एपिसोड 29: अच्छे कप
बहादुरगढ़, हरियाणा · 2026
गोपिना आई तो बिमला ने चाय तैयार रखी थी।
वो चाय नहीं जो कोई अचानक आने पर बनाता है। अच्छे कप, वो नीले फूलों वाले जो ऊपर की ताक पर रखती है। दूध दो बार गर्म किया हुआ। चीनी नापकर डाली, अंदाज़े से नहीं। बाहर की सीढ़ी साफ़ की हुई। जो कुछ बदला था बिमला में, दरवाज़ा खटखटाने से पहले बदल चुका था।
“बैठ,” बिमला ने कहा।
गोपिना बैठ गई। गली शांत थी। चार बजे, दोपहर की बिजली लौटने और शाम शुरू होने के बीच का ख़ाली वक़्त। दो घर आगे एक औरत तार पर कपड़े फैला रही थी। किसी बच्चे की आवाज़ घरों के पीछे से आई, फिर बंद हो गई।
बिमला अंदर गई और एक पॉलिथीन लेकर लौटी। फ़ोल्डर नहीं। कुछ छोटा। वो गोपिना के बग़ल में सीढ़ी पर बैठी और पॉलिथीन गोद में खोली।
“ये संदूक में रखा था,” उसने कहा। “सर्दी के कपड़ों के नीचे। उसकी बहन को नहीं पता कि वहाँ है।”
उसने एक लैमिनेटेड कार्ड निकाला। एम्प्लॉई आईडी। तस्वीर में उन्नीस साल का दीपक था, वही चौड़ी मुस्कान, बाल पानी से चिपकाकर सँवारे, एक कॉलर उल्टा मुड़ा हुआ। तस्वीर के नीचे: लोडिंग — यूनिट 3 (लाइन B)। उसके नीचे: मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर। लैमिनेट एक कोने से उखड़ रहा था।
गोपिना ने ले लिया। प्लास्टिक गर्म था संदूक से, सर्दी के कपड़ों से, जिस चीज़ के बीच बिमला ने इसे तहा कर रखा था उससे।
“और ये,” बिमला ने कहा।
स्कूल की डायरी का एक फटा पन्ना। लाइन वाला, वो जिसमें लाल हाशिया होता है। उस पर, साफ़ लिखाई में जो पेन पर ज़्यादा ज़ोर लगा रही थी, एक ही वाक्य पाँच बार लिखा था:
दीपक कुमार, मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर।
दीपक कुमार, मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर।
दीपक कुमार, मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर।
दीपक कुमार, मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर।
दीपक कुमार, मोदी टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर।
पहली लाइन अकड़ी हुई थी, अक्षर बहुत बड़े। तीसरी तक साइज़ मिल गया था। पाँचवीं तक लिखाई सहज हो गई थी और हलकी दाईं तरफ़ झुकी हुई, जैसे लड़के लिखते हैं जब वो कुछ नक़ल कर रहे होते हैं जो अपना दिखना चाहिए।
“रियाज़ किया था,” बिमला ने कहा। “पहले दिन से एक रात पहले। इसी सीढ़ी पर बैठा था टॉर्च लेकर क्योंकि बिजली गई हुई थी। देखना चाहता था कि कैसा लगता है। उसका नाम और कंपनी का नाम। साथ में।”
उसने इसके बारे में और कुछ नहीं कहा। पॉलिथीन को घुटने पर सीधा किया और तहा कर बग़ल में सीढ़ी पर रख दिया।
गोपिना ने पन्ना पकड़ रखा था। स्याही नीली थी। वो जो रिफ़िल की कारतूस में आती है, सस्ती वाली, स्कूल के गेट के पास दो पाँच रुपये की। वो देख सकती थी कि तीसरी लाइन पर पेन ने छोड़ दिया था और उसने वापस जाकर भरा था।
“ले जा,” बिमला ने कहा। “दोनों। मुझे यहाँ इनकी ज़रूरत नहीं। ये यहाँ कुछ नहीं करते।”
गोपिना ने कार्ड और पन्ना बैग में रखे। ध्यान से, जैसे कोई वो चीज़ उठाता है जो दोबारा नहीं मिल सकती।
“सोनू,” गोपिना ने कहा।
बिमला ने चाय उठाई। पी। रख दी।
“कल आया था। पीछे के दरवाज़े से, सामने से नहीं। बोला कि तुमसे बात करेगा।”
“उसने कहा।”
“बोला कि तैयार है।” उसने कप को सीढ़ी पर चौथाई चक्कर घुमाया, फिर एक और। “ज़बरदस्ती मत करना। उसके बच्चे हैं।”
“मुझे पता है।”
“वो दीपक का दोस्त था। अकेला जो अंतिम संस्कार में आया। मैं नहीं चाहती कि इस चक्कर में उसका कुछ जाए।”
“ज़बरदस्ती नहीं करूँगी।”
बिमला ने उसे देखा। नज़र टिकी रही। जो भी ढूँढ रही थी, मिल गया, या ढूँढना बंद कर दिया।
“जा अब,” उसने कहा। “उसकी बीवी के आने से पहले।”