एपिसोड 26: इनाम
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
मुख्य बाउट सात बजे ख़त्म हुआ। रोहतक का एक लड़का, मोटी गर्दन वाला, गंभीर, उसने लोकल फ़ेवरिट को दो मिनट से कम में चित कर दिया, और भीड़ ने वो आवाज़ निकाली जो भीड़ निकालती है जब ख़ुश नहीं होती पर नतीजे की इज़्ज़त करनी पड़ती है।
इनाम बाँटने की रस्म चबूतरे पर थी। गोपिना प्रेस एरिया के पीछे खड़ी थी — दो प्लास्टिक की कुर्सियाँ और एक रस्सी, हेराल्ड की पूरी पहुँच इतनी ही — और देखा कि अहान माइक तक गया।
यहाँ वो अलग दिख रहा था। आँगन वाले कार्यक्रम में ऑफ़िस के कपड़ों में था, संभला हुआ। यहाँ ढीला कुर्ता था, आस्तीनें ऊपर चढ़ी हुईं, बाल कटवाने की ज़रूरत थी। उसने रोहतक वाले लड़के का हाथ दोनों हाथों से मिलाया और माइक में झुका।
“दो मिनट। मैंने पूरा देखा और मुझे अभी भी समझ नहीं आया कि पहले दस सेकंड में तूने क्या किया। सिखा सकता है मुझे?”
लड़का हँसा। भीड़ हँसी। अनाउंसर हँसा और बोतल कुर्सी से गिरते-गिरते बची।
अहान ने जीतने वाले का चेक दिया — पीछे प्रेज़ेंटेशन बोर्ड पर मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर का लोगो, जो गोपिना ने नोट किया क्योंकि नोट करना उसका काम था — और स्टेज पर पहलवानों से ज़रूरत से ज़्यादा देर बात करता रहा। दिखावा नहीं। बस सहज, उसी तरह जैसे खुशी सहज होती है, जैसे स्टेज किसी का बैठक हो और हर कोई वहाँ कोई जानने वाला हो जिसे देखकर अच्छा लगता है।
गोपिना ने कोट कॉपी में लिखा। चेक की रक़म लिखी। “मोदी टाइल्स” के नीचे लाइन खींची क्योंकि मोहित इसे पैरे में चाहेगा।
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नौ बजकर बयालीस मिनट पर बत्तियाँ गईं।
पहले मेले की लड़ियाँ, फिर दुकानों के बल्ब, फिर अनाउंसर का चबूतरा। DJ ट्रक बीट के बीच में मर गया। तीन सेकंड पूरा मेला अँधेरे में रहा, और फिर पाँच सौ फ़ोन की स्क्रीन एक साथ हवा में उठीं।
मुख्य स्टेज के पीछे जनरेटर ने दो बार खाँसा और बंद हो गया।
“जनरेटर,” अनाउंसर ने बंद माइक में कहा, किसी से नहीं। “जनरेटर —”
आगे किसी ने नहीं सुना। भीड़ हर तरफ़ एक साथ हिली। भगदड़ नहीं, उन लोगों की भटकती हलचल जो घंटों से खड़े थे और अचानक कहीं देखने को नहीं रहा। गन्ने की दुकानों ने अँधेरे में ही शटर गिरा दिए। एक बच्चा चीख़ा, मिल गया, चुप हो गया। दूर सिरे पर अलाव ने बालू के गड्ढे पर लंबी परछाइयाँ फेंकीं।
गोपिना पशु बाड़े के पास थी जब रँभाना शुरू हुआ।
खेती के इनाम चबूतरे के पीछे एक खूँटे से बँधे थे। दो बकरियाँ, एक बछड़ा, और एक भैंस। भैंस पहला इनाम थी। भारी-भरकम जानवर जिसकी शोर और अँधेरे के बारे में अपनी पक्की राय थी।
खूँटा टिका रहा। रस्सी नहीं टिकी।
वो बाड़े से बाहर ऐसे निकली जैसे कोई रानी उस कमरे से निकलती है जिसकी उसे अब परवाह नहीं। धीरे, भारी, नाराज़। बकरियों के पास से गुज़री, जो अपने खूँटों से चिपकी रहीं और चुप रहीं। भैंस भीड़ की तरफ़ जा रही थी।
“रस्सी,” किसी ने कहा। “रस्सी पकड़ो।”
गोपिना ने ढीला सिरा मिट्टी में घिसटता देखा। उसने पकड़ लिया। भैंस चलती रही। गोपिना की चप्पलें सख़्त ज़मीन पर फिसलीं और उसने पकड़े रखा, क्योंकि छोड़ना और बुरा लगा।
फिर किसी और ने रस्सी उसके पीछे पकड़ ली।
“बाएँ खींचो,” अहान ने कहा। “बाएँ। बाएँ खींचोगी तो मुड़ेगी।”
“ये कैसे पता?”
“नहीं पता। बाएँ खींचो फिर भी।”
उन्होंने बाएँ खींचा। भैंस नहीं मुड़ी। वो आगे बढ़ती रही उस सब्र से जो उस चीज़ को आता है जिसका वज़न दोनों को मिलाकर भी ज़्यादा हो। दो लोग अँधेरे में एक भैंस के पीछे रस्सी पकड़े, पीछे झुके, पैर फिसलते, एक-एक क़दम पीछे हटते हुए।
“काम कर रहा है ये?” गोपिना ने कहा।
“काम की परिभाषा बताओ।”
भैंस रुकी। रस्सी की वजह से नहीं। उसे एक दुकान के सामने गन्ने का ढेर मिल गया, जूस वाली दुकान का बचा-खुचा, और वो इंसानों की भीड़ जैसी छोटी चीज़ के लिए गन्ने को छोड़ने वाली नहीं थी।
उसने सिर नीचे किया और खाने लगी।
गोपिना और अहान दस फ़ीट पीछे खड़े थे, ढीली रस्सी पकड़े, साँस फूली हुई। किसी के फ़ोन की टॉर्च भीड़ से उन पर पड़ी। किसी ने सीटी बजाई। किसी और ने चिल्लाकर कहा कि स्पॉन्सर को अपने इनाम ठीक से सँभालने चाहिए।
“छोड़ सकती हो,” अहान ने कहा। “अब कहीं नहीं जाएगी।”
गोपिना ने रस्सी छोड़ी। हथेलियाँ लाल थीं जहाँ रस्सी ने छीला था। उसने शर्ट पर पोंछ लीं।
“तुम हेराल्ड की रिपोर्टर हो,” उसने कहा। “आँगन वाले कार्यक्रम से।”
“हाँ।”
“वो रिपोर्टर को आम तौर पर मवेशी भी पकड़वाते हैं?”
“लचीला काम है।”
वो हँसा। छोटी, धीमी हँसी, वो जो छाती से शुरू होती है और पूरी नहीं निकलती। वो चबूतरे के किनारे बैठ गया और टाँगें फैला दीं। गोपिना एक पल खड़ी रही, फिर बैठ गई। दोनों के बीच दो फ़ीट। भैंस चबाती रही।