एपिसोड 13: टोकन सैंतालीस
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
श्रम विभाग दस बजे खुलता था। गोपिना नौ चालीस पर पहुँच गई।
जब तक शटर उठा, उसके पीछे बारह लोग और लग चुके थे। एक आदमी सफ़ारी सूट में। एक औरत, तीन फ़ोल्डर कपड़े में बँधे हुए। दो लड़के जिन्हें बाप ने भेजा था, ऊबे हुए, एक-दूसरे को धकेलते हुए। दरवाज़े के बाहर एक आदमी फ़ोटोकॉपी किए हुए फ़ॉर्मों का बंडल लिए क़तार पर काम कर रहा था, फ़ीस लेकर फ़ाइलिंग करवाने का ऑफ़र दे रहा था। गोपिना ने सिर हिलाया। वो सफ़ारी सूट की तरफ़ बढ़ गया।
अंदर: चार क़तारों में बीस प्लास्टिक की कुर्सियाँ। एक छत का पंखा जो पहली दो क़तारों तक पहुँचता था और ऐसी आवाज़ करता था जैसे साइकिल के स्पोक में ताश का पत्ता फँसा हो। दूर सिरे पर एक काउंटर, तीन खिड़कियाँ। खिड़की 2 और 3 के शटर बंद थे। खिड़की 1 के पीछे एक छोटा बोर्ड लगा था: टोकन नं. — 31।
उसके टोकन पर लिखा था सैंतालीस।
वो बैठ गई। कुर्सी की एक टाँग छोटी थी और हर हिलने पर डोलती थी। बगल वाली औरत एक रज़ाई की गोल गद्दी लाई थी, खाने की प्लेट जितनी, जिसने गोपिना को वो सब बता दिया जो जानना ज़रूरी था — कि यहाँ कितनी देर लगने वाली है।
ग्यारह बजे तक बोर्ड पर छत्तीस आ गया था।
गद्दी वाली औरत जा चुकी थी। एक लड़का केतली में चाय बेचता हुआ सामने के दरवाज़े से अंदर आया, गार्ड ने डाँटा, वो बाहर गया, और पाँच मिनट बाद साइड के दरवाज़े से वापस आ गया। किसी ने शिकायत नहीं की। तीन लोगों ने चाय ली। गोपिना के पास छुट्टे नहीं थे।
दीवार की घड़ी अभी भी ग्यारह बजकर बाईस मिनट दिखा रही थी। जब वो बैठी थी तब भी ग्यारह बजकर बाईस मिनट दिखा रही थी।
दोपहर को सफ़ारी सूट वाला आदमी बिना खिड़की पर गए उठा और चला गया। दोनों लड़के एक-दूसरे से टिके हुए सो गए थे।
सवा बारह पर बोर्ड पर बयालीस आया।
· · ·
“सैंतालीस।”
गोपिना खड़ी हुई, काउंटर तक गई, और फ़ॉर्म शीशे के नीचे की दरार से अंदर सरकाया। शीशे के पीछे बैठा बाबू एक हाथ से अख़बार के कोन में से मूँगफली खा रहा था और दूसरे हाथ से पन्ने पलट रहा था। उसने ऊपर नहीं देखा।
“ये तो एम्प्लॉयमेंट रिकॉर्ड का है।”
“जी,” गोपिना ने कहा।
“एम्प्लॉयमेंट रिकॉर्ड खिड़की 2 पर होता है।”
“खिड़की 2 बंद है।”
“लंच के बाद खुलेगी।”
“लंच कब है?”
“डेढ़ बजे।”
बारह बजकर बीस मिनट हुए थे। एक घंटा दस मिनट बैठकर बंद खिड़की देखनी थी।
“बैठ जाइए।” उसने पहली बार ऊपर देखा। बुरा आदमी नहीं था। “खिड़की 2, लंच के बाद।”
गोपिना ने फ़ॉर्म वापस लिया। प्लास्टिक कुर्सियों की क़तारों के बीच से गुज़री, एक आदमी के पास से जो फ़ाइल छाती पर रखकर सो गया था, गार्ड के पास से जो चाय वाले लड़के को तीसरे चक्कर पर अनदेखा कर रहा था, और दूसरी क़तार में खिड़की 2 की तरफ़ बैठ गई।
इस तरफ़ कोई क़तार नहीं थी। तीन कुर्सियाँ, कोई बोर्ड नहीं, कोई टोकन सिस्टम नहीं। बंद खिड़की पर चिपके काग़ज़ पर लिखा था: समय — 10:00 से 1:00 / 1:30 से 4:00।
उसने दीवार की घड़ी देखी। अभी भी ग्यारह बजकर बाईस मिनट। फ़ोन देखा। बारह बजकर पच्चीस।
वो छत की टाइलें गिन रही थी — छियालीस, जो ऐसे दिन के लिए सही ही लग रहा था — जब कोई उसके बगल में आकर बैठा।
“खिड़की 2?”
