कमरे की हर घड़ी
2026 · पुरम की वर्कशॉप, उद्योग विहार · रात 2:05
जिस पल कांची ने डायल वापस बैग में रखा, मिनट बदल गया।
उसे इसलिए पता चला क्योंकि पुरम को पता चला। उसने ऐसी आवाज़ निकाली जैसे किसी आदमी को अपने जूते में मकड़ी मिली हो, और डैशबोर्ड की तरफ़ इशारा किया। 1:37। फिर 1:38, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
“फिर से निकालो,” उसने कहा।
“तुम निकालो।”
“मैं गाड़ी चला रहा हूँ।”
“तुम डरे हुए हो।”
“मैं गाड़ी चला रहा हूँ और मैं डरा हुआ हूँ। दोनों बातें सच हैं।”
तो उसने नहीं निकाला, और बाक़ी रास्ता बैग उसके पैरों के बीच रहा और दोनों में से किसी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा।
पुरम की वर्कशॉप उद्योग विहार में एक प्रिंटिंग प्रेस के पीछे किराए का गैराज थी। उसमें सोल्डर और स्याही की गंध थी और उन नूडल्स की जो वो छह साल से खा रहा था। दो पुराने सोफ़े थे, एक बिस्तर जो दीवार से निकलकर खुलता था और एक जो नहीं खुलता था, और पीछे की दीवार से सटी मशीनों की एक ऊँची काली रैक, जिसकी हरी बत्तियाँ पूरी रात टिमटिमातीं और फुसफुसातीं। पुरम उन्हें अपने सर्वर कहता था। कांची उन्हें दादियाँ कहती थी, क्योंकि वो हमेशा जागती रहतीं और हमेशा बड़बड़ाती रहतीं।
उसने बैग वर्कबेंच पर रखा और उसके बग़ल में बेंच पर बैठकर पैर झुलाने लगी।
पुरम नहीं बैठा। पुरम ने दस्ताने पहने। फिर पहले जोड़े के ऊपर दूसरा जोड़ा पहना। फिर रसोई वाला एक लंबा चिमटा उठाया।
“सच में?” कांची ने कहा।
“तुमने दस्तानों में उसे छुआ और घड़ियाँ रुक गईं। मैं जानना चाहता हूँ कि दस्तानों से फ़र्क़ पड़ता है या नहीं।”
“तो दस्ताने पहनकर छू लो।”
“मैं चाहता हूँ कि तुम दस्ताने पहनकर छुओ। साइंस के लिए।”
“तुम चाहते हो मैं चूहा बनूँ।”
“तुम पहले से चूहा हो। वॉल्ट में ख़ुद आगे बढ़कर बनी थीं।” उसने चिमटा आगे किया। “प्लीज़।”
उसने डायल नंगे हाथों से बैग से निकाला, क्योंकि उसने प्लीज़ कहा था और क्योंकि वो उसका चेहरा देखना चाहती थी।
दरवाज़े के ऊपर की दीवार घड़ी रुक गई। पुरम के लैपटॉप की घड़ी रुक गई। वर्कबेंच के ऊपर वाली बड़ी स्क्रीन का वक़्त 2:07 पर रुक गया। उसकी लकी घड़ी रुक गई। बाहर, मेन रोड पर कहीं, एक ट्रक का हॉर्न बीच में कट गया, और दोबारा शुरू नहीं हुआ।
और उसके पीछे, दादियाँ चुप हो गईं।
कांची ने उन्हें कभी चुप नहीं सुना था। छह साल में उन मशीनों ने एक बार भी अपनी बड़बड़ बंद नहीं की थी। अब पंखे धीमे हुए, और धीमे, और रुक गए, और छोटी हरी बत्तियाँ जली रहीं पर फुसफुसाहट चली गई, और गैराज इतना ख़ामोश था कि उसे पुरम का थूक निगलना सुनाई दिया।
ये उस कमरे की ख़ामोशी थी जिसमें अभी-अभी कोई भला इंसान आया हो, और सब उसे देखने के लिए बात करना बंद कर दें।
“नीचे रखो,” पुरम ने कहा।
“एक सेकंड में।”
“कांची। मेरे सर्वर।”
“एक सेकंड में।” उसने हाथों में डायल घुमाया। पास से, बेंच लैंप के नीचे, वो पहली बार उसे ठीक से देख पा रही थी। कांसा, अपने आकार के हिसाब से भारी, जैसा अच्छा कांसा हमेशा होता है। ढला हुआ, पीटा हुआ नहीं। उम्र से हरा, सिवाय वहाँ के जहाँ फ़र्क़ पड़ता था। एक सपाट चेहरा, बीच में एक छोटी सुई, और कोई अंक नहीं, कोई अक्षर नहीं, उस पर कुछ भी लिखा नहीं। किनारे के चारों तरफ़ चमकीले खाँचों की अँगूठी। उसने बिना चाहे उन्हें गिना। ये खुदाई वाले दिनों की आदत थी: हर चीज़ गिनो, लिख लो, किसी पर भरोसा मत करो।
एक सौ आठ।
“कोई अक्षर नहीं हैं,” उसने कहा। “कोई निशान नहीं, कोई लिपि नहीं। बस खाँचे।”
“ये अजीब है?”
“इतनी पुरानी चीज़ के लिए? हर पुरानी चीज़ पर कुछ न कुछ होता है। एक नाम। एक प्रार्थना। क़िस्मत अच्छी हो तो एक श्राप।” उसने उसे लैंप की तरफ़ झुकाया। “इस पर बस… गिनती है।”
उसने उसे नीचे रख दिया।
पंखे पहले लौटे, एक लंबी उठती हुई आह। फिर बाहर ट्रक का हॉर्न, अपना सुर पूरा करता हुआ। फिर घड़ियाँ, सब एक साथ, 2:07 से 2:08, जैसे कभी रुकी ही न हों।
पुरम ने वो साँस छोड़ी जो वो लगभग एक मिनट से रोके हुए था। उसने दादियों को देखा, दो स्क्रीनें जाँचीं, और कुछ टाइप किया। फिर वो मुड़ा, और उसका चेहरा ऐसा था जैसा वो अक्सर नहीं देखती थी।
“ये रीबूट नहीं हुए,” उसने कहा। “इन्होंने बस इंतज़ार किया। हर घड़ी ठीक उसी सेकंड से चली जिस पर रुकी थी।” उसने दस्तानों का एक जोड़ा उतारा, फिर दूसरा। “ये मुमकिन नहीं है।”
“बिहार में एक बार मुझे खुदाई में मिट्टी का एक बर्तन मिला था जिस पर अँगूठे का निशान था। कुम्हार का अँगूठा, गीली मिट्टी में दबा हुआ, दो हज़ार साल पहले। लकीरें दिखती थीं।” उसने अपनी जैकेट का किनारा कुरेदा। “वो भी मुमकिन नहीं था। और वो वहाँ था।”
“वो एक बात नहीं है।”
“नहीं,” उसने माना। “ये वाला गरम है।” उसने फ़ोन की तरफ़ सिर हिलाया। “क्लाइंट क्या कहता है?”
उसने वो फ़ोन देखा जो वो जॉब्स के लिए रखते थे। क्लाइंट सिर्फ़ कैपिटल लेटर्स में लिखता था और सिर्फ़ कैश में पैसे देता था। हफ़्ता भर पहले का आख़िरी मैसेज कहता था: लॉट 9। कांसे का डायल। पीछे की दीवार। तुम पहचान लोगे।
“तब से कुछ नहीं,” पुरम ने कहा। “न पिकअप का वक़्त। न पता।”
“लिखेगा।”
“अब तक तो हमेशा लिख देता है।” उसने फ़ोन रख दिया। “कांची। वो शेल्फ़ पर था। क्लाइंट को पता था कि वो शेल्फ़ पर होगा। तुम पहचान लोगे।”
उसने जवाब नहीं दिया। वो बेंच पर लैंप की रोशनी में पड़े डायल को देख रही थी, और उसने अभी-अभी कुछ ऐसा देखा था जो उसे पसंद नहीं आया।
“पुरम। इधर आओ।”
वो आया। उसने खाँचों की अँगूठी की तरफ़ इशारा किया।
डायल के ऊपरी हिस्से में, जहाँ सुई टिकी थी, एक खाँचा काला पड़ गया था, जैसे मोतियों की लड़ी में एक ख़ाली जगह जहाँ से एक मोती फिसल गया हो।
“ये चमकीला था,” उसने कहा। “मैंने दो मिनट पहले एक सौ आठ चमकीले गिने थे।”
पुरम पास झुका। उसने छुआ नहीं। उसने साँस के नीचे गिना, जैसे वो स्टेप गिनता था। आख़िर तक पहुँचा तो फिर से शुरू किया।
“एक सौ सात,” उसने कहा।
“तो एक बुझ गया।”
“जब तुमने उसे सर्वरों के पास रखा।”
उन्होंने एक-दूसरे को देखा।
“ये गिन रहा है,” कांची ने कहा।
“क्या गिन रहा है?”
“उल्टा,” कांची ने कहा। “ये उल्टी गिनती गिन रहा है।”