Chapter 9

एपिसोड 9: हरा दरवाज़ा

बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026

सोनू का दरवाज़ा हरा था, नीचे से पेंट उखड़ी हुई जहाँ हर साल बारिश का पानी पहुँचता था।

गोपिना ने दस्तक दी। आवाज़ बिजली कटी दोपहर में तेज़ गूँजी, जितनी चाहती थी उससे ज़्यादा।

अंदर फ़र्श पर कुर्सी घिसटी। फिर कुछ नहीं।

उसने दोबारा दस्तक दी। “मैं गोपिना हूँ। इसी गली से। बिमला को जानती हूँ।”

कुर्सी फिर घिसटी। इस बार और दूर। दरवाज़े की तरफ़ नहीं, दरवाज़े से दूर।

वो खड़ी रही। गर्मी उसकी गर्दन और कंधों पर बैठी थी। दीवार के ऊपर एक बिल्ली चली, रुकी, उसे उस सपाट दिलचस्पी से देखा जो बिल्लियाँ उन चीज़ों को देती हैं जो खाने के काम की नहीं, और आगे बढ़ गई।

उसने तीसरी बार दस्तक दी, हल्की। “बस दो मिनट। दीपक के बारे में।”

दरवाज़े के पीछे से एक बच्चे की आवाज़, छोटी: “पापा, कौन है?”

“कोई नहीं।” सोनू की आवाज़, धीमी। “अंदर जा।”

फिर कुछ नहीं। वो खड़ी रही। फ़ैक्ट्री की सीटी चार बजे से पहले नहीं बजने वाली थी। गली बिजली कटने की उस लंबी, बिना हवा वाली दोपहर में टँगी हुई थी, और कोई बाहर नहीं आ रहा था, और कोई ये दरवाज़ा खोलने वाला नहीं था।

वो चली गई।

बिमला अभी भी सीढ़ी पर थी। उसने पूछा नहीं क्या हुआ। दिख रहा था क्या हुआ।

“उसके दो बच्चे हैं,” बिमला ने कहा। “अगर वो बोलता है और फ़ैक्ट्री को पता चलता है, तो उन्हें काम कौन देगा।” ये उसने सपाट कहा, बिना किसी को दोष दिए। “उसकी बीवी पीसवर्क करती है। चौदह सौ किराया। वो नौकरी गँवाकर उन्हें खिला नहीं सकता।”

दोनों बैठी रहीं। नल टपकता रहा। चार बजे सीटी बजी और बिजली आ गई और गली उनके इर्द-गिर्द जाग उठी, टीवी और पंखे और कहीं एक औरत बच्चे का नाम चिल्ला रही, पूरी गली फिर शुरू हो गई।

गोपिना लंबे रास्ते से घर गई, पानी की टंकी के पास से, अखाड़े के पास से जहाँ बाबा रामजी के लड़के शाम का राउंड ख़त्म कर रहे थे। उसके पास कोई कहानी नहीं थी। कोई सोर्स नहीं था। एक औरत थी जो अपने बेटे का नाम बिना आवाज़ टूटे बोल सकती थी, और एक हरा दरवाज़ा जो नहीं खुला, और एक थैली प्याज़ जो सस्ते नहीं थे।

· · ·

रशिका पिछली सीढ़ी पर बैठी थी जब गोपिना घर पहुँची। सुबह वाली जगह, या बीच में गई थी और लौटकर बिल्कुल उसी तरह बैठ गई, जो एक ही बात थी।

“कहाँ थी,” रशिका ने कहा। पूछ नहीं रही थी।

“कुम्हार गली।”

“बिमला के पास।”

गोपिना उसके बग़ल में बैठ गई। ऊपर किचन की खिड़की खुली थी। अंदर सुषमा फ़ोन पर थी, उसकी आवाज़ उस सुर पर चढ़ी हुई जिसका मतलब या तो शादी की प्लानिंग है या दाम पर ऐतराज़, दोनों चीज़ें जिन्हें वो बराबर वज़न देती थी।