गोपिना ने देखा। उसकी उम्र की लड़की, शायद साल भर बड़ी। सादा सूती कुर्ता, रबर की चप्पलें, बग़ल में एक पतला फ़ोल्डर। चोटी बँधी, न बालियाँ, न घड़ी। कुम्हार गली या आर्य नगर या शहर की किसी भी गली की हो सकती थी।
“खिड़की 2,” गोपिना ने कहा।
“कब से हो?”
“दस बजे से।”
लड़की पीछे टिककर बैठ गई और फ़ोल्डर कुर्सी के नीचे रख दिया। “मैं परिवार कल्याण फ़ॉर्म के लिए आई हूँ। फ़ैक्ट्री को काउंटरसाइन करके यहाँ भेजना होता है, उन्होंने भेजा। पर ज़िला कार्यालय कहता है कि फ़ॉर्म पुराने वर्ज़न का है। तो मुझे नया ब्लैंक लेना है, वापस जाकर दोबारा साइन करवाना है, और फिर लेकर आना है। तीसरी बार है।”
“तीसरी बार।”
“पहली बार साइन ग़लत ख़ाने में था। दूसरी बार तारीख़ का फ़ॉर्मैट ग़लत था। इस बार पूरा फ़ॉर्म ही ग़लत है। जानकारी वही। साइन वही। काग़ज़ अलग।”
“एक ही फ़ॉर्म के लिए तीन चक्कर।”
“मैंने पहले कभी सरकारी फ़ॉर्म नहीं भरा था। ऑफ़िस में कोई और सँभालता है सब कुछ।” उसने बंद खिड़की की तरफ़ देखा। “बताते नहीं कि दिन में बीच में खिड़कियाँ बंद हो जाती हैं।”
गार्ड ने चाय वाले लड़के पर चिल्लाया। लड़के ने एक कप गार्ड की कुर्सी पर रखा और साइड के दरवाज़े से फिर बाहर चला गया।
“तुम्हारा फ़ॉर्म,” लड़की ने कहा। “एम्प्लॉयमेंट रिकॉर्ड?”
“एक जान-पहचान के लिए। सुधार। रिकॉर्ड में लिखा है कि उसने यहाँ कभी काम नहीं किया, पर उसने किया।”
“ग़लत एम्प्लॉयर कोड? एंट्री डेट ग़ायब? वो अक्सर खो देते हैं।”
“पूरा ग़ायब है। जैसे वो कभी था ही नहीं।”
“ये तो मुश्किल है।”
“मुश्किल है।”
दोनों चुप बैठी रहीं। पंखा ऊपर डगमगा रहा था। खिड़की 1 की मूँगफली के छिलके काउंटर के पास छोटे ढेर में जमा हो गए थे।
“मैं खुशी हूँ,” लड़की ने कहा।
“गोपिना।”
“गोपिना। पुराने ज़माने का नाम।”
“मेरी माँ की नानी का। कहते हैं कोई उस औरत से बहस नहीं करता था, तो नाम चिपक गया।”
“मेरे नाम का मतलब ख़ुशी है। माँ ने कहा इसे देने की ज़िम्मेदारी मेरी है, जो एक नाम के लिए बड़ा ज़्यादा प्रेशर है।”
सवा एक। खिड़की 1 का बाबू मूँगफली ख़त्म करके अख़बार पढ़ रहा था, क्लासिफ़ाइड वाला पेज। किसी का फ़ोन तीन बार बजा, तब जाकर उसे पता चला कि उसका है।
“खुशी क्या?” गोपिना ने कहा। बस, वक़्त काटने के लिए।
“मोदी।”