एपिसोड 16: परख
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
परिवार सवा बारह पहुँचा। पहले ताऊ — भारी-भरकम आदमी, कलफ़ लगे कुर्ते में, जो घर में ऐसे घुसा जैसे बिल्डिंग इंस्पेक्टर बिल्डिंग में घुसता है। नज़र छत पर, दीवारों पर, फ़र्श पर, उधार की कुर्सियों पर। सब तौला, कुछ पसंद नहीं आया। उसके पीछे माँ — छोटे क़द की, प्रेस की हुई साड़ी, आँखें पैरों से तेज़ चलती हुईं। फिर पिताजी, मिठाई का डिब्बा लिए, जो उन्होंने सुषमा को दरवाज़े पर ऐसे थमाया जैसे कोई बैंक में रक़म जमा करा रहा हो। सबसे आख़िर में लड़का। दुबला। साफ़ दाढ़ी। जहाँ माँ ने इशारा किया वहाँ बैठ गया और बोला नहीं।
मामा जी सफ़ेद शर्ट में आगे आए, अंदर की हुई, हाथ पीठ के पीछे।
“आइए आइए। बहुत ख़ुशी हुई। बैठिए, बैठिए।”
सुषमा ने वो मुस्कान चढ़ा रखी थी — वाली जो किटी की होस्ट और बिजली बोर्ड के बाबू के लिए होती है। ख़ुशी से उसका कोई लेना-देना नहीं था। अगले पैंतालीस मिनट निकालने से था।
ताऊ दोनों गुप्ता कुर्सियों में से अच्छी वाली पर बैठा और गला साफ़ किया।
“शुरू करने से पहले,” उसने कहा, “मैं संस्कारों की बात करना चाहता हूँ।”
उसने संस्कारों की बात की। पुराने तौर-तरीक़ों और नए तौर-तरीक़ों की बात की, और कैसे नए तरीक़े ऊपर से आधुनिक लगते हैं पर ज़रा सा टेक लगाओ तो भुरभुरा जाते हैं। संयुक्त परिवार और नींव की बात की, और कैसे बहू किसी घर में मेहमान की तरह नहीं, एक खंभे की तरह आती है। “परंपरा” शब्द उसने सात बार बोला, “एडजस्टमेंट” चार बार, और “इज़्ज़त” इतनी बार कि वो शब्द लगना ही बंद हो गया।
पाँच मिनट। इन पाँच मिनटों में एक बार भी लड़के की तनख़्वाह का ज़िक्र नहीं हुआ, लड़के के मिज़ाज का नहीं, पति वाली किसी ख़ूबी का नहीं। पर ताऊ यहाँ लड़के पर बात करने नहीं आया था। ताऊ यहाँ ये साबित करने आया था कि ताऊ मौजूद है।
सुषमा सबमें सिर हिलाती रही। मामा जी उसके बग़ल में बैठे थे, उस आदमी के चेहरे के साथ जिसे गंभीर दिखने को कहा गया हो और जो पूरी ताक़त लगा रहा हो।
जब तक़रीर ख़त्म हुई, माँ रशिका की तरफ़ मुड़ी।
“खड़ी हो, बेटी।”
रशिका खड़ी हुई।
माँ ने एक चक्कर लगाया। कंधे पर कुर्ती ठीक की। एक उँगली से ठोड़ी ऊपर उठाई।
“हाथ।”
रशिका ने हाथ आगे किए, हथेलियाँ ऊपर। माँ ने पकड़े और अँगूठे हथेलियों पर फिराए, उँगलियों के पोरों पर। गट्टे ढूँढ रही थी। किचन वाले गट्टे। बेलन वाले गट्टे। वो जो बताते हैं कि लड़की जब से बेलन पकड़ना सीखी है तब से रोटी बेल रही है।
रशिका की हथेलियाँ मुलायम थीं। रिपोर्टर के हाथ। फ़ोन वाले हाथ।
माँ ने बिना कुछ कहे छोड़ दिए। चेहरे ने कह दिया।
गोपिना समोसे की प्लेट लेकर आई — उनके बैठने के डेढ़ मिनट बाद, जैसा बताया गया था — मेज़ पर रखी, और किचन की तरफ़ पीछे हट गई।
पिताजी ने अपना ही मिठाई का डिब्बा खोला — वही जो सुषमा को दरवाज़े पर दिया था — और एक उठाई। चबाई। वो आदमी थे जो हर काम सोच-समझकर करते थे, यानी धीरे-धीरे, यानी सबको इंतज़ार करना पड़ता।
“परिवार का काम-धंधा क्या है?” उन्होंने पूछा।
“प्रिंटिंग और स्टेशनरी,” सुषमा ने कहा। “पुराना कारोबार। बारह साल।”
“अपनी जगह?”