“दीपक के बारे में बात की आज,” गोपिना ने कहा। “अलग थी। उसके बारे में ऐसे बात कर रही थी जैसे वो अभी भी यहीं है।”

रशिका ने अपनी शर्ट का किनारा खींचा। “और फिर।”

“क्या मतलब।”

“क्या करेगी इसका। नोटबुक में लिखेगी। मोहित को दिखाएगी, जो देखेगा नहीं। मलिक को दिखाएगी, जो अपना नाम लगाकर काम की बातें काट देगा।” वो सामने आँगन की दीवार देख रही थी, जहाँ पेंट उखड़ रहा था और तीन साल से किसी ने ठीक नहीं किया। “कोई नहीं छापेगा कुम्हार गली के एक मरे हुए लोडर की कहानी। वो अख़बार नहीं। इस ज़िले का कोई अख़बार नहीं।”

“मैं स्टोरी के लिए नहीं गई थी।”

“तो क्यों गई।”

“वो नल से तीन घर दूर रहती है। हर सुबह दिखती है।”

“तो राशन ले गई।”

“हाँ।”

“किस पैसे से।”

गोपिना ने जवाब नहीं दिया।

अंदर से सुषमा की आवाज़ चरम पर पहुँची: “तीन लाख हॉल के! तीन लाख! हमारे ज़माने में मैदान बुक कराओ, टेंट लगाओ, डीजे रख लो, और फिर भी एक अच्छी भैंस के पैसे बचें। कैसी दुनिया है जो शादी के हॉल के तीन लाख माँगती है।”

मामा जी ने कुछ बोला, इतना धीमे कि सुनाई नहीं दिया। सुषमा का जवाब तुरंत आया: “बाबा रामजी का नाम मत लो। बाबा रामजी ने खेत में शादी की थी। एक माइक से। वो कोई रेफ़रेंस नहीं है। और ये Bolero से पहले की बात है।”

रशिका मुस्कुराई नहीं। गोपिना की तरफ़ मुड़ी।

“अपना वक़्त बर्बाद कर रही है,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो खुरचन थी जो तब आती है जब पूरे दिन ग़लत चीज़ पर गुस्सा रहा हो, पता भी हो, और रुक न पा रही हो। “ऐसी स्टोरी पर जो कोई नहीं छापेगा। ऐसी औरत के लिए जिसकी कोई मदद नहीं करेगा। और मैं ये इसलिए बोल रही हूँ क्योंकि मैंने अभी अपनी कहानी किसी और के नाम से जाते देखी, अंदर का सब कटा हुआ, और मैं कुछ नहीं कर पाई।”

गोपिना ने अपने हाथ देखे। अँगूठे के नाखून के नीचे सुबह वाले प्रिंटर की स्याही, जो कभी पूरी निकलती नहीं।

“तो मत आ और बता कि सीढ़ी पर बैठकर आइसक्रीम की बात की,” रशिका ने कहा। “अभी नहीं सुन सकती ये।”

गोपिना ने घुटने ऊपर खींचे।

“प्याज़ ले गई थी,” उसने कहा।

रशिका ने मुँह खोला। बंद किया। आँगन की तरफ़ देखा। चेहरे पर जो आया वो जितनी जल्दी आया उतनी जल्दी गया, पर कंधे आधा इंच नीचे गिरे, और उसने कुछ और नहीं कहा, और दोनों सीढ़ी पर बैठी रहीं जब तक आँगन से रोशनी गई और सुषमा की आवाज़ ऊपर से आती रही, घर भरती रही जैसे हमेशा भरती थी, हर कमरा, हर कोना।

अंदर से: “और तेरे पापा का हल? डीजे हटा दो। आदमी चाहता है बेटी की शादी ख़ामोशी में हो। जैसे अंतिम संस्कार।”

रशिका का मुँह हिला। मुस्कान नहीं। मुस्कान की शुरुआत, पूरी होने से पहले दबा दी गई, पर थी।

Chapter 9 of 18 · swipe or ← → keys
How did that chapter land?
Enjoying it? Rate this chapter
Share this chapter