एपिसोड 4 — खुला माइक
दो बजे तक डेला को अकेले में बस एक मिनट चाहिए था, और उसे लगने लगा था कि पूरे ग्रीनवुड म्युनिसिपल ज़ू में ऐसी कोई जगह है ही नहीं।
उसने पूरी सुबह लीड किया था। एक हंस के साथ रास्ता बाँटा था, एक मड ट्रीटमेंट लिया था जो उसने चुना नहीं था, और एक बंदर से अपने एडमिट कार्ड की रिहाई का मोल-भाव किया था, सब कुछ शांति से, सब कुछ कैमरे पर, और इसकी उसे एक क़ीमत चुकानी पड़ी थी जिसका वो नाम नहीं ले सकती थी और जिसे दिखा नहीं सकती थी। यूनिफ़ॉर्म सफ़ेद से सलेटी हो चुकी थी और फिर ऐसे रंग की जिसका कोई नाम नहीं बचा था। कॉलर मुड़ा था, किनारा अकड़ा था, ऊपर वाली जेब में चबाया हुआ कार्ड था, और उसका हर हिस्सा चाहता था कि बस साठ सेकंड के लिए वो अपना चेहरा उस शक्ल में पकड़े रखना बंद कर दे जिसमें उसने सुबह नौ बजे से पकड़ रखा था।
तो जब क्लास सी लायनों को खाना खाते देख रही थी, वो चुपके से एक साइड वाले रास्ते पर निकल गई, किसी नल, किसी दीवार, किसी कोने की तलाश में, कोई भी जगह जहाँ एक लड़की अपनी आस्तीन धो सके और एक मिनट के लिए कोई भी न रहे।
रास्ता एक नीची इमारत पर ख़त्म होता था जिसका दरवाज़ा खुला था, और हाथ से लिखा एक बोर्ड था, ऑफ़िस, और अंदर कोई नहीं था। एक मेज़ थी, एक कुर्सी, धीरे घूमता पंखा, कोने में असली नल वाला एक सिंक, और मेज़ पर स्विचों से भरा एक लंबा सलेटी कंसोल, वैसी चीज़ जो कोई म्युनिसिपल ज़ू किसी उम्मीद भरे साल में एक बार लगाता है और फिर कभी ठीक से सँभालता नहीं। कोई कीपर नहीं था। कोई भी नहीं। ग्रीनवुड अपने हंसों की रखवाली अपने ऑफ़िस से ज़्यादा ध्यान से करता था।
डेला अंदर गई। उसने नल खोला, एक पेपर टॉवल गीला किया और बाँह के कीचड़ पर दबाया, और कीचड़ उतरा नहीं, बस फैल गया, दाग़ से धब्बा बन गया, और वो बर्बाद यूनिफ़ॉर्म में सिंक के सामने खड़ी होकर ऊपर लगे छोटे शीशे में ख़ुद को देखती रही, मुड़ा कॉलर, सपाट रोका हुआ चेहरा, और बस से उतरने के बाद पहली बार उसने चेहरा ढीला छोड़ दिया।
और फिर धीरे से, ख़ाली कमरे से, शीशे से, किसी से नहीं, उसने वो कहा जो वो सोचती थी।
“मुझे इनसे नफ़रत है,” उसने कहा। ऐसे कहा जैसे वो बात कही जाती है जो दिन भर ढोई हो। धीमे। बराबर। लगभग नरमी से। “मुझे हंस से नफ़रत है। मुझे कीचड़ से नफ़रत है। मुझे नहीं लगता कि कीचड़ खाल का इंसुलेशन है, मुझे लगता है वो कीचड़ है, और उसमें बदबू आती है, और वो मेरे बालों में है। मुझे बंदर की नीयत नहीं पढ़नी। मुझे एक फ़र्श चाहिए। एक साफ़, सपाट, मामूली फ़र्श जिस पर कोई ज़िंदा चीज़ न हो।” उसने बेकार पेपर टॉवल कॉलर पर दबाया। “मैं कुदरत में घर जैसा महसूस नहीं करती। कुदरत में कोई घर जैसा महसूस नहीं करता। कुदरत वो जगह है जहाँ चीज़ें तुम पर चिपक जाती हैं। मुझे एक ऐसी औरत की चिट्ठी चाहिए जो सोचती है कि मुझे उल्लू पसंद हैं, और फिर मुझे किसी शहर जाना है, किसी ऊँची मंज़िल पर रहना है, और जब तक ज़िंदा हूँ, मिट्टी को कभी हाथ नहीं लगाना।”
आख़िरी बात कहने के लिए वो मेज़ पर टिकी। उसने उस पर अपना वज़न डाला, दोनों हथेलियाँ सपाट, जैसे सुबह रेलिंग पर टिकी थी, और रेलिंग से उसने कुछ नहीं सीखा था, क्योंकि उसका बायाँ हाथ लंबे सलेटी कंसोल पर एक ऐसे स्विच पर पड़ा जो किसी पुराने उम्मीद भरे साल ने घिस-घिसकर चिकना कर दिया था, और स्विच एक छोटी, पक्की क्लिक के साथ नीचे चला गया, और एक लाल बत्ती जल उठी जिस पर उसका ध्यान नहीं गया था।
ग्रीनवुड म्युनिसिपल ज़ू में एक ही चीज़ बिलकुल ठीक काम करती थी, और वो थी उसका पब्लिक एड्रेस सिस्टम।
उसकी आवाज़ ऑफ़िस की दीवार के स्पीकर से उससे आधा सेकंड पीछे निकली, ज़ोरदार, साफ़ और गहरी, और उसने सुनी, और समझ गई, और कंसोल से हाथ हटाया, और तब तक बहुत देर हो चुकी थी, क्योंकि ऑफ़िस की दीवार वाला स्पीकर पूरे ग्रीनवुड में चालीस खंभों पर लगे चालीस स्पीकरों में से एक था, और हर एक उसे, पूरी म्युनिसिपल आवाज़ में, सी लायन के तालाब तक, बंदरों के टापू तक, दरियाई घोड़े के गड्ढे तक, गेट तक, पार्किंग तक, तीन सौ स्टूडेंट्स तक, छोटे बच्चों वाले परिवारों तक, कीपरों तक, मिसेज़ वैंस तक और फ़ोन तक पहुँचा रहा था।
“…एक ऐसी औरत की चिट्ठी जो सोचती है कि मुझे उल्लू पसंद हैं,” ग्रीनवुड म्युनिसिपल ज़ू ने डेला की धीमी, सच्ची, दूर तक जाती आवाज़ में सबसे कहा, “और फिर मुझे किसी शहर जाना है, किसी ऊँची मंज़िल पर रहना है, और जब तक ज़िंदा हूँ, मिट्टी को कभी हाथ नहीं लगाना।”
पंखा घूमता रहा। लाल बत्ती जलती रही। कहीं दूर, ज़ू के उस पार से, दोपहर की हवा उस तक हल्की-सी वो ख़ास आवाज़ लौटा लाई, तीन सौ लोगों के एक साथ चुप होने की आवाज़, जो तीन सौ लोगों के शोर से ज़्यादा ऊँची होती है।
डेला ख़ाली ऑफ़िस में बिलकुल स्थिर खड़ी रही, एक हाथ अब भी वहीं उठा हुआ जहाँ से वो स्विच से हटा था, छोटी लाल बत्ती को देखती रही, और हिली नहीं, क्योंकि इस बार कहने को कुछ भी शांत नहीं था। उसके तीन महीने के पूरे भंडार में इसके लिए कोई वाक्य नहीं था। उसने आख़िरकार सच कह दिया था, साफ़-साफ़, सबसे, और वो सच खंभों के ऊपर से उड़कर जा चुका था, और उसे न वापस लिया जा सकता था, न ट्रीटमेंट बनाया जा सकता था, न आधे केले से बदला जा सकता था।
लाल बत्ती टाइमर पर अपने आप बुझ गई, जैसे ग्रीनवुड में चीज़ें बिना किसी से पूछे वही करती थीं जो करती थीं।
डेला ने हाथ नीचे किया।
उसने छोटे शीशे में आख़िरी बार देखा, बर्बाद यूनिफ़ॉर्म वाली उस लड़की को जिसे आख़िरकार, ग़लती से, सुन लिया गया था, और फिर आदतन दो उँगलियों से अपना मुड़ा कॉलर सीधा किया, क्योंकि आदत ही अब उसके पास बची थी, और ऑफ़िस के दरवाज़े से धूप में निकल गई, ताकि पूरी क्लास 12 और ग्रीनवुड के हर अजनबी के सामने ठीक वही इंसान बन सके जो न होने का नाटक उसने तीन महीने और एक पूरा दिन किया था।
वापसी का रास्ता बहुत लंबा था। ऊपर पहुँचकर क्लास मिली।
सब उसे देख रहे थे। हर एक। मिसेज़ वैंस सबसे आगे थीं, और उनके चेहरे पर, पूरे दिन में पहली बार, ऐसा कुछ नहीं था जो डेला पढ़ सके, न यक़ीन, न लगभग-यक़ीन, बस एक औरत जिसने लाउडस्पीकर सुना था।
और सिद्धार्थ, भीड़ के किनारे, ने फ़ोन पूरा नीचे किया, जेब में रखा, और पूरे दिन में पहली बार उसे उसकी ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि इस बार सबने सब कुछ लाइव सुन लिया था।