वोल्तोने
शनिवार, दोपहर 12:30। पियाज़्ज़ा माज्जोरे।
उस दिन पहली बार मारेशियाल्लो मोरेत्ती के हाथ में गर्म एस्प्रेसो था और कोई उससे बात नहीं कर रहा था।
वो वान्नी को होटल में छोड़ आया था, तैंतीस रिश्तेदारों के बयान लेते हुए, जिसमें वान्नी की बाक़ी ज़िंदगी लग जानी थी। वो ऑफ़िसर त्सुक्की को थाने में छोड़ आया था, काराबिनिएरी की गाड़ी के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करते हुए, जिसमें उसकी बाक़ी ज़िंदगी लग जानी थी। और वो धीरे-धीरे, मेहराबों के नीचे लंबे रास्ते से, बोलोन्या की उस इकलौती जगह तक चला आया था जहाँ वो हमेशा सोच पाता था।
वोल्तोने देल पोदेस्ता न कोई कमरा था न कोई गली। वो पियाज़्ज़ा माज्जोरे के कोने पर पुराने महल के नीचे पत्थर का एक बड़ा चौराहा था, जहाँ एक ऊँची गुंबददार छत के नीचे दो रास्ते मिलते थे। वहाँ हमेशा ठंडक रहती थी, जून में भी। उसके चारों कोनों पर, जहाँ मेहराबें ज़मीन पर उतरती थीं, पत्थर का एक मोटा खंभा था, और दुनिया की हर गाइडबुक उन खंभों के बारे में एक ही बात कहती थी।
अगर तुम एक कोने की तरफ़ मुँह करके उसमें फुसफुसाओ, तो सामने वाले कोने की तरफ़ मुँह किए खड़ा कोई इंसान, पंद्रह मीटर दूर, रास्ते के सारे शोर के पार, हर शब्द ऐसे सुनेगा जैसे तुम उसके कान के पास खड़े हो।
मोरेत्ती ये ज़िंदगी भर से जानता था। उसने अपनी पत्नी के साथ दूसरी मुलाक़ात पर, 1990 में, इसे आज़माया था। उसने फुसफुसाया था मुझे लगता है मैं तुमसे शादी करूँगा, और वो फुसफुसाकर बोली थी अभी तुमने पिज़्ज़ा के पैसे नहीं दिए, और उसे उसी पल पता चल गया था कि वो करेगा।
वो उत्तर-पूर्वी कोने की तरफ़ मुँह करके खड़ा हो गया, क्योंकि वो छाँव में था, और एस्प्रेसो पीने लगा।
अच्छा एस्प्रेसो था। एक निभाया हुआ वादा।
उसके पीछे, रास्ते के उस पार, टूरिस्ट आ-जा रहे थे। एक बच्चा कोने से कोने तक दौड़ रहा था, पत्थर में चिल्लाता और फिर सुनने दौड़ता। कहीं एक गिटार बज रहा था। मोरेत्ती ने आँखें बंद कर लीं।
“लेओ,” पत्थर में एक आवाज़ बोली, ठीक उसके चेहरे के सामने। “तुमसे पानी टपक रहा है।”
मोरेत्ती ने आँखें खोलीं।
“मैं नहर में था,” एक दूसरी आवाज़ बोली, पास, थकी और भीगी हुई। “तुमसे भी टपकता।”
आवाज़ें दीवार के कोने से रेडियो की तरह साफ़ निकल रही थीं। दोनों फुसफुसा रहे थे। मोरेत्ती मुड़ा नहीं। चौंतीस सालों में उसने सीखा था कि जब दुनिया तुम्हें कुछ बताने का फ़ैसला करे, तो बिल्कुल स्थिर खड़े रहो और उसे बताने दो।
“उससे पीछा छूटा?”
“वो पीछे आया ही नहीं। उसने पानी देखा और फिर अपनी सैंडल देखीं।”
“सैंडल?”
“वो उन्हें गीला नहीं करना चाहता था।”
“शुक्र है भगवान का घमंड के लिए। ठीक है ना? वो अंदर है?”
