो गया।
फ़ोटोकॉपी वाले फ़ॉर्मों वाला आदमी अभी भी दरवाज़े पर था, दोपहर की क़तार पर काम कर रहा था। उसने एक ब्लैंक फ़ॉर्म गोपिना की तरफ़ बढ़ाया। उसने सिर हिलाया और चलती रही।
वो लंबे रास्ते से घर गई। बाज़ार वाली सीधी सड़क से नहीं, जो साझे नल और बिमला की गली से होकर जाती थी। दूसरी तरफ़ से, नहर वाली पगडंडी पर जहाँ फ़ैक्ट्री कंपाउंड की दीवार आधा किलोमीटर चलती थी, जहाँ छाँव बेहतर थी और दोपहर की गर्मी में सड़क ख़ाली।
दिन भर का कुछ हाथ नहीं लगा था। ग़लत खिड़की। ग़लत फ़ॉर्म। ग़लत क़तार। गुरुवार को आना। पर उसके क़दम सुबह से तेज़ थे, और बैग कंधे पर कुछ नीचे था।
एक मोदी। रबर की चप्पलों में। घुटने पर रखकर फ़ॉर्म भरती हुई।
वो बिना जल्दी किए बाक़ी रास्ता चली। सीटी बताएगी जब देर होगी।
घर पर बिजली अभी भी नहीं थी। सुषमा बरामदे में अख़बार को पंखे की तरह खोलकर आगे-पीछे हिला रही थी, उस लगन से जैसे अपनी जान बचा रही हो।
“कहाँ थी सारा दिन?”
“श्रम विभाग।”
“श्रम विभाग। पूरी गली ने देखा तुझे साढ़े नौ पर जाते और अब — कितने बजे हैं — दो बजे के बाद आते। लोग सोचेंगे कोर्ट-कचहरी का चक्कर है। पता है लड़की के रिश्ते पर क्या असर पड़ता है?”
“श्रम विभाग है मामी। कोर्ट नहीं।”
“बिल्डिंग वही। कुर्सियाँ वही। बदनामी वही।”
गोपिना ने किचन के नल से गिलास भरा और खड़े-खड़े पी गई। खिड़की से गली दिख रही थी। तीन घर आगे बिमला का दरवाज़ा बंद था। प्लास्टिक का फ़ोल्डर अंदर कहीं होगा, दीपक की तस्वीर वाला लैमिनेटेड कार्ड अभी भी उसके बीच दबा।
गोपिना ने गिलास रखा।
कल गुरुवार था।