“किराये की। पर गुडविल पूरी अपनी है।”
“लड़की की पढ़ाई?”
“बी.ए. पास। पढ़ाई में बहुत तेज़।”
“नौकरी?”
“बस शादी तक।”
रशिका मुस्कुराई। ठीक उतनी देर जितनी ज़रूरत थी।
पिताजी ने एक और मिठाई उठाई। छोटी वालों से बड़ी वालों पर आ चुके थे।
“हम सीधे-सादे लोग हैं,” उन्होंने कहा। “ज़्यादा माँग नहीं है हमारी। पर रिश्ता बराबरी का होना चाहिए। दोनों तरफ़ वज़न बराबर लगे।” सुषमा ने जो नैपकिन रखा था उस पर उन्होंने उँगलियाँ पोंछीं। “आपको पता है आजकल एक अच्छी दूध वाली भैंस का क्या दाम है?”
कमरा ख़ामोश हो गया।
“अच्छी मुर्रा। दूसरा ब्यांत, ठीक-ठाक दूध। पैंतालीस हज़ार। दाँत सही हों तो पचास।” उन्होंने ऐसे कहा जैसे कोई मास्टर फ़ॉर्मूला बोल रहा हो — न मज़ाक़, न ये अहसास कि मज़ाक़ हो सकता है। “और भैंस बहस नहीं करती। पलटकर जवाब नहीं देती। ये नहीं बोलती कि ‘हर दूसरे इतवार मायके जाना है।’ बस दूध देती है। सुबह-शाम। साल-दर-साल।”
उन्होंने सुषमा की तरफ़ देखा। “मैं तुलना नहीं कर रहा। बस ये कह रहा हूँ — जो परिवार बेटा भेजता है, वो बदले की उम्मीद तो कर सकता है।”
सुषमा की मुस्कान अपनी जगह पर थी। गोद में उसकी उँगलियों की गाँठें सफ़ेद हो चुकी थीं।
मामा जी ने मुँह खोला। “अखाड़े में बाबा रामजी कहते हैं कि —”
“वो कुछ नहीं कहते,” सुषमा ने बिना सिर घुमाए कहा। मामा जी ने मुँह बंद कर लिया।
लड़का कोने वाली कुर्सी पर पच्चीस मिनट से बिना आवाज़ बैठा था। एक शब्द नहीं। खाँसी नहीं। घुटने मिलाकर, हाथ जाँघों पर, फ़र्श के एक बिंदु पर नज़र जमाए जिस पर शायद उसका पूरा ध्यान ज़रूरी था।
“और लड़का?” सुषमा उसकी तरफ़ मुड़ी। “शौक़? दिलचस्पी?”
माँ ने जवाब दिया। “बहुत लगन वाला है। सरकारी क्लर्क, थर्ड ग्रेड, ज़िला दफ़्तर। कभी छुट्टी नहीं लेता। इतवार को भी पूरे हफ़्ते की शर्ट इस्त्री करता है।”
ताऊ आगे झुका। “इस लड़के ने,” उसने कहा, उस गर्व से जैसे किसी मूर्ति से चादर उतार रहा हो, “ज़िंदगी में एक बार भी चाय नहीं बनाई। एक बार भी नहीं। माँ सब करती है। सब कुछ। ऐसा घर चलाते हैं हम।”
उसने ये ऐसे कहा जैसे कोई नतीजे सुना रहा हो।
रशिका किचन के दरवाज़े के पास खड़ी थी। गोपिना ठीक उसके पीछे, चाय की ट्रे लिए, सुषमा के इशारे का इंतज़ार कर रही थी। रशिका आधा इंच पीछे झुकी — इतना नहीं कि कमरे को पता चले — और धीरे से बोली, बस दरवाज़े के लिए:
“सरकारी नौकरी हो या न हो, मैं पाँचवाँ बच्चा नहीं पालूँगी।”
गोपिना ने होंठ भींचे। ट्रे पर कप नहीं हिले।
ताऊ की नज़र पड़ी।
“और ये?” उसने ठोड़ी से किचन के दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया। “कौन है?”