“बैग में है। ठीक है। गर्म है। पूरे रास्ते भिनभिनाता रहा। जब मैं पुरानी चक्की के पास बाहर निकला, एक कुत्ता दो गलियों तक मेरे पीछे आया।”
“आवाज़ धीमी रखो।”
“धीमी ही रख रहा हूँ। इसीलिए तो हम यहाँ हैं। इसीलिए तो बेवकूफ़ों की तरह दीवार में फुसफुसा रहे हैं।”
मोरेत्ती ने बिना स्वाद लिए एस्प्रेसो ख़त्म किया। नहर। बैग। गर्म। भिनभिनाता। उसने एक झूमर के धीरे-धीरे ऊपर जाने के बारे में सोचा, और एक सरसों-पीले सूट के दरवाज़े से निकलने के बारे में, और एक आवाज़ के बारे में जो कह रही थी स्थिति विकसित हो गई है।
“ठीक है,” पहली आवाज़ बोली, जिसके बारे में अब उसे पता था कि वो सूट वाले की है। “सुनो। स्थिति विकसित…”
“मत बोलो।”
“…बदल गई है। हम ये करेंगे। सोमवार तक यूनिवर्सिटी को भूल जाओ। लिफ़ाफ़ों को भूल जाओ। सब कुछ भूल जाओ। वस्तु को कहीं सुरक्षित रखेंगे। सोमवार को फ़िज़िक्स वालों को मोटी रक़म में बेच देंगे। और आज रात, लेओ, हम मास्सिमो के पास जाएँगे ही नहीं।”
“उसे पैसे नहीं देंगे?”
“पैसे नहीं देंगे। उससे मिलेंगे नहीं। रिमिनी की आख़िरी ट्रेन पकड़ेंगे। तुम्हारी बुआ के यहाँ रुकेंगे। जब तक मास्सिमो को पता चलेगा कि हम चले गए, हम अमीर आदमी बनकर बीच पर लेटे होंगे।”
“मार्को।” एक लंबी, भीगी चुप्पी। “मास्सिमो जूलिया रॉसी का गॉडफ़ादर है।”
“पता है।”
“वस्तु रॉसी शादी से आई है। हमने उसकी धर्म-बेटी का शादी का तोहफ़ा चुराया है। और अब तुम उसे बेचना चाहते हो और उसे पैसे भी नहीं देना चाहते।”
“तुम ऐसे बोलते हो तो बुरा लगता है।”
“तो कैसे बोलूँ?”
“संकेत-शास्त्र के हिसाब से।”
मोरेत्ती ने अपना ख़ाली कप बहुत धीरे से खंभे के नीचे पत्थर की कगार पर रख दिया।
अब उसे पता था कि वो कौन हैं। मार्को बेल्लांदी। नॉर्वे वाला मोर्ताडेला का धंधा, तीन साल पहले। रिपोर्ट उसकी मेज़ से गुज़री थी। नक़ली हाथ के बने सॉसेज, एक नॉर्वे का इम्पोर्टर, ओस्लो से एक बहुत ग़ुस्सैल चिट्ठी, और क्वाद्रिलातेरो का एक क़साई जिसने बड़ी तमीज़ से केस करने से मना कर दिया था क्योंकि, उसने कहा, वो मामले निजी तौर पर निपटाना पसंद करता है।
मास्सिमो ग्रांदी। आधी रात। रॉसी तोहफ़ा। रिमिनी।
मोरेत्ती ने अपने सामने के पत्थर को देखा और एक पल के लिए उसे वो चीज़ दिखी जो वो चौंतीस साल से चाहता था। गिरफ़्तारी नहीं। कहानी। रात के खाने की एक मेज़, और उस पार उसकी पत्नी, पूछती हुई, जैसे वो 1991 से हर रात पूछती आई थी, आज काम पर क्या हुआ? और, एक बार के लिए, ऐसा जवाब जो काग़ज़ी कार्रवाई न हो।
वो आगे झुका, यहाँ तक कि उसका मुँह कोने के ठंडे पत्थर को लगभग छूने लगा, और फुसफुसाया।
“हिलना मत। काराबिनिएरी।”
दीवार में पूरी ख़ामोशी छा गई।
फिर, उसके पीछे पंद्रह मीटर दूर, कोई चीख़ा।
मोरेत्ती ठीक वक़्त पर मुड़ा और उन्हें भागते देखा। पहले सरसों वाला सूट, वोल्तोने से निकलकर पियाज़्ज़ा माज्जोरे की चकाचौंध में। लंबा उसके पीछे, छाती से नीचे तक भीगा, हरा साइकिल बैकपैक दोनों बाँहों में सामने थामे, जैसे कोई आदमी आग में से केक निकालकर ला रहा हो।
और उनके पीछे, जैसे-जैसे वो दौड़े, चीज़ें उठने लगीं।
पत्थरों से एक कबूतर उठा, उलटा, घबराकर पंख फड़फड़ाता। एक बार के बाहर कैफ़े की तीन कुर्सियाँ धीरे से हवा में उठीं और एक के बाद एक उलट गईं, जैसे-जैसे बैकपैक उनके पास से गुज़रा। एक टूरिस्ट की टोपी ऊपर गई। एक बच्चे का ग़ुब्बारा, जो पहले से ऊपर जा रहा था, और तेज़ी से ऊपर गया। ये ऐसा था जैसे किसी नाव के पीछे बनती लहरें देखना।
“रुको!” मोरेत्ती चिल्लाया, और दौड़ने लगा, शायद 2011 के बाद पहली बार।
वो तेज़ धावक नहीं था। कभी नहीं रहा। पर चौक चौड़ा था और लोगों से भरा, और दोनों आदमी उनके बीच टेढ़े-मेढ़े भाग रहे थे, और एक पल के लिए, आधे चौक पर, उस बड़े अधूरे चर्च की सीढ़ियों के पास, उसे लगा कि वो सचमुच उन्हें पकड़ लेगा।
फिर वाया क्लावातूरे से फेंके हुए चाकू की रफ़्तार से एक वेस्पा निकली।
वो हल्की नीली और बहुत पुरानी थी, और उसे क़रीब सत्रह साल का एक लड़का चला रहा था, हेलमेट सिर के पीछे अटका और पीछे एक बड़ा इन्सुलेटेड डिलीवरी बॉक्स बँधा हुआ। वो देख नहीं रहा था कि कहाँ जा रहा है। वो अपना फ़ोन देख रहा था, जो हैंडल पर लगा एक नक़्शा दिखा रहा था।
मोरेत्ती ने लड़के को देखा। लड़के ने मोरेत्ती को देखा। वेस्पा ने किसी को नहीं देखा।
अगली बात जो मोरेत्ती को पता थी वो ये कि वो पियाज़्ज़ा माज्जोरे के गर्म पत्थरों पर पीठ के बल पड़ा आसमान देख रहा था।
आसमान बहुत नीला था। एक कबूतर उसे उलटा पार कर गया। कहीं दूर, पीले सूट वाला एक आदमी अब भी चीख़ रहा था।
“सॉरी! सॉरी, सॉरी, सॉरी!” लड़के का चेहरा उसके ऊपर आया। “आप ठीक हैं? सर? आप ज़िंदा हैं?”
“हाँ,” मोरेत्ती बोला।
“भगवान का शुक्र है। मैं लेट हूँ। बहुत लेट। सॉरी!” और चेहरा ग़ायब हो गया, और इंजन चौक के पार घरघराता हुआ दूर चला गया।
मोरेत्ती की छाती पर कुछ रखा था। वो गर्म था, सफ़ेद काग़ज़ में लिपटा, और उसकी ख़ुशबू कमाल की थी।
उसने उसे उठाया। वो एक सैंडविच था। एक नरम सफ़ेद बन, अभी तक ओवन से गर्म, बीच से चीरा हुआ और मोर्ताडेला से भरा, पतली कटी और बार-बार अपने ऊपर मोड़ी हुई, गुलाबी और चमकती, उसमें चर्बी के छोटे सफ़ेद चौकोर तारों की तरह।
मोरेत्ती पियाज़्ज़ा माज्जोरे के पत्थरों पर लेटे-लेटे उसे खा गया।
ये एक साल में खाई सबसे अच्छी चीज़ थी। शायद पाँच साल में। उसने पूरा खाया, धीरे-धीरे, आसमान देखते हुए, जबकि टूरिस्ट उसके चारों तरफ़ से निकलते रहे और एक औरत ने पूछा कि क्या किसी को बुलाए और उसने हाथ हिलाकर मना कर दिया।
जब वो ख़त्म कर चुका, उसने सावधानी से काग़ज़ पर उँगलियाँ पोंछीं, काग़ज़ को चौकोर तह किया, जेब में रखा, और अपना रेडियो निकाला।
“वान्नी।”
“मारेशियाल्लो!” लड़के की आवाज़ जोश से चटक रही थी। “मैं जाँच कर रहा था। मुझे बड़ी कामयाबी मिली है। ये अराजकतावादी हैं। पर आम अराजकतावादी नहीं। मारेशियाल्लो, मुझे लगता है हमारा पाला खाने के शौक़ीन अराजकतावादियों से पड़ा है।”
मोरेत्ती ने आसमान को देखा।
“वान्नी,” उसने कहा, “ध्यान से सुनो। ये केस मेरा है।”