एपिसोड 27: चबूतरा
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
बारह मिनट बाद बत्तियाँ वापस आईं। पहले लड़ियाँ, टेढ़ी-मेढ़ी और पीली, फिर दुकानें, फिर DJ ट्रक जिसने वही गाना उसी जगह से उठाया जहाँ छूटा था। मेला फिर अपनी शक्ल में आ गया। लोग लौटने लगे।
तीन आदमी कहीं से प्रकट हुए और भैंस की ज़िम्मेदारी ले ली, अब जब समस्या सुलझ चुकी थी और रोशनी में क्रेडिट लेना मुमकिन था। वो उसे बाड़े की तरफ़ ले गए। खूँटा किसी गाड़ी की टो रस्सी से मज़बूत किया गया था।
गोपिना और अहान अभी भी चबूतरे के किनारे बैठे थे, रस्सी ज़मीन पर उनके बीच लिपटी पड़ी।
“मुझे अपने आर्टिकल के लिए दो कोट लेने हैं,” गोपिना ने कहा।
“ये गुज़ारिश है?”
“एक तो दे दिया पहले। स्टेज पर। दस सेकंड वाला।”
“वो तो सबके सामने था। वो काउंट नहीं होना चाहिए।”
“मोहित के लिए काउंट होता है।”
“मोहित।” उसने भैंस का गिराया हुआ एक गन्ने का टुकड़ा उठाया और हाथ में घुमाया। “उसके पास अभी भी वो प्रिंटिंग प्रेस है जो जाम होती है?”
“अब बुधवार को होती है। शिफ़्ट हो गई।”
“तरक़्क़ी।” उसने गन्ना रख दिया। “मेरी लिखावट इतनी ख़राब है कि प्रेस ऑपरेटर ने एक बार हमारे ऑफ़िस फ़ोन किया, पूछा कि ऐड कॉपी किसी और भाषा में है क्या।”
“तुम ऐड कॉपी लिखते हो?”
“किसी को तो लिखनी पड़ती है। खुशी हाथ नहीं लगाती। माँ के पास ज़रूरी काम हैं। तो बस मैं हूँ, प्रेस ऑपरेटर है, और हर हफ़्ते एक बहस कि मैंने असल में लिखा क्या था।”
अनाउंसर फिर माइक चेक कर रहा था। उसकी आवाज़ मैदान में चटकती और टूटती हुई। “चेक चेक। हेलो। ये — हाँ। आपका फिर से स्वागत है — कहाँ था मैं।”
“ये हमेशा ऐसा है?” गोपिना ने कहा।
“हर साल। मेरी माँ ने एक बार प्रोफ़ेशनल बुलाने की पेशकश की। रो दिया। सच में आँसू। इकतीस साल से मेले का अनाउंसर है।”
“इकतीस साल।”
“मेरे पैदा होने से पहले से। मेरी नामकरण की रस्म भी इसी ने अनाउंस की थी। नाम ग़लत बोला।”
गोपिना का मुँह एक तरफ़ खिंचा। “क्या बुलाया था?”
“बताने की मनाही है।”
दोनों बैठे रहे। मेला उनके चारों तरफ़ चलता रहा। एक आदमी दोनों बाँहों में एक-एक बकरी दबाए गुज़रा। DJ ट्रक ने पूरी शाम में पहली बार गाना बदला। कहीं पीछे से मामा जी की आवाज़ भीड़ से ऊपर उठी, जो भी सुनता उसे नौ सेकंड के बारे में बता रहे थे।
“तुम्हारा BCA,” अहान ने कहा। “खुशी ने बताया। आख़िरी साल?”
“आख़िरी सेमेस्टर। तीन हफ़्ते में एग्ज़ाम हैं।”
“और तुम यहाँ हो। मेले की कवरेज कर रही हो। एक अख़बार के लिए जो तुम्हें देता है —”
“कुछ नहीं।”
“कुछ नहीं।”
“एप्लीकेशन में अच्छा दिखता है। रशिका कहती है।”
“दिखता है?”
“मुझे कोई आइडिया नहीं।”
उसने आस्तीनें नीचे खींचीं, फिर वापस ऊपर चढ़ाईं। “कभी ऑफ़िस आना। फ़ैक्ट्री ऑफ़िस। जो स्टोरी तुम कर रही हो उसके लिए। एम्प्लॉयमेंट रिकॉर्ड वाली। खुशी ने बताया।”
“वो अब ठीक से स्टोरी नहीं रही।”
“तो जो भी है उसके लिए।”
उसने ऐसे कहा जैसे बाएँ खींचो कहा था।