एपिसोड 28: सफ़ेद टेंट
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
“ये रही तू।”
खुशी भीड़ से ऐसे निकली जैसे खुशी हर जगह से निकलती थी — तेज़, बात बीच से शुरू, गोपिना ने मुड़कर देखा उससे पहले ही बाँह में बाँह डाल ली।
“बीस मिनट से ढूँढ रही हूँ। चल। टेंट ख़ाली है और असली खाना है। मेले वाला नहीं। चल चल चल।”
“मुझे —”
“तुझे कुछ ऐसा खाना चाहिए जो ग्यारह घंटे पहले तला नहीं गया हो। चल।”
गोपिना ने पीछे देखा। अहान पहले से खड़ा हो गया था, अनाउंसर के चबूतरे से कोई उसका नाम बुला रहा था। उसने एक हाथ उठाया — सबसे छोटा इशारा, आधा सेकंड — और मुड़ गया।
खुशी ने उसे भीड़ से खींचा, अलाव के पार, DJ ट्रक के पार जो अब चार घंटे में अपने तीसरे गाने पर था, मंदिर के पीछे एक सफ़ेद टेंट तक। मोदी टाइल्स की पोलो शर्ट में एक आदमी फ़्लैप पर खड़ा था। खुशी को देखकर हट गया।
अंदर: फ़ोल्डिंग कुर्सियाँ, ढके बर्तनों वाली एक मेज़, बैटरी से चलती एक लाइट।
“माँ दोपहर भर यहाँ थीं,” खुशी ने एक बर्तन का ढक्कन उठाते हुए कहा। “मंदिर कमिटी की मीटिंग में गई हैं। हर साल वही तीन बातों पर लड़ते हैं। बैठ। खा।”
गोपिना बैठ गई। कुर्सी पर गद्दी थी। मेज़ पर कपड़ा बिछा था। पानी की बोतलें उस क़िस्म की थीं जो बहादुरगढ़ में नहीं बिकतीं।
उसने खाया, और खुशी भैंस और अनाउंसर और अपनी माँ की मेला कमिटी के बारे में राय सुनाती रही, जो ज़ाहिर है ज़िला टैक्स ऑफ़िस और मौसम के बारे में उनकी राय जैसी ही थी: कि तीनों सुधर सकते हैं अगर लोग बस वही करें जो वो कहें।
टेंट के फ़्लैप के बाहर, मेला उनके बिना चलता रहा।
· · ·
वो दस बजे पैदल घर लौटी। मंदिर वाली सड़क ख़ाली हो रही थी। Bolero एक-एक करके निकल रही थीं, हेडलाइट्स धूल चीरती हुई। DJ ट्रक साढ़े नौ बजे मंदिर कमिटी के हुक्म से बंद करवा दिए गए थे, और उनके बाद जो ख़ामोशी आई वो उस तरह की थी जो शोर बंद होने से पहले समझ नहीं आती।
फ़ैक्ट्री की सीटी बजी। दस बजे। शिफ़्ट बदली।
गोपिना चलती रही। एक हाथ में कॉपी थी, पेन का ढक्कन घंटों पहले का ग़ायब, और कॉपी में तीन फ़ोटो थीं, दो कोट, और एक पैरा जो मोहित दो बार पढ़े बिना छाप देगा।
उसके पास रस्सी से जली दोनों हथेलियाँ भी थीं और वो नाम भी जो अनाउंसर ने अहान की नामकरण की रस्म में बुलाया था, जो उसने आख़िर में तब बताया जब उसने वादा किया कि छापेगी नहीं।
उसने याद न रखने का वादा नहीं किया था।
सीटी धीमी पड़ गई। वो घर चली गई।