एपिसोड 15: अच्छी कुर्सियाँ
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
मामा जी गुप्ताओं के यहाँ से अच्छी कुर्सियाँ ले आए, एक-एक बाँह में, दूसरे चक्कर में बनियान पसीने से भीग चुकी थी।
“दो?” सुषमा ने दरवाज़े से कहा। “मैंने तीन बोली थीं।”
“उनके पास दो ही हैं।”
“गुप्ताओं के पास छह कुर्सियाँ हैं। मैंने किटी में गिनी थीं।”
“उन्होंने दो ही दीं।”
“क्योंकि तुमने ढंग से माँगा नहीं। तुमने ऐसे माँगा जैसे कोई कुर्सी उधार माँगता है। ऐसे माँगना चाहिए था जैसे बेटी का रिश्ता आने वाला हो।” उसने दीवार पर घड़ी देखी। “बारह बजे। एक घंटा है इस घर को ऐसा बनाने के लिए कि लगे यहाँ शरीफ़ लोग रहते हैं।”
वो सामने वाले कमरे की तरफ़ मुड़ी और उसे ऐसे देखा जैसे कोई मेहमान देखेगा। दीवार पर तस्वीर, तिरछी। मेज़पोश पर गुरुवार वाला दाल का धब्बा। पर्दे सही सफ़ेद नहीं — वो चमकता सफ़ेद नहीं जो कहता है कि औरत ब्लीच करती है, बल्कि थका सफ़ेद, वो जो कहता है कि औरत धोती है, सुखाती है, और उम्मीद रखती है।
तस्वीर सीधी की। मेज़पोश बदला। पर्दे छोड़ दिए।
बेडरूम में रशिका बिस्तर पर बैठी थी, नीली कुर्ती में — दीवाली सेल वाली, उस सुबह तक प्लास्टिक में बंद। बालों में तेल, पीछे पिन से लगे।
“जब वो तेरी नौकरी के बारे में पूछें,” सुषमा ने उसके चारों तरफ़ घूमते हुए कहा, “तू बोलना ‘बस शादी तक।’ ‘अख़बार’ नहीं बोलना। ‘रिपोर्टिंग’ नहीं बोलना। तू बोलना —”
“बस शादी तक।”
“जैसे सच में।”
“बस शादी तक।” उसने ऐसे कहा जैसे कोई पार्किंग का चालान पढ़ रहा हो।
“काम चलाएँगे। अगर ताऊ ने खाना बनाने के बारे में पूछा —”
“कौन-सा ताऊ?”
“ताऊ हमेशा होता है।” सुषमा ने एक निकला हुआ बाल वापस पिन में खोंसा। “अगर खाना बनाने के बारे में पूछे, तू मुस्कुराना और बोलना ‘माँ से सीखा है।’ पढ़ाई पूछें तो बी.ए. पास — जर्नलिज़्म वाला डिप्लोमा मत बताना, लोग डर जाते हैं। अगर तेरे पापा के बारे में पूछें —” उसने सामने वाले कमरे की तरफ़ देखा, जहाँ मामा जी उधार की कुर्सियों को ऐसे कोण पर लगा रहे थे जिससे लगे कि घर में बारह हैं। “बोलना प्रिंटिंग और स्टेशनरी का बिज़नेस है।”
“वो स्टेशनरी की दुकान के पीछे स्टेपलर ठीक करते हैं।”
“वो प्रोप्राइटर हैं। आज मुझसे बहस मत कर।”
मामा जी दरवाज़े पर आए। “ग्रे शर्ट या सफ़ेद?”
“सफ़ेद। अंदर करके। और मुझे अखाड़े का एक लफ़्ज़ नहीं सुनना। बाबा रामजी का एक लफ़्ज़ नहीं। सुबह की बारी का, दंगल का, नई कसरत का एक लफ़्ज़ नहीं। आज तुम बिज़नेसमैन हो।”
वो हट गए।
“गोपिना।”
गोपिना किचन के दरवाज़े से आगे आई।
“साफ़ कुर्ती। बाल बाँधना। तेरा काम किचन है। समोसे तब निकालना जब बैठ जाएँ — पहले नहीं, बाद में नहीं। चाय कड़क, बड़ों के लिए तीन चम्मच चीनी, लड़के के लिए दो।” रुकी। “और ठीक-ठाक दिखना। कभी काम आ जाए।”
“क्या काम?”
“काम,” सुषमा ने कहा। “पूरी बात यही है। काम